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आंतरिक गुटबाजी से जूझ रहे हैं झारखंड के दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दल

  • उठापटक की स्थिति कांग्रेस के जैसी भाजपा में ही

  • मंत्री पद पर सिर्फ युद्धविराम अभी विवाद जारी

  • नेताओं के झगड़े में परेशान हैं आम कार्यकर्ता

  • बीच के नेता भी संभलकर चलने के पक्षधर

राष्ट्रीय खबर

रांचीः आंतरिक गुटबाजी से कांग्रेस ही अकेली नहीं जूझ रही है। भारतीय जनता पार्टी के

अंदर भी इससे बेहतर स्थिति नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि भाजपा के नेता औपचारिक

तौर पर इस पर बयान नहीं देते हैं लेकिन अपने आचरण से यह स्पष्ट कर देते हैं कि कौन

नेता फिलहाल किसके साथ है। इसका नतीजा कांग्रेस और भाजपा कार्यालय के

किंकर्तव्यविमूढ़ कार्यकर्ताओं के चेहरों से झलकता है, जो यह समझ नहीं पा रहे हैं कि

आखिर वे किस नेता के साथ रहें और किसके साथ नहीं रहें।

कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी की चर्चा इनदिनों खुलकर इसलिए सामने आयी थी क्योंकि

पूर्व सांसद फुरकान अंसारी ने खुले तौर पर पार्टी के झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह पर

आरोप मढ़ दिये थे। इस बयान के तुरंत बाद मामले को रफू करते हुए प्रदेश अध्यक्ष डॉ

रामेश्वर उरांव ने पत्रकारों को बताया था कि उनकी श्री अंसारी से बात हुई है और उन्होंने

ऐसा कोई बयान देने से इंकार किया है। लेकिन जो आग अंदर ही अंदर लगी थी वह जंगल

की आग की तरफ अन्य इलाकों तक फैलती जा रही है। पार्टी के बड़े कार्यक्रमों में नेताओं

का नाम जोड़ना और काटना भी इसी गुटबाजी का परिणाम है। इसमें अंदर ही अंदर कई

किस्म के खेल चलते हैं और हर बार पार्टी नेतृत्व के लिए प्रदेश के ऐसे मसलों पर ध्यान

देना संभव नहीं हो पाता है। वैसे भी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के स्तर पर अब पार्टी

संगठन में नई जान फूंकने की कवायद चल रही है। यह बात पहले ही राष्ट्रीय खबर में

प्रकाशित की जा चुकी है कि पार्टी को बेहतर तरीके से चलाने के लिए कुछ नये

पदाधिकारियों को भी अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

आंतरिक गुटबाजी पर अभी भाजपा नेतृत्व ध्यान नहीं देगी

दूसरी तरफ भाजपा का नेतृत्व अभी झारखंड की आंतरिक गुटबाजी पर ध्यान देने की

स्थिति में नहीं है। भाजपा का अधिक ध्यान पश्चिम बंगाल की तरफ है, जहां विधानसभा

के चुनाव होने वाले हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा को इस बार अधिक सफलता की उम्मीद

है। इसलिए आंतरिक गुटबाजी में उलझे और एक दूसरे के साथ खड़ा होने में परहेज करने

वाले भाजपा के कद्दावर नेताओं को नये सिरे से अनुशासित करने की कोई पहल फिलहाल

नहीं होने जा रही है। भाजपा के मध्यम दर्जे के पदाधिकारी और नेता भी इसी वजह से फूंक

फूंक कर कदम रख रहे हैं ताकि किसी एक कार्रवाई से पार्टी का कोई दूसरा नेता उनसे

नाराज ना हो जाए। लेकिन यह तय है कि इससे पार्टी का बंटाधार हो रहा है।

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