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भारतीय महिला के सवाल से खुला बीमारी के ईलाज का नया रास्ता

  • जेनेटिक बीमारियों का नया ईलाज जिनोम जांच
  • अपने होने वाले बच्चे के बारे में पूछा था सवाल
  • जांच की गाड़ी आगे बढ़ी तो नये राज खुलते गये
  • वैज्ञानिक इसे पूरे देश में और फैलाना चाहते हैं
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः भारतीय महिला ने अपनी स्वाभाविक चिंता से अपने डाक्टर से

एक सवाल पूछा था। यह एक साधारण सा सवाल ही जेनेटिक्स की दुनिया में

नया द्वार खोलने वाला साबित हुआ। इसके जरिए वैज्ञानिकों ने यह खोज

निकाला कि अनेक किस्म की जेनेटिक बीमारियों की रोकथाम का रास्ता

जिनोम की जांच से खुल सकता है। समय रहते उसका पता चलने की वजह

से उन्हें स्थायी तौर पर रोका भी जा सकता है।

यह कोझिकोड की घटना है। जहां के सरकारी अस्पताल में एक महिला

अपने गर्भ की जांच कराने आयी थी। इसी क्रम में उसने डाक्टर से यह सवाल

पूछा कि क्या वह इस बात की जांच की जा सकती है कि गर्भस्थ शिशु को

भी वही बीमारी होगी, जो उसकी पहली संतान को है। उसकी पहली संतान

को जेनेटिक बीमारी थी। जिसकी वजह से उस छह साल की बच्ची का

संतुलित विकास नहीं हो रहा था, उसके कई आंतरिक अंग ठीक ढंग से

काम नहीं कर पा रहे थे। वह धीरे धीरे इन्हीं गड़बड़ियों की वजह से शारीरिक

और मानसिक तौर पर कमजोर होती चली जा रही थी। बीमारी का पता

चलने के बाद भी डाक्टर उसे दूर नहीं कर पाये थे।

इस सवाल की वजह से उसकी जांच करने वाले चिकित्सक डॉ गीता

गोविंदराज को गहराई तक सोचने पर मजबूर किया। उन्होंने इस सवाल

का उत्तर तलाशने के लिए इंस्टिट्यूट ऑफ जिनोमिस्क एंड इंट्रीग्रेटिव

बॉयोलॉजी केंद्र, नईदिल्ली से संपर्क साधा। इस संस्थान का संचालन

सीएसआइआर के द्वारा किया जाता है। इस नई किस्म की चुनौती को

सामने पाकर वहां के वैज्ञानिकों ने शोध को आगे बढ़ाने का फैसला किया।

इसके लिए वैज्ञानिकों ने पहली संतान के जीनों का सबसे पहले विश्लेषण

किया।

भारतीय महिला ने सवाल किया तो शोध को दिशा मिली

जिसमें यह पाया गया कि दरअसल उस बच्ची में क्या क्या जेनेटिक दोष है।

इसका विश्लेषण होने के बाद समय कम रहने की वजह से गर्भस्थ शिशु की

भी जेनेटिक जांच की गयी। समय कम होने की वजह से यह जांच हैदराबाद

की सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बॉयोलॉजी में किया गया। जांच में

इस बात की पुष्टि हुई कि गर्भस्थ शिशु को वैसे कोई भी जेनेटिक बीमार नहीं

हैं, जो माता की चिंता के कारण बने हुए थे। इस जानकारी से माता और

परिवार के लोग प्रसन्न हुए। लेकिन वैज्ञानिकों को नये सिरे से जेनेटिक

बीमारियों की खोज और निदान का नया रास्ता मिल गया।

अब इस एक सवाल की वजह से जेनेटिक बीमारियों की समय से पूर्व पहचान

और उसके निदान का यह रास्ता जेनेटिक्स की दुनिया से खुल चुका है। अब

वैज्ञानिक यह मानते हैं कि किसी भी किस्म की विसंगति की आशंका होने पर

गर्भ में भी शिशु की जांच और उसके ईलाज का इंतजाम किया जा सकता है।

इस प्रारंभिक ईलाज का फायदा यह होगा कि जब शिशु पैदा होगा तो वह

विकार से लड़ने की शक्ति लेकर पैदा होगा। कई मामलों में उसके विकार गर्भ

से बाहर आने के पहले ही समाप्त हो चुके होंगे।

शोध का दायरा आगे बढ़ा तो इस बात का भी खुलासा हुआ कि भारतीय

परिवेश में ऐसी जेनेटिक बीमारी से अनेक बच्चे पीड़ित होते हैं। इस शोध को

आगे बढ़ाते हुए वैज्ञानिक इसे आम आदमी तक पहुंचाना चाहते हैं।

सीएसआइआर के महानिदेशक शेखर सी मंडे ने कहा कि इस किस्म की

बीमारी भारतीय महिलाओं में कई कारणों से होती है। इसलिए समय रहते

इसके ईलाज से अनेक बच्चों को जेनेटिक विकास से बचाया जा सकता है।

भारत में जेनेटिक आंकड़ों की अब भी बहुत कमी

शोध केंद्र का आंकड़ा बताता है कि अकेले भारतवर्ष में इस किस्म की बीमारी

की चपेट में करीब सात करोड़ भारतीय हैं। दरअसल जेनेटिक शोध देश में

उतना विकसित नहीं होने की वजह से लोगों को इस बारे मे ज्यादा जानकारी

ही नहीं मिल पाती। दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले गरीब लोग बीमारी की

असली वजह तक नहीं जान पाते। इसलिए वैज्ञानिक ही इस शोध को देश में

दूर दराज तक फैलाने की योजना पर काम कर रहे हैं। भारतीय महिला समूहों

तक जब इस किस्म की जांच सुलभ होगी तो अनेक बच्चों को जन्म लेने के

पहले ही बीमारी की चपेट में आने से बचाया जा सकेगा। इस पद्धति के विकास

से भारत में भी जेनेटिक आंकड़ों का भंडार जैसे जैसे समृद्ध होगा, वैसे वैसे

ईलाज की पद्धति आसान होती चली जाएगी। वर्तमान में भारत के पास ऐसे

आंकड़े कम होने क वजह से भारतीय वैज्ञानिकों को पश्चिमी देशों से प्राप्त

आंकड़ों पर ही निर्भर करना पड़ता है।

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