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आत्महत्या के 38 साल बाद न्याय मिला झारखंडी डाक्टर को




  • टेस्ट टियूब बेबी के रचनाकार के साथ हुआ था अन्याय
  • डाक्टरों ने भी सबसे अधिक विरोध किया था उनका
  • विदेश जाने तक पर सरकार ने लगा दी पाबंदी
  • आंख के ईलाज में पदस्थापित कर दिया था
एस दासगुप्ता

कोलकाताः आत्महत्या किसी कर्ज अथवा पारिवारिक परेशानी में नहीं

की थी। एक अद्भुत आविष्कार के बाद भी जब लगातार उन्हें हर मंच

पर उनके ही सहयोगियों ने अपमानित किया। तब वह धीरे धीरे अंदर

से टूटते चले गये। हमलोगों की याददाश्त बड़ी कमजोर है। इसलिए

दोबारा से याद दिला देता हूं कि वर्ष 1978 के तीन अक्टूबर को देश में

प्रथम टेस्ट टियूब शिशु का जन्म हुआ था। उस बच्ची का नाम रखा

गया था दुर्गा। इस बच्ची को बाद में लोगों ने कनुप्रिय अग्रवाल के नाम

से जाना है। उनके जन्म के पीछे जिस डाक्टर का योगदान था, वही है

डाक्टर सुभाष मुखोपाध्याय

यानी भारत के प्रथम टेस्ट टियूब बेबी के असली रचनाकार। इस बारे

में यह जानकारी शायद कम लोगों को ही है कि वह मूल रुप से झारखंड

के हजारीबाग के रहने वाले थे। उनकी मौत पर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक

तपन सिन्हा ने एक फिल्म भी बनायी थी, जिसका नाम था एक

डाक्टर की मौत

67 दिनों के अंतराल में हासिल हुई थी सफलता

इस घटना के  महज 67 दिन पहले ब्रिटेन के दो वैज्ञानिकों ने भी ऐसा

ही कमाल कर दिखाया था। इन दोनों वैज्ञानिकों के नाम है पैट्रिक

स्टेप्टो और रॉबर्ट एडवर्डस। यानी इस रिकार्ड के मुताबिक दुनिया के

दूसरे टेस्ट टियूब शिशु का जन्म भारत में हुआ था और डॉ सुभाष

उसके रचनाकार थे। लेकिन यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों

से इतनी दूरी पर बैठकर उन्होंने अपना रिसर्च किया। इसके बाद भी

जीवित अवस्था में उन्हें कभी सम्मान नहीं मिला बल्कि अन्य डाक्टरों

ने उसकी इस विधि का जरूरत से ज्यादा मजाक उड़ाना। अपने ही देश

में इस किस्म के अपमान की वजह से वह अंदर ही अंदर टूटते चले

गये। अब यह बात साफ है कि उस दौर के डाक्टरों का एक समूह ही

उनके खिलाफ काम कर रहा था। साथ में ऐसे प्रभावशाली डाक्टरों को

सरकारी संरक्षण भी प्राप्त था। इसी साजिश की वजह से उनकी खोज

के खिलाफ एक जांच कमेटी बैठायी गयी थी। इस कमेटी में वैसे

सदस्य डाक्टर थे, जिन्हें गर्भधारण अथवा शिशु जन्म के कोई

विशेषज्ञता हासिल ही नहीं थी। इसी कमेटी ने डॉ सुभाष की खोज को

जाली प्रमाणित कर दिया।

साजिश के तहत शोध को फर्जी करार दिया गया

इस दौरान उनके खोज की चर्चा विदेश तक फैली थी। उन्हें जापान के

एक विश्वविद्यालय ने अपने सम्मेलन में आमंत्रित भी किया था। डॉ

सुभाष इसमें भाग भी लेना चाहते थे। लेकिन उस वक्त की पश्चिम

बंगाल सरकार  ने इसे रोक दिया। उन्हें जापान के विश्वविद्यालय के

खर्च पर जाना था लेकिन उसे भी रोक दिया गया और उनके विदेश

जाने पर पाबंदी लगा दी गयी।

इस घटना के बाद भी उनके खिलाफ खड़े चिकित्सकों के दल की

साजिश जारी रही। उन्हें पहले बाकुंड़ा मेडिकल कॉलेज और फिर आर

जी कर मेडिकल कॉलेज में स्थानांतरित किया गया। इसके बाद उन्हें

क्षेत्रीय ऑपथॉल्मोलॉजी विभाग में भेज दिया गया। इंसानी हारमोन

पर काम करने वाले इस डाक्टर का आंख के ईलाज में क्या काम, इस

सवाल का उत्तर देने के लिए आज कोई मौजूद नहीं है। लेकिन यह

अन्याय हुआ था। यह अपमान वह सहन नहीं कर पाये और 1981 के

19 जून उन्होंने खुदकुशी करने जैसा कठिन फैसले को अंजाम दिया।

आत्महत्या करने के बाद भी तकनीक पर काम हुआ 

आत्महत्या के बाद भी लेकिन उनकी खोज की चर्चा तब भी जारी रही।

बाद में डॉ आनंद कुमार ने इसी शोध को दुनिया के सामने दोबारा से

प्रस्तुत किया। अब नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज में आइवीएफ

सेंटर चालू करने का काम हो रहा है। अच्छी बात यह भी है कि यहां यह

काम मुफ्त में किया जाएगा ताकि गरीब परिवारों को भी इसका समान

लाभ मिल सके। इसी वजह से उनकी खोज को अब मान्यता मिल

चुकी है। सिर्फ दुख इस बात का है कि अपने जीवित रहते हुए वह इस

सफलता को अपनी आंखों से नहीं देख पाये। बल्कि प्रताड़ित और

अपमानित होने की वजह से उन्होंने आत्महत्या का रास्ता अपना

लिया। कई बार इतिहास का न्याय अधिक समय के बाद आता है।

शायद डॉ सुभाष मुखोपाध्याय के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।



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