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महंगाई का असर अब बाजार पर दिखने लगा है







महंगाई का असर अब पूरे बाजार पर दिखने लगा है। दीपावली के मौके पर अच्छी खासी खरीददारी होने के बाद जो आंकड़े उभरकर सामने आ रहे हैं, उसके इस प्रभाव की पुष्टि हो जाती है।

वैसे इसका मूल कारण पेट्रोल और डीजल के दाम ही हैं। जिसकी वजह से हर सामान की परिवहन लागत बढ़ गयी है। यह स्पष्ट कर दें कि केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर जो दाम घटाये हैं वह एक्साइज डियूटी में कमी की वजह से हैं।

इसे भले ही भाजपा के लोग बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करें लेकिन दरअसल केंद्र में अपने हिस्से के लाभ को नहीं घटाया है। केंद्र को इन इंधनों पर दो मुद्दों पर कर मिलता है।

इसमें से एक एक्साइज डियूटी है जिसका हिस्सा राज्यों को बंटता है। दूसरी तरफ इन इंधनों पर लगा सेस अकेले केंद्र सरकार का होता है। नियम के मुताबिक केंद्र सरकार इस सेस से राज्यों को कोई हिस्सा नहीं देती।

इसलिए महंगाई का असर इसलिए भी दिख रहा है क्योंकि एक्साइज डियूटी कम होने के बाद कई राज्यो ने भी अपनी तरफ से वैट कम कर जनता को राहत देने की कोशिश की है।

लेकिन दरअसल अगर केंद्र सरकार की चुनावी परेशानी और बढ़ी तो हम आने वाले दिनों में सेस में कटौती भी देख सकते हैं। जिसके बाद ईंधनों के दाम और कम हो जाएंगे।

वैसे इस दौरान महंगाई ने भी तेल के इस खेल के राजनीतिक और आर्थिक गणित को भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। अब बाजार पर गौर करें तो कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी से थोक महंगाई अक्टूबर के त्योहारी महीने में 12.54 फीसदी पर रही, जो पिछले पांच महीने में उसका सर्वोच्च स्तर है।

महंगाई का असर पिछले पांच महीनों में सबसे अधिक

सितंबर में इसका आंकड़ा 10.66 फीसदी रहा था। विशेषज्ञों ने कहा कि अब मांग सुधर रही है, इसलिए उद्योग ऊंची लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं। इसका खुदरा महंगाई पर भी असर पड़ सकता है।

आर्थिक शब्दावली में मुख्य महंगाई कही जाने वाली गैर-खाद्य और गैर-तेल महंगाई अक्टूबर में बढ़कर अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 11.9 फीसदी पर पहुंच गयी।




खुदरा महंगाई भी अक्टूबर में बढ़ी थी, लेकिन इसमें तेजी मामूली रही थी। यह 4.35 फीसदी से बढ़कर 4.48 फीसदी रही थी। इसकी कुछ हद तक वजह प्राथमिक खाद्य उत्पादों का थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) की तुलना में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में अधिक भारांश हो सकता है।

खाद्य उत्पादों का सीपीआई में भारांश 47.25 फीसदी है, जबकि डब्ल्यूपीआई में महज 15.26 फीसदी है। प्राथमिक खाद्य उत्पादों की कीमतों में अक्टूबर में भी गिरावट जारी रही।

हालांकि गिरावट की दर घटकर 1.69 फीसदी रही, जो इससे पिछले महीने में 4.69 फीसदी थी। जिन प्रमुख उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, उनमें फल शामिल हैं।

इनकी कीमतों में वृद्धि सितंबर में 4.47 फीसदी से बढ़कर अक्टूबर में 8.14 फीसदी पर पहुंच गयी। हाल के महीनों के दौरान कीमतों में भारी बढ़ोतरी दर्शाने वाली दालों की महंगाई घटकर अक्टूबर में 5.36 फीसदी रही, जो सितंबर में 9.42 फीसदी रही थी।

सब्जियों की कीमतों में गिरावट की दर घटकर 18.49 फीसदी रह गई, जो सितंबर में 32.45 फीसदी थी। इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा कि सब्जी सूचकांक में माह दर माह बढ़ोतरी हो रही है और नवंबर के शुरुआती आंकड़े दर्शाते हैं कि आलू, टमाटर और प्याज जैसी सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी जारी है। इसका चालू महीने में खाद्य सूचकांक में मौसमी गिरावट पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

हर सामान पर पेट्रोल के दामों का प्रभाव दिख रहा है

केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि अनुकूल सांख्यिकी आधार ने खाद्य कीमतों की कीमतों में बढ़ोतरी को ढक दिया है। इस अवधि में ईंधन एवं बिजली की महंगाई दर 24.81 फीसदी से बढ़कर 37.18 फीसदी हो गयी।

नायर ने इसकी एक वजह कोयला उपलब्धता से संबंधित दिक्कतों को भी बताया, जिनसे बिजली की कीमतों में इजाफा हुआ है। इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री सुनील के सिन्हा ने कहा कि कोयले की उपलब्धता की दिक्कत दूर हो रही है, जिससे हाजिर बिजली कीमतों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी निकट अवधि में नरम पड़ सकती है।

इसके अलावा पेट्रोल में महंगाई बढ़कर 64.72 फीसदी हो गई, जो सितंबर में 54.85 फीसदी रही थी। अब कोरोना के प्रभाव से मुक्त होते देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटते देख यह भी माना जा सकता है कि बिना केंद्र सरकार के कठोर मानसिकता के, फिलहाल महंगाई पर रोक संभव नहीं है।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक संकट के दौरान कारोबारियों ने व्यापार में जो घाटा उठाया है, उसकी भरपाई भी वे जल्द से जल्द करना चाहेंगे साथ ही अपने मुनाफे को भी पूर्व की तुलना में अधिक ऊपर ले जाना चाहेंगे। ऐसे में सरकार जनता या व्यापारी किसके तरफ हैं, यह भी सरकार के फैसले से स्पष्ट हो जाएगा।



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