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भारतीय राजनीति में महिलाएं ज्यादा अपमानित होती हैः अमनेस्टी की रिपोर्ट

नईदिल्लीः भारतीय राजनीति के बारे में अंतर्राष्ट्रीय संस्था अमनेस्टी

ने अपनी एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट की खास बात यह है कि

इसमें भारतीय राजनीति में सक्रिय महिलाओं के प्रति सोशल मीडिया

में अपनाये जाने वाले भेदभाव को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट का

निष्कर्ष है कि भारतीय राजनीति में महिलाओं को ज्यादा अपमानित

होना पड़ता है। सोशल मीडिया में उनके फैसलों की न सिर्फ आलोचना

होती है बल्कि उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है।

अमनेस्टी की रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह महिला मुसलमान है तो

उन्हें 55 प्रतिशत अधिक अपमान झेलना पड़ता है। अपमान की यह

कार्रवाई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर अधिक चलती है। इसमें से

ट्विटर शीर्ष पर है क्योंकि सामाजिक तौर पर सक्रिय अधिकांश

महिलाएं इस ट्विटर के एकाउंट का इस्तेमाल करती हैं। विकसित देशों

में भी महिलाओं के साथ ऐसा भेदभाव होता है लेकिन भारत में यह

सामान्य से काफी अधिक होने की वजह से अमनेस्टी की रिपोर्ट में

खास तौर पर इसका उल्लेख किया गया है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं पर अधिक हमला

रिपोर्ट के मुताबिक महिला राजनीतिज्ञों को नीचा दिखाने के लिए हर

किस्म के हथियार का इस्तेमाल होता है। इनमें निजी आक्षेप से लेकर

गंदी गालियां तक शामिल हैं। इस संगठन ने वर्ष 2019 के लोकसभा

चुनाव के दौरान यह सर्वेक्षण प्रारंभ किया था। इसका नतीजा है कि

भारत में अभी जो हालत हैं उसके मुताबिक मुसलमान स्त्री के लिए यह

स्थिति और भी कठिन है। इस बारे में खुद आप से भाजपा में शामिल

हुई सामाजिक कार्यकर्ता साजिया इल्मी ने कहा है कि मेरी सोच अथवा

राजनीति को सिर्फ 25 नंबर मिलते हैं जबकि शेष यह तय होता है कि

मैं एक महिला हूं और मुसलमान हूं। उनके मुताबिक महिलाएं इसी

किस्म के अपमान के भय से राजनीति में आगे नहीं आना चाहती

क्योंकि उन्हें ऑन प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ता है। कांग्रेस से जुड़ी

हासीबा अमीन ने कहा कि वर्ष 2014 से कांग्रेस के सोशल मीडिया

कन्वेनर की जिम्मेदारी वह संभाल रही हैं। इस दौरान उन्हें मानसिक

अवसाद की स्थिति तक के गाली गलौज का सामना करना पड़ा है।

बलात्कार की धमकी के अलावा चरित्र पर कीचड़ उछालना तो आम

बात है। यहां तक कि ऐसे अपमानजनक तथ्य पेश किये जाते रहे कि

मैंने तंग आकर अपनी गतिविधियां ही बहुत सीमित कर ली हैं। उनके

मुताबिक जब कोई उनकी बातों का उत्तर सिर्फ गाली और अपमान से

देना चाहता है तो ऐसे में राय व्यक्त करने का फायदा ही क्या है।

ट्रोल पेट्रोल इंडिया नामक एक सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष निकाला गया है

कि 95 महिलाओं पर चर्चा मार्च से मई 2019 तक सीमित रही। इसपर

सत्तर लाख से अधिक ट्विट किये गये।

चुनाव के दौरान 70 लाख ट्विट में 13.8 फीसद गाली

इनमें से अधिकांश अपमानजनक थे। 13.8 प्रतिशत ट्विट परेशानी

बढ़ाने वाले और गाली जैसे ही थे। सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि चुनाव के

दौरान अंग्रेजी मे गाली गलौज की भाषा कम हो गयी जबकि हिंदी में

यह एक जैसी ही रही। शायद इसकी एक वजह ट्विटर द्वारा अपनायी

गयी तकनीक थी, जिसमें इस किस्म की अपमानजनक टिप्पणियों

को रोका जा रहा था और फर्जी एकाउंट से सूचनाए प्रसारित करने वालों

पर पाबंदी लग रही थी। आम आदमी पार्टी की प्रमुख नेता अतिशी ने

कहा कि यह समाज की जिम्मेदारी बनती है कि अगर कोई महिला

सोशल मीडिया पर सक्रिय है तो समाज उसकी सुरक्षा और सम्मान का

ख्याल रखे। इस बारे में ट्विटर के प्रवक्ता का कहना है कि गाली,

परेशान करना और घृणा फैलाने वालों का अब यहां कोई स्थान नहीं है।

हमलोग लगातार इन बातों की निगरानी कर रहे हैं और इस किस्म की

हरकत करने वालों को दंडित करते हुए उनके एकाउंट बंद करते जा रहे

हैं। चुनाव के दौरान इस किस्म की परिस्थितियां अधिक उत्पन्न होती

है। इसलिए ऐसे अवसरों पर ट्विटर अपनी तरफ से खास इंतजाम भी

कर लेता है। इसके लिए अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा

है।

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