जनता की मूलभूत समस्याओं से भागते राजनीतिक दल

जनता की मूलभूत समस्याओं से भागते राजनीतिक दल

जनता की मूलभूत समस्याओं पर शायद चुनावी राजनीति करने वाले दल ज्यादा कुछ बोलना ही नहीं चाहते।



इसीलिए चुनाव जब जब करीब आता है, उन मुद्दों पर नूरा कुश्ती का दौर प्रारंभ हो जाता है,

जिनका आम आदमी से ज्यादा कोई वास्ता नहीं होता।

इस बार भी यही खेल दोहराया जा रहा है।

फर्क सिर्फ इतना है कि पिछले पांच वर्षों में देश के मतदाताओं की जागरुकता का स्तर पहले के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ गया है।

इस वजह से राजनीतिक दलों को भी अपने पक्ष में माहौल बनाने में दिक्कत जा रही है।

इस परिस्थिति से जो सवाल पैदा होता है वह यह है कि क्या वाकई राजनीतिक दल भी

अब अपने चुनावी घोषणा पत्रों को गंभीरता से नहीं लेते।

या घोषणा पत्र में उल्लेखित तथ्यों को बिना विचार के ही शामिल किया जाता है।

जिसका नतीजा है कि उन मुद्दों पर दोबारा बात करने से हर राजनेता कतराने लगता है।

अभी कई राज्यों में चुनाव प्रचार चल रहा है और अंदर ही अंदर लोकसभा चुनाव की तैयारियां भी हो रही हैं।

मजेदार स्थिति यह है कि आम जनता पिछले चुनाव के वादों को याद कर बैठी हुई है।

लेकिन भाजपा के साथ साथ विपक्ष भी उन्हीं सवालों से भागता नजर आ रहा है।

जनता के सवालों से भागती नजर आ रही हैं पार्टियां

मोदी सरकार के आखिरी बजट के बाद भी विपक्ष ने यह सवाल नहीं पूछा है कि

बीजेपी सरकार अपने 2014 के घोषणापत्र के वादों को कब पूरा करेगी।

इस मायने में विपक्ष बेहद नाकारा साबित हुआ है।

हर चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियां घोषणापत्र जारी करती हैं।

इसमें पार्टी बताती है कि अगर वह सत्ता में आई, तो क्या क्या करेगी।

इसमें पार्टी के नीति सिद्धांतों के साथ ही कार्ययोजना का भी ब्योरा होता है।

आम तौर पर ये घोषणापत्र एक बुकलेट की शक्ल में जारी किए जाते हैं और इसे विधिवत लॉन्च किया जाता है।

उम्मीद की जाती है कि जीतने वाली पार्टी अपने नीति-सिद्धांतों पर चलेगी और उन चुनावी वादों को पूरा करेगी, जिनका जिक्र चुनाव घोषणापत्र में किया गया है।

बीएसपी को छोड़कर देश की सभी बड़ी पार्टियां चुनाव घोषणापत्र जारी करती हैं।

जनता को कोई तो 2014 के घोषणापत्र पर जानकारी दे

2014 में बीजेपी ने एक व्यवस्थित चुनाव घोषणापत्र जारी किया था।

इसमें देश के लिए पार्टी की परिकल्पनाओं के साथ ही पार्टी की नीतियों और कार्ययोजनाओं का जिक्र था।

बीजेपी सरकार अपने कार्यकाल के चार साल पूरे करने वाली है।

सरकार का आखिरी पूर्ण बजट पेश किया जा चुका है।

अगला बजट अगली नवगठित संसद में ही पेश होगा।

कायदे से बीजेपी को चार साल का कार्यकाल पूरा होने पर एक विस्तृत दस्तावेज लाकर यह बताना चाहिए कि

इस दौरान किन चुनावों वायदों पर अमल कर दिया गया, किन योजनाओं पर काम चल रहा है

और जिन योजनाओं पर काम नहीं हो पाया, उसकी वजह क्या रही।

विपक्ष का यह अनिवार्य राजनीतिक कार्य है कि वह सरकार के कामकाज पर नजर रखे और बताए कि

सरकार ने अपने किन चुनावी वादों को पूरा नहीं किया या किन वादों पर अब तक काम शुरू नहीं हुआ है।

अभी की स्थिति यह है कि सरकार चुनींदा तौर पर ऐसे दावे कर रही है कि उसने क्या क्या काम कर लिए हैं।

सरकार अपनी उपलब्धियों की चर्चा कर रही है, जो उचित भी है।

जनता को किसी पक्ष ने नहीं बताया कि कौन काम क्यों नहीं हो पाया

लेकिन प्रचार के इस सरकारी अभियान को अभी चुनाव घोषणापत्र से असंबद्ध दिखाया जा रहा है।

अभी तक बीजेपी या सरकार की तरफ से वह पहली प्रचार सामग्री नहीं आई है, जिसमें बिंदुवार यह बताया गया हो कि

सरकार ने अब तक किन-किन चुनावी वादों पर अमल कर लिया है।

हालांकि इस बात की चर्चा है कि सरकार ऐसा कोई दस्तावेज या प्रचार अभियान शुरू करने वाली है।

दूसरी तरफ हर बात पर सरकार को कोसने पर आमादा रहने वाले विपक्षी दल भी इन मुद्दों पर बात करने से कतराते नजर आ रहे हैं।

इससे जो सवाल उभरकर सामने आता है कि क्या वाकई राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणा पत्र को

जारी करते वक्त गंभीर चिंतन करते हैं।

चुनावी घोषणाओं को पूरा कैसे किया जाएगा, उसकी कोई कार्ययोजना भी उनके पास होती है।

अथवा सिर्फ लोकप्रियता बटोरने के लिए कुछ भी आश्वासन दे दिया जाता है।

जिसे पूरा करने की जहमत सरकार नहीं उठाती।

पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त जनता जिस तरीके से कांग्रेस के कुशासन के खिलाफ मौन तरीके से खड़ी हुई थी,

वह इतना जतलाने के लिए पर्याप्त है कि बिना किसी शोर शराबे के भी कठोर फैसले सुनाये जा सकते हैं।

इन पांच वर्षों में जनता को सोशल मीडिया अथवा वैकल्पिक मीडिया से ढेर सारी सूचनाएं प्राप्त करने की आदत हो चुकी है।

इसलिए भारतीय मतदाता को अब आसान बकरा समझना भूल होगी।



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