fbpx Press "Enter" to skip to content

बिगड़ते आर्थिक हालात के बीच महंगाई के झटके

बिगड़ते आर्थिक हालात के बारे में किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं है। यह पूरी

दुनिया के लिए पहला अवसर है जबकि हर कोई अपने अपने घर की बजट की बदहाली से

परेशान है। भारत जैसे विकासशील देशों पर इसका अधिक और दीर्घकालीन प्रभाव पड़ना

तय है क्योंकि अर्थव्यवस्था को गति देने वाले सारे काम लॉक डाउन के दौरान बंद हो चुके

थे। अब क्रमवार तरीके से उनके चालू होने के बाद भी उनकी वह गति नहीं आ पायी है, जो

कोरोना संकट के पहले थी। इसका मुख्य कारण कोरोना संकट के दौरान लोगों के पास

नकदी का अभाव हो जाना है। लिहाजा हर कोई अपने अपने स्तर पर इस बिगड़ते आर्थिक

हालात से प्रभावित हुआ है। अब बताया जा रहा है कि चालू वित्त वर्ष में भारतीय

अर्थव्यवस्था छह प्रतिशत तक सिकुड़ जायेगी। त्यौहार –विवाह जिनसे बाज़ार को गति

मिलती थी और अर्थव्यवस्था मजबूत होती थी, सभी में कोरोना के कारण मंदी रहेगी।

राष्ट्रीय आय पिछले वर्ष की तुलना में कम रहेगी और औसतन प्रत्येक परिवार के पास

खर्च करने के लिए कम धन होगा। मंदी से मांग में गिरावट आयेगी और फैक्ट्रियों में

सुस्ती होगी। बड़े स्तर पर उत्पादन क्षमता अप्रयुक्त होगी। यह विभिन्न क्षेत्रों में देखा जा

सकता है, जिसमें प्राथमिक क्षेत्र के इस्पात व सीमेंट या द्वितीयक क्षेत्र के ऑटोमोबाइल व

वाशिंग मशीन आदि शामिल होंगे। बिक्री को बढ़ाने के लिए उत्पादकों पर कीमतों में

कटौती का दबाव होगा। उपभोक्ता वस्तुओं पर बड़ी रियायत पेश की जा सकती है। मांग में

गिरावट से कीमतों में भी बड़ी कमी आ सकती है।

बिगड़ते आर्थिक हालात पर ईंधन की कीमतों में बढ़ोत्तरी

दूसरी तरफ जान बचाने के लिए अपने अपने कारखाना अथवा रोजगार के इलाकों से भाग

आने वाले मजदूरों के नहीं होने की वजह से भी आर्थिक गतिविधियों में औद्योगिक

योगदान गति नहीं पकड़ पा रही है। दूसरी तरफ बाजार में नकदी का प्रवाह कम होने की

वजह से मांग भी बहुत कम हो चुकी है। कुछ सामानों जैसे कार और स्कूटर या टेलीविजन

और फर्नीचर पर बड़ी छूट मिलना शुरू हो गई है जिसके जारी रहने की सम्भावना है, यह

कीमतों में गिरावट स्वेच्छा व्यय वाले उत्पादों पर है। इसके बावजूद मांग में सुस्ती

बरकरार है। टिकाऊ और गैर-टिकाऊ दोनों ही प्रकार के उपभोक्ता सामानों के विक्रेता

दिवाली और बाद के त्योहारों पर खरीद के दौरान अच्छा व्यापार करते हैं।कुछ व्यापारी तो

दशहरा से क्रिसमस के दौरान अपने सालाना लाभ का 60 से 70 प्रतिशत अर्जित कर लेते

हैं।इस वर्ष यह संभावना कम है। शादियों से अर्थव्यवस्था को गति मिलती है, वह भी मंद

है। यह अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि सामाजिक दूरी की अनिवार्यता की वजह भी है।अगर

छूट और कीमतों में गिरावट के आधार पर महंगाई में कमी का अनुमान लगा रहे हैं, तो

आप गलत हैं। आमजन को महंगाई का अनुभव उत्पादों की खरीद के दौरान होता है। मार्च

के लॉकडाउन के बाद से व्यय के तरीकों में बदलाव आया है।वस्तु एवं सेवाओं के उपभोग

के सरकारी अनुमान में हो सकता है यह पूर्ण रूप से दिखाई न दे और उपभोक्ता मूल्य

सूचकांक आधारित महंगाई के आधिकारिक आंकड़ों में इसे कम महत्व दिया जाये।

अनुमानतः जून की आधिकारिक महंगाई छह प्रतिशत से ऊपर रही, जो भारतीय रिजर्व

बैंक की तय सीमा से अधिक है। लोगों का खरीदारी पैटर्न बदल चुका है।

हर इंसान के जीने का अंदाज तक बदल चुका है

बाहर खाने, कपड़े खरीदने, मनोरंजन या पर्यटन के बजाय लोग घर में ही खाने की वस्तुओं

पर जोर दे रहे हैं। हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अल्बेर्टो केवैलो ने ‘कोविड महंगाई’ दर

की गणना में ट्रांजेक्शन के वास्तविक आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। उन्होंने जिन 16

देशों का अध्ययन किया, उसमें से 10 देशों में आधिकारिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में

कोविड उपभोक्ता मूल्य सूचकांक महंगाई को कम करके आंका गया है। उपभोक्ता मूल्य

सूचकांक और कोविड- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के बीच यह अंतराल लगातार बढ़ रहा है।

उनके आंकड़ों में भारत शामिल नहीं है। भारतीय स्टेट बैंक के शोधकर्ताओं ने प्रोफेसर

केवैलो की विधा से भारत का अध्ययन किया, जिसमें वही परिणाम सामने आये अर्थात

सरकार द्वारा प्रकाशित आधिकारिक आंकड़ों में इसे कम करके आकलित किया गया है।

एसबीआइ के अनुसार, जून की वास्तविक महंगाई 6 प्रतिशत हो सकती है। इस बिगड़ते

आर्थिक हालात के बीच जून में डीजल की कीमतें बढ़ गयीं। इसका इस्तेमाल खाद्यों

पदार्थों के परिवहन में किया जाता है। केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सड़क उपकर आदि वजहों

से कीमतों में 10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई। यह भी महंगाई का एक कारण बना, न

केवल खाद्य उत्पादों के लिए, बल्कि सकल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए. इस्पात

कंपनियों ने लागत मूल्य बढ़ने का हवाला देते हुए कमजोर मांग के बावजूद कीमतों में

बढ़ोतरी की घोषणा की। चीनी वस्तुओं पर उच्च आयात शुल्क कुल उपभोक्ता महंगाई पर

असर डालेगी।


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from झारखंडMore posts in झारखंड »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from व्यापारMore posts in व्यापार »

Be First to Comment

Leave a Reply

error: Content is protected !!