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संक्रमण रोकने पर हावी होती भारतीय पारंपरिक राजनीति,स्पष्ट हो चुका है

संक्रमण रोकने में राजनीति ही सबसे बड़ी बाधक है, यह धीरे धीरे स्पष्ट हो चुका है। इस

घटिया किस्म की राजनीति का असली नुकसान आम जनता को हो रहा है। लेकिन

कोरोना के वैश्विक संक्रमण के दौर में हर किस्म के नुकसान के बाद भी आम आदमी की

सोच का फायदा यह है कि उसे आम और अमरुद का फर्क अच्छी तरह समझ में आ रहा है।

जब तक गाड़ी चल रही थी तो इस गाड़ी को आगे खींच ले जाने की जिम्मेदारियों ने शायद

आम आदमी को यह सोचने का वक्त भी नहीं दिया था। लॉक डाउन के दौरान अपने अपने

घरों में कैद लोग और रोजगार के दूसरे शहर गये लोगों को यह अनुभव एक जैसा हुआ

होगा कि संकट की घड़ी में देश की वर्तमान राजनीति आम आदमी के लिए ज्यादा चिंतित

नहीं होती। लेकिन जो करोड़ों मजदूर बहुत मजबूरी में अपने अपने गांव लौंटे हैं, वे इन

तमाम घटनाओं को लेकर नाराज हैं, यह बात अब किसी से छिपी हुई नहीं है। कोरोना

संक्रमण रोकने की दिशा में जो काम होना चाहिए, उसमें राजनीतिक अड़ंगे कैसे लगाये

जाते हैं अथवा राजनीतिक अड़ंगों की वजह से कोरोना संक्रमण रोकने का अभियान कैसे

बाधित हुआ है, यह देश की जनता के लिए बिल्कुल नया अनुभव है। जाहिर सी बात है कि

आम आदमी के जीवन में प्रभाव डालने वाले सारे तथ्य इस दौरान परिस्थितियों को

बिल्कुल ही उलट देने वाले रहे हैं। इस विषम परिस्थिति में हर कोई यह अच्छी तरह समझ

पाया है कि राजनीति का असली चेहरा कितना घिनौना होता है। इस वास्तविकता को देश

के चारों महानगर सबसे कड़वे तरीके से महसूस कर पा रहे हैं।

संक्रमण रोकने के बदले एक दूसरे को नीचा दिखाने का खेल

मुंबई की बात करें तो वहां कोरोना संक्रमण रोकने के बदले सत्तारूढ़ दल का विरोध करने

की रणनीति पर भाजपा काम कर रही है। दिल्ली में भाजपा और आम आदमी पार्टी की

घमासान में आम आदमी त्राहिमाम कर रहा है। कोलकाता में कोरोना संक्रमण के फैलने के

बीच तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच जारी जंग में कांग्रेस और वाम दल मिलकर

अलग कोना तैयार कर रहे हैं। सबसे अजीब बात यह है कि इस वैश्विक संकट की घड़ी में

भी भाजपा को वर्चुअल रैली आयोजित करने की पड़ी हैं, जो चुनावी तैयारी है। लेकिन

शायद भाजपा के रणनीतिकारों को यह बात अब तक समझ में नहीं आयी है कि कोरोना के

तीन महीनों के दौर में आम आदमी को अंदर से इतना परेशान कर दिया है कि वह

फिलहाल किसी राजनीतिक पचड़े के बारे में सोच तक नहीं पा रहा है। वर्चुअल रैली में जो

चेहरे सक्रिय दिख रहे हैं, वे दरअसल मतदान में आम मतदाता को कितना प्रभावित कर

पायेंगे, इस पर बदली परिस्थितियों में संदेह की पूरी गुंजाइश है। बिहार के एक पुलिस

अधिकारी ने भले ही अपनी वह चिट्ठी वापस ले ली हो, जिसमें मजदूरों के बिहार लौट आने

की स्थिति में अपराध के बढ़ने का अंदेशा व्यक्त किया गया था। लेकिन वास्तविकता के

धरातल पर हम इस आशंका से कतई इंकार नहीं कर सकते हैं। जो लोग रोजगार की

तलाश में दूसरे इलाकों तक गये थे, उनका परिवार उसी रोजगार पर आश्रित था। ऐसे में

उन्हें अपना परिवार पालने के लिए कुछ न कुछ सहारा चाहिए। ऐसे लोगों को अगर

रोजगार नहीं मिल पाया तो जाहिर सी बात है कि वे परिवार पालने के लिए कोई भी रास्ता

अख्तियार करेंगे, यही व्यवहारिक सोच की बात है।

परिस्थितियों से बहुत नाराज हैं आम आदमी

लोग भले ही इस बात को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करें लेकिन भूखा आदमी अपने

और अपने परिवार के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाता है, यह भी जीवन

का सत्य है। संक्रमण रोकने के बदले जो लोग राजनीति के बहाने अन्य राज्यों में सत्ता

दखल की सोच रखते हैं, उन्हें सबसे अधिक इन मजदूरों की नाराजगी की चिंता होनी

चाहिए क्योंकि ऐसे लोग अपने अपने इलाकों में राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह

बदल देने की क्षमता रखते हैं। यूं तो धान की रोपनी के वक्त वैसे भी बहुत लोग अपने गांव

लौट आते थे, इसलिए उनका लौटना चिंता का विषय नहीं है। चिंता की बात यह है कि इस

बार लाखों लोग बिल्कुल खाली हाथ गांव लौटे हैं। ऐसे में कोरोना संक्रमण के बहाने की

राजनीति चमकाने की कोशिश उन्हें भी अच्छी तरह समझ में आ रही है। जिस व्यक्ति का

परिवार भूखा है, जिसके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है, वह वर्तमान राजनीति में

कोई रूचि नहीं लेगा, यह तय बात है। लेकिन गंभीर मसला यह है कि धान की रोपनी

समाप्त होने के बाद ऐसे लोगों के पास जब काम नहीं होगा तब क्या होगा। केंद्र और राज्य

सरकारों ने अब तक इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं की है। सिर्फ मनरेगा के भरोसे इस

संकट से उबरने की कोशिशें नाकाफी होंगी, इस सच को भी समझ लेना होगा।

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