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इंजेक्शन लेने के रोज के दर्द से मुक्ति दिलायेगी यह दवा







  • डायबिटीज के रोगियों के लिए नई दवा बाजार में

  • टाइप वन डायबिटीज में इंजेक्शन की जरूरत

  • हर बार इसे लेने में मरीज को दर्द तो होता है

  • नई दवा पेट के अंदर छोटी आंत तक जाती है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः इंजेक्शन लेने के दर्द से डायबिटीज के वे रोगी हर रोज रूबरू होते हैं,

जिन्हें टाइप वन के मधुमेह की बीमारी है। खून में शक्कर की मात्रा को नियंत्रित रखने के लिए

उन्हें हर रोज ऐसा इंजेक्शन लेना पड़ता है।

इंजेक्शन लेने के दर्द को भी वे इसी वजह से रोज झेलने पर विवश है।

वैज्ञानिकों ने अब इसी इंजेक्शन लेने के दर्द से छुटकारा दिलाने की एक विधि तैयार की है।

इनलोगों ने एक पिल (निगलने वाली दवा) तैयार कर ली है।

इसके इस्तेमाल से अब रोगियों को इंजेक्शन लेने के दर्द से मुक्ति मिल जाएगी।

डायबिटीज में जिन रोगियों पर इसका प्रभाव अधिक होता है, उन्हें बाद में हर रोज दिन में एक अथवा दो बार यह इंजेक्शन लेना पड़ता है।

वर्तमान में यह इंजेक्शन दरअसल प्रोटिन की वह खुराक है, जिसे सामान्य तौर पर बतौर दवा निगला नहीं जा सकता।

दरअसल इस दवा को निगलने से वह व्यक्ति की आंत में ही विखंडित हो जाता है।

इससे रोगी को कोई फायदा ही नहीं पहुंचता।

इसी वजह से उसे खून तक पहुंचाने के लिए रोगियों को इंजेक्शन लेने के दर्द से गुजरना पड़ता है।

मैसेच्यूट्स इंस्टिटियूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने अब इसे परेशानी से मुक्ति दिलाने के लिए एक खास किस्म का पिल तैयार कर लिया है।

इस पिल की विशेषता यह है कि इसे निगलने के बाद यह रोगी के खून तक अपना असर पहुंचा सकता है।

इस कैप्सूल को कुछ इस तरीके से तैयार किया गया है कि वे अंतड़ियों के गुजरते हुए भी क्षतिग्रस्त नहीं होते।

इसलिए वे अंदर तक दवा की गुणवत्ता को उसी स्वरूप में ले जाने में कामयाब होते हैं।

इंजेक्शन लेने के दर्द से निजात दिलायेगी यह पिल

इस पिल के अंदर तक असर छोड़ने की वजह से रोगी को रोज रोज के इंजेक्शन लेने के दर्द से मुक्त मिल जाती है।

इस शोध से जुड़े लोगों का अनुसंधान निष्कर्ष नेचर मेडिसीन पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

इसमें दवा के काम करने के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गयी है।

आम आदमी की समझ में आने के मुताबिक इस दवा को कुछ इस तरीके से तैयार किया गया है कि

वह छोटी आंत तक पहुंचते के पहले पूरी तरह सुरक्षित अवस्था में रहती है।

वहां पहुंचकर जब पिल विखंडित होता है तो उसका असर शरीर के खून में तुरंत ही पहुंचने लगता है।

इससे शरीर के अंदर की शक्कर की मात्रा त्वरित गति से नियंत्रित भी हो जाती है।

यह बताया गया है कि दरअसल इस पिल के बाहरी आवरण पर ऐसे इंतजाम किये गये हैं कि

छोटी आंत तक पहुंचने के बाद इस पिल के बाहर लगे छोटे छोटे हिस्से उसकी दीवार से चिपक जाते हैं,

इसी वजह से पिल टूटकर अंदर की दवा को खून में प्रवाहित करने लगता है।

वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक शोध के दौरान इस विधि को सुअरों पर आजमाया है।

जो कारगर साबित हुआ है।

इस शोध से जुड़े जिओवानी ट्रेवार्सो और उनके सहयोगियों ने इसके परीक्षण के बाद

घटनाक्रमों का विश्लेषण भी किया है।

इसमें बताया गया है कि इस पिल के अंदर इनसूलिन की उतनी मात्रा होती है, जो किसी इंजेक्शन में होती है।

इसे छोटी आंत तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पिल के बाहरी आवरण को उसी तरीके से तैयार किया गया है

ताकि यह अंतड़ियों से गुजरते वक्त भी सही सलामत रहे।

दूसरी तरफ छोटी आंत में पहुंचने के तुरंत बाद दवा खून में घूल जाये इसके भी प्रबंध किये गये हैं।

इस दवा की बाहरी संरचना को खास तौर से बनाया गया है

शोध से जुड़े प्रोफसर रॉबर्ट लैंगर मानते हैं कि यह विधि निश्चित तौर पर मधुमेह के उन मरीजों को राहत देगी,

जो रोज रोज इंजेक्शन लेने के दर्द से निजात पाना चाहते हैं।

प्रो लैंगर डेविड एच कोट इंस्टिटियूट के अध्यापक हैं और संस्थान के समेकित कैंसर रिसर्च से जुड़े हुए हैं।

उधर शोध दल के नेता ट्रेवार्सो ने बताया कि इस इंसानी अंग का आंतरिक हिस्सा इतना बड़ा होता है कि

यह करीब करीब एक टेनिस के कोर्ट के जितना फैल सकता है।

इस इलाके में दवा के पहुंचने के बाद उसके छोटे छोटे लंगरनूमा हिस्से आंत की दीवार से चिपक जाते हैं।

इन हिस्सों के चिपक जाने की वजह से पिल टूटता है और दवा को सीधे खून में पहुंचाने लगती है।

प्रयोग में यह भी देखा गया है कि छोटी आंत के अंदर इस पिल के टूटने को भी रोगी महसूस नहीं कर पाते हैं

यानी इस प्रक्रिया में उन्हें कोई तकलीफ नहीं होती है।



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