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आतंकवाद के खिलाफ भारतीय दृष्टिकोण पूरी तरह जायज







आतंकवाद के खिलाफ दुनिया के अन्य देश अब जाकर अपने दृष्टिकोण को बदलने पर मजबूर हुए हैं।

भारत ने पहली बार यूरोपीय देशों के एक प्रतिनिधिमंडल को कश्मीर जाने की इजाजत दी है।

यह भी अजीब स्थिति है कि जब भारतीयों को वहां जाने पर रोक है तो यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल को किस

कूटनीतिक समझ के तहत वहां जाने की ऐसी अनुमति दी गयी है।

प्रधानमंत्री प्रारंभ से ही इस पर एक राय जाहिर करते आ रहे हैं

वैसे इस क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से वही बात कही है जो वह प्रारंभ से कहते आ रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय संसदीय दल के नेताओं के साथ मुलाकात की। इस दौरान प्रधानमंत्री

नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंकवादियों का समर्थन करने वाले और आतंकवाद के खिलाफ

उसे बढ़ावा देने वाले लोगों को खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम होना चाहिए।

पहले भारत की शिकायतों को दुनिया के अन्य देश और खासकर विकसित एवं पश्चिमी देश

उतनी गंभीरता से नहीं लेते थे। बाद में अपने देश में आतंकवाद का साया पड़ने के बाद उन्हें

वास्तविक स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ है। अब वे भी धीरे धीरे आतंकवाद के खिलाफ

एक राय बनाने में सहमत हुए हैं। खासकर अफगानिस्तान में तालिबान के उदय और बाद के

घटनाक्रमों ने भी पश्चिमी देशों को सबक सीखाया है। बाद में पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन

के मारे जाने की वजह से यह सारा माजरा भी दुनिया की समझ में आ गया है।

आतंकवाद के खिलाफ भारत की बात अब दूसरे देशों की समझ में आयी

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि ऐसी गतिविधियों और संगठनों का समर्थन करने वाले

या नीति के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद दुनियाभर में जम्मू-कश्मीर का मसला छाया हुआ था, पाकिस्तान

की ओर से इस मसले को उठाया जा रहा था। ऐसे में इस चर्चा के बीच यूरोपियन प्रतिनिधिमंडल

का ये दौरा काफी अहम है। जम्मू- कश्मीर जाने वाले यूरोपियन संसद के प्रतिनिधिमंडल में

कुल 28 सदस्य होंगे। अभी तक भारत की ओर से किसी भी विदेशी प्रतिनिधिमंडल को

जम्मू-कश्मीर जाने की इजाजत नहीं दी गई थी। अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद भारत

ने दुनिया के बड़े देशों को अपना पक्ष रखा था, जिसमें सभी नियमों, पाकिस्तान के द्वारा

उठाए जा रहे मुद्दों को समझाया गया था। इस दौरान कई देशों को इस बारे में प्रेजेंटेशन दी गई,

जिसमें पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को भी उजागर किया गया।

इससे पहले भी पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सहित कई मंचों पर कश्मीर के मुद्दे पर दुनिया का

ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की थी। लेकिन चंद अपवादों को छोड़कर किसी भी अन्य देश ने

उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। नतीजा है कि अब पाकिस्तान की सरकार को खुद को बचाये

रखने के लिए कश्मीर के मुद्दे पर अपने देश के भीतर ही आंदोलन करना पड़ रहा है।

दरअसल यह उसकी मजबूरी है क्योंकि ऐसा अगर वह नहीं करता है तो उसके देश के भीतर

चल रहे अलगाववादी आंदोलनों को सर उठाने का मौका मिल जाएगा।

पाकिस्तान अपनी आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहा है

वैसे भी कश्मीर पर से धारा 370 समाप्त किये जाने के बाद वहां जिस तरीके से काम-काज के

तरीके बदल रहे हैं, उसका सीधा असर पाक अधिकृत कश्मीर पर पड़ता दिख रहा है। इस वजह से

भी पाकिस्तान सरकार इस मुद्दे पर वास्तविकता से अपने लोगों का ध्यान भी बंटाये रखना चाहती है।

आतंकवाद के खिलाफ पर अब भारत का रवैया पहले के मुकाबले काफी कठोर है, इसे पाकिस्तान के

अलावा अन्य देश भी अच्छी तरह समझ रहे हैं। इसी वजह से पुलवामा की घटना के बाद जब

बालाकोट पर हवाई हमला हुआ तो किसी भी देश ने खुले तौर पर भारत की कार्रवाई का विरोध

तक नहीं किया। दूसरी तरफ पाकिस्तान सेना और आतंकवादियों को सीमा पर भी कड़ी चुनौतियों

का लगातार सामना करना पड़ रहा है। इस स्थिति में आतंकवाद के खिलाफ अगर प्रधानमंत्री

जीरो टॉलरेंस की बात कह रहे हैं तो इसे यूरोपीय देशों के सदस्य भी बेहतर तरीके से समझ

सकते हैं क्योंकि अधिकांश देशों ने अब आतंकवाद के नुकसान को खुद झेला है।

इनमें सबसे बड़ा नाम अमेरिका का था। जिसने अपने यहां के ट्विन टावर के विस्फोट के बाद

आतंकवाद क्या होता है, इसे अच्छी तरह समझ लिया है। लेकिन अमेरिका आज तक इस सच

को स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि इस तालिबान को बढ़ाने में मुख्य भूमिका उसकी अपनी

रही है। रुस की सेना के खिलाफ संघर्ष करने वाले अफगान लड़ाकों को हथियारों की आपूर्ति

उसके गले में फांस बन चुका है। इसके अलावा लगातार युद्धरत इन आतंकवादियों के पास

अत्याधुनिक हथियार और गोला बारूद किस माध्यम से आ रहे हैं, आतंकवाद के खिलाफ

योजना बनाने के पहले इस पर भी अब विचार किये जाने की जरूरत है।



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