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स्वदेशी आत्मनिर्भरता के लिए कौन सा रास्ता बेहतर

स्वदेशी आत्मनिर्भरता की बात चीन के साथ सीमा विवाद के बाद अधिक होने लगी है।

कोरोना के वैश्विक संकट के बाद हर देश के लिए यह अहम आवश्यकता भी बन चुकी है।

ऐसे में भारत जैसे घनी आबादी और अधिक जनसंख्या वाले देश के लिए स्वदेशी

आत्मनिर्भरता वाकई जरूरी है। लेकिन हम इस लक्ष्य को किस रास्ते से हासिल करना

चाहते हैं, यह और भी बड़ा सवाल है। आत्मनिर्भरता का जो सफल मॉडल हमारी आंखों के

सामने दिखाया गया है, वह चीन का है। चीन ने खुद को पूरी दुनिया से काट लेने के बाद

बंद कोठरी में अपना विकास किया है। भारत से तनातनी के बाद चीन की व्यापारिक

रणनीति भी अब बदल रही है। भारतीय बाजार का दरवाजा बंद होने के बाद उसे भी अपने

घरेलू बाजार पर ध्यान देना पड़ रहा है। ऐसे में भारतीय बाजार को भारतीय उत्पादों के

जरिए भर देना ही स्वदेशी आत्मनिर्भरता का सबसे बेहतर और ठोस मार्ग हो सकता है।

वरना आयात के जरिए भारतीय बाजार की जरूरतों को पूरा करने हमारे लिए हमेशा ही

घाटे का सौदा रहेगा। भारत और चीन, दोनों देश उस समय आत्मनिर्भरता की बात कर रहे

हैं जब बीते कुछ वर्षों से जीडीपी की तुलना में उनका बाहरी व्यापार गिर रहा है। सन 2019

में चीन के जीडीपी में आयात निर्यात की हिस्सेदारी 36 फीसदी थी। यह सन 2006 के 64

प्रतिशत से काफी कम है। भारत का व्यापार-जीडीपी अनुपात 2011 में 56 फीसदी के साथ

उच्चतम स्तर पर पहुंचा और अब वह 40 प्रतिशत पर है। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में यह

सबसे बड़ी गिरावट है। अमेरिका सन 2008 के 30 प्रतिशत से गिरकर 2018 में 28 प्रतिशत

पर ही आया।

भारत को अब सिर्फ वैश्विक मुकाबला करना पड़ेगा

जापान के जीडीपी में उसके व्यापार की हिस्सेदारी बढ़ रही है और वह एक दशक में 34

प्रतिशत से 37 प्रतिशत हो गई। यूरोपीय संघ के संघ से बाहर के कारोबार में भी ऐसा ही

रुझान है। बीते एक दशक में वैश्विक जीडीपी की तुलना में विश्व व्यापार केवल दो फीसदी

कम हुआ है। इसके लिए प्राथमिक तौर पर चीन और भारत की गिरावट वजह है। चीन और

भारत न केवल जीडीपी में व्यापार की हिस्सेदारी में गिरावट के मामले में अलग हैं बल्कि

इसलिए भी कि दोनों देशों में यह हिस्सेदारी उस स्तर पर है जैसी कि अन्य बड़े देशों में नहीं

दिख रही। ऐसे में संभव है कि यह विशुद्ध सांख्यिकीय संदर्भ में हो और इसका आर्थिक

घटनाओं से लेनादेना न हो। व्यापार की हिस्सेदारी में गिरावट किसी न किसी समय आनी

ही थी। यहां अहम बात यह है कि दोनों देशों में इसकी वजह एकदम अलग-अलग हो। चीन

में यह एक हद तक सफलता की समस्या है। साल दर साल चीनी निर्यात की खपत की

कोई तो सीमा होनी ही थी। खासतौर पर विनिर्मित वस्तुओं की। इन वस्तुओं ने कई देशों

में विनिर्माण को विस्थापित कर दिया या उसे प्रभावित किया। इसके चलते उन देशों में

गुणवत्तापूर्ण रोजगार को क्षति पहुंची और वहां आय की असमानता उत्पन्न हुई। यही

कारण है कि संरक्षणवाद जैसे कदम उठाए गए। भारत में हमने ऐसा ही देखा। शिक्षा,

चिकित्सा और पर्यटन सभी श्रम आधारित क्षेत्र हैं। परंतु वस्तु व्यापार के साथ ढेर सारी

चीजें जुड़ी हैं क्योंकि उसे कच्चा माल, बिजली, परिवहन आदि कई चीजों की आवश्यकता

होती है। जाहिर है इसका प्रभाव भी अधिक है।

स्वदेशी आत्मनिर्भरता के बेहतर उदाहरण बने हैं कुछ देश

बांग्लादेश और वियतनाम इस मामले में सफल रहे हैं जबकि भारत सेवा निर्यात में अव्वल

रहा है। सेवा कारोबारों से जुड़ी एक बात यह है कि बेहतर मार्जिन और मूल्यांकन के कारण

उनमें अधिक संपदा तैयार करने की प्रवृत्ति होती है। भारत में अरबपतियों और एक अरब

डॉलर मूल्य से अधिक वाले यूनिकॉर्न स्टार्टअप की तादाद इसीलिए अधिक है। इसलिए

भारत को सर्वप्रथम यह तय करना चाहिए कि वे कौन से उत्पाद हैं, जिनकी खपत भारत में

अधिक है और उनका स्वदेशी संस्करण कैसे सुलभ हो सकता है। इसके लिए निश्चित तौर

पर कीमतों और लागतों पर भी हमें ध्यान देना होगा। इसके अलावा विदेशी कारोबार और

पूंजी को आमंत्रित करने के लिए भारत अपने चिकित्सा, शिक्षा और पर्यटन पर त्वरित

फैसले ले सकता है क्योंकि उसकी ढेर सारी आधारभूत संरचना पहले से हमारे पास मौजूद

है। इसके अलावा अन्य कोरोना संकट के बाद श्रम के व्यय को कम करने की सोच रखने

वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत आमंत्रित करने के लिए देश को राजनीतिक सोच से

ऊपर उठना होगा। इस बहुराष्ट्रीय पूंजी निवेश से हम रोजगार के अतिरिक्त अवसर पैदा

कर पायेंगे। लेकिन इनके केंद्र में महात्मा गांधी की वह अवधारणा ही रहे, जिसके माध्यम

से वह गांवों को पहले सबसे सशक्त बनाने की बात करते है। वर्तमान में इसके लिए कृषि

पर ध्यान देना उचित होगा। क्रमवार तरीके से हम वहां कुटीर और लघु शिल्प भी

विकसित कर सकते है।


 

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