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पुराने पीपीई किटों के निष्पादन से बॉयो ईंधन बनाया जाए

  •  खरबों की संख्या में एकत्रित हुए हैं ऐसे नये कबाड़
  •  इन्हें जहां तहां फेंकने से संक्रमण का भी खतरा

  •  इसके ईंधन से समस्या को दोहरा समाधान

  • संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए हिदायत

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पुराने पीपीई किटों की संख्या पूरी दुनिया में लगातार बढ़ती जा रही है।

दरअसल जैसे जैसे कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ रही है, वैसे वैसे बचाव के काम आने

वाली इस पीपीई किट की खपत भी बढ़ती चली जा रही है। लेकिन इस्तेमाल के बाद उन्हें

यूं ही नहीं फेंका जा सकता है। खास तौर पर जिन पीपीई किटों को पहनकर स्वास्थ्यकर्मी

कोरोना संक्रमित मरीजों के करीब जा रहे हैं, उनमें संक्रमण के जिंदा होने की आशंका बहुत

अधिक होती है। इसलिए इनके निष्पादन के बारे में वायरस के संक्रमण के खतरे को कम

करने पर वैज्ञानिकों ने शोध भी किया है। इस वायरस के पूरी दुनिया में फैलने के साथ

साथ ही किस परत पर यह वायरस कितने समय तक सक्रिय रह सकता है, उसकी जांच

पहले ही हो चुकी है। इस वजह से भी प्लास्टिक से बने इन पीपीई किटों के निष्पादन पर

भी शोध किया गया है। अब विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इन पीपीई किटों से बॉयो

ईंधन बनाया जाना चाहिए। इससे ईंधन प्राप्त करने के साथ साथ किसी दूसरे माध्यम से

वायरस के कहीं और फैल जाने का खतरा भी समाप्त हो जाएगा।

पुराने पीपीई किटों का निष्पादन भी अब बड़ी चुनौती

वर्तमान में पूरी दुनिया में जैसे जैसे कोरोना का संक्रमण फैला है, वैसे वैसे इन पीपीई किटों

का इस्तेमाल भी बढ़ता चला गया है। इस्तेमाल के बाद कबाड़ हो चुके इन पीपीई किटों को

ठिकाने लगाना कोरोना महामारी के दौर में एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।

इसलिए वैज्ञानिक इसके सुरक्षित निष्पादन के तौर तरीकों पर शोध करने लगे थे। अब

जानकारी आयी है कि इन पीपीई किटों से बॉयो फ्यूएल बनाया जा सकता है। दरअसल

वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक अभी दुनिया में अरबों पीपीई किटों को कबाड़ में रखा गया

है। प्लास्टिक के निष्पादन की चुनौती पूरी दुनिया पर पहले से ही बनी हुई है। प्लास्टिक

के कचड़े से दुनिया का पर्यावरण पहले से ही बहुत बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। ऐसे में में

इन पीपीई किटों की निरंतर बढ़ती तादाद में पर्यावरण संकट में बढ़ोत्तरी के साथ साथ

कोरोना संक्रमण के फैलने का दोहरा खतरा भी है।

नया रिसर्च बताता है कि इन पीपीई किटों को निष्पादित करने के लिए एक खास प्रक्रिया

को अपनाये जाने पर इनसे बॉयो फ्यूल प्राप्त किये जा सकते हैं। दरअसल यह आवरण भी

पटलिप्रोपेलेन से बने हैं। इसलिए उनसे जैविक ईंधन प्राप्त किये जा सकते हैं। वर्तमान में

पूरी दुनिया का ध्यान कोरोना संक्रमण को रोकने और बिगड़ी अर्थव्यवस्था को किसी तरह

संभालने पर लगा है। इस क्रम में ईलाज के लिए इस्तेमाल होने वाले इन प्लास्टिक के

आवरणों की तादाद निरंतर बढ़ती जा रही है। जब तक यह संक्रमण इंसानों के बीच मौजूद

रहेगा, ऐसे बचाव कवचों का इस्तेमाल भी होता रहेगा। इसी वजह से उन्हें नष्ट करने की

एक विधि पर विचार किया गया है। इससे जैव ईंधन हासिल करने के साथ साथ उन अरबों

पीपीई किटों का सही तरीके से निष्पादन भी किया जा सकेगा।

इन्हें यूं ही नहीं फेका जा सकता वरना और खतरा

अचानक पूरी दुनिया पर कोरोना वायरस का हमला होने के बाद पीपीई किटों के उत्पादन

को भी बढ़ाना पड़ा है। यह एक बार इस्तेमाल किये जाने वाले आवरण हैं। लिहाजा उनका

इस्तेमाल समाप्त होने के बाद उन्हें कैसे समाप्त किया जाए, यह बड़ा सवाल वैज्ञानिकों के

जेहन में था। अगर इन्हें यूं ही किसी सुनसान इलाके में फेंक दिया जाएगा तब भी यह कई

सौ वर्षों तक वहां के पर्यावरण को नष्ट करते रहेंगे। किसी गड्डे में इन्हें दबा दिये जाने के

बाद भी उनका खतरा यथावत रहेगा। ठीक से नहीं रखने की स्थिति में वे अंततः विभिन्न

जल मार्गों से होते हुए समुद्र की गहराई तक यह प्रदूषण फैलायेंगे। इन सारी समस्याओं से

छुटकारा पाने का आसान तरीका इन्हें जैविक ईंधन में बदल देना है। इससे ईंधन की

जरूरतें भी पूरी होंगे और जिस खतरे को टालने की कोशिश हो रही है, वह भी इसे जैव

ईंधन में बदलने की प्रक्रिया में ही समाप्त हो जाएगा।


 

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