कीटों में है जीन पहचानने की क्षमता

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  • अंगूर की प्रजनन जीन को छीन लेते हुए छोटे कीट पतंग

  • नये अनुसंधान से कीटों के इस गुण की पहचान हुई

  • 19 वीं सदी के अंत में फ्रांस पर हुआ था कीटों का हमला

  • प्रक्रिया को समझकर अंगूर को बचाने में जुटे वैज्ञानिक

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः कीटों और पतंग इस मामले में इंसानों से अधिक विकसित हैं।

वे अपनी सीमित क्षमता के भीतर ही अपने काम के जीनों की पहचान कर सकते हैं।

हाल ही में हुए शोध में इस बात की पुष्टि हो चुकी है।

अंगूर की खेती पर हुए शोध में यह पाया गया है कि उसपर जिंदा रहने वाले छोटे कीट भी अंगूर से ही प्रजनन क्षमता की जीन को छीन लेते हैं।

किसी वनस्पति से जीन छीनकर अपनी संख्या बढ़ाने की इस पुष्टि ने साबित कर दिया है कि

कीट इस मामले में इंसानों ने निश्चित तौर पर आगे हैं क्योंकि इंसान

अब भी जीन के होने तथा उनकी गतिविधियों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक उपकरणों पर ही निर्भर है।

अंगूर के पेड़ पर बसने वाले कीटों पर जब गहन शोध हुआ तो अंगूर के जीन को छीनकर अपना गुजर बसर करने का यह तरीका वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित हुआ।

टोलेडो विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने यह काम किया है।

यह शोध दल अब इसके आगे के अनुसंधान में जुटा हुआ है।

इस रहस्य का पूरी तरह खुलासा होने के बाद कीटों से अंगूर की खेती के बचाव के नये रास्ते खोजे जा सकते हैं।

वर्तमान में अंगूर की खेती पर सबसे बड़ा खतरा कीटों का ही रहता है।

जो असंख्य तादाद में इसकी खेती पर मंडराते हुए पूरी खेती को ही नष्ट कर देते हैं।

वैसे वैज्ञानिक मानते हैं कि गोंद देने वाले अन्य पेड़ों पर भी कीटों का हमला शायद इसी वजह से होता है।

शोध के दौरान उस खास प्रजाति के कीट की भी पहचान हो गयी है, जो इसके लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार पाया गया है।

19वीं सदी के अंत में इसी कीट ने पूरे फ्रांस में अंगूर की पूरी खेती को चट कर दिया था।

उस समय का विज्ञान इतना विकसित नहीं था, इसलिए कीट के हमले के बाद क्या हुआ, इसका पता तब नहीं चल पाया था।

अब वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि कीटों के हमला होने के बाद ये कीट अंगूर में मौजूद उस जीन पर ही हमला करते हैं।

इस हमले की विधि को भी वैज्ञानिकों ने समझा है।

वे इस हमले के लिए एक अलग से कोष बनाते हैं, इसी कोष में अंगूर का प्रजनन जीन एकत्रित होता है।

कीटों को विज्ञान में ग्रेप फाइलोक्सेरा कहा जाता है

जहां से कीट उसे अपनी वंशवृद्धि के काम में लाता है।

अपनी क्षमता वाले जीन के छीन जाने के बाद अंगूर का पौधा मरने लगता है।

वैसे वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि इस क्रम में अंगूर पर रहने वाले कीट अन्य प्राकृतिक ऊर्जा को भी सोखते हुए अपने विकास में खर्च करते हैं।

इस वजह से यह समझा जा रहा है कि किसी जीन का अपहरण करना है,

यह नन्हें कीटों को अच्छी तरह पता होता है।

इस कीट को वैज्ञानिक भाषा में ग्रेप फाइलोक्सेरा कहा जाता है।

नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट में इस शोध के बारे में जानकारी दी गयी है।

पौधे पर मौजूद एक खास स्थान पर बने अपने कोष को ही कीट सारी ऊर्जा प्राप्त करने का भंडार बना लेते हैं।

बहुत छोटे आकार का होने की वजह से यह आसानी से नजर नहीं आता है।

इंसानों की नजरों से छिपा यह भंडार कीटों की वंशवृद्धि और अंगूर को मारने का काम करता रहता है।

वैज्ञानिकों ने इस विधि का भी गहन अध्ययन किया है।

जिसमें यह पाया गया है कि अंगूर के पत्ते पर बनने वाले इस कोष का काम अपने आप ही प्रारंभ नहीं होता है।

वहां मौजूद कीट ही इसे अपने संकेतों से सक्रिय बनाते हैं।

जिसके पास यह अंगूर का जीन छीनकर कीटों तक पहुंचाता रहता है।

इस शोध से जुड़े डॉ हेइदी अपेल ने इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

डॉ हेइदी वहां के जेसप स्कॉट स्नातक विद्यालय की डीन है।

अब वैज्ञानिक उस प्रक्रिया के तरीकों पर शोध कर रहे हैं

ताकि विधि का पता चलने के बाद अंगूर की खेती पर कीट का हमला होते ही

इस विधि को रोककर अंगूर की खेती को बचाया जा सके।

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