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भारतवंशी वैज्ञानिकों ने फिर से अमेरिका में कर दिखाया कमाल

  • कोरोना मरीजों को दूसरी दवा से ठीक करने का दावा

  • ऑटो इम्युन रोगियों की दवा आजमाया गयी थी

  • सांस लेने की दिक्कतों को कम कर देता है यह

  • इस्तेमाल से मृत्युदर में उल्लेखनीय कमी दर्ज

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः भारतवंशी वैज्ञानिकों के एक दल ने अमेरिका में फिर से नई खोज की है।

इनलोगों ने अलग किस्म की दवाइयों के मिश्रण से कोरोना मरीजों का ईलाज किया है।

इसके उत्साहवर्धक नतीजे निकले हैं। इन वैज्ञानिकों ने कोरोना संक्रमण और मरीजों के

हाल पर गहन शोध के बाद उनपर इन दवाइयों का असर देखा है। अब इस बारे में शोध

सफल होने के बाद एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में इस शोध के निष्कर्षों को प्रमुखता के साथ

प्रकाशित भी किया गया है।

भारतवंशी वैज्ञानिकों ने कोरोना मरीजों को इंटरल्यूकिन-6, सारीलुमाब या टोसिलिजुमाब

के डोज दिये थे। इनका इस्तेमाल आम तौर पर ऑटो इम्युन रोगियों पर किया जाता है।

खास तौर पर जिन्हें रियूमाटोइड आर्थाराइज की परेशानी है अथवा जिन्हें शारीरिक सूजन

से तकलीफ है, उन्हें यह दवाइयां दी जाती रही है। अब कोरोना मरीजों पर इन्हें आजमाने

के बाद यह बताया गया है कि प्रारंभिक अवस्था में ही मरीजों को यह दवा देने से और भी

बेहतर नतीजे सामने आये हैं। इससे मृत्यु दर को कम करने में उल्लेखनीय सफलता मिली

है। साथ ही प्रारंभिक अवस्था में इन मिश्रणों के इस्तेमाल से रोगियों को वेंटीलेटर पर

रखने की आवश्यकता भी कम हुई है। प्रकाशित शोध प्रबंध के मुताबिक इंटरल्यूकिन-6 के

इस्तमाल से बेहतर नतीजे मिले हैं। यानी इस दवा का परिणाम अभी इस्तेमाल होने वाले

रेमेडेसिवीर अथवा डेक्यामेथासोन से बेहतर पाया गया है। वर्तमान में इन्हीं दो दवाइयों का

इस्तेमाल कोरोना मरीजों पर हो रहा है। वैसे खास तौर पर कोरोना मरीजों के लिए कोई

निर्दिष्ट दवा नहीं बनी है जबकि वैक्सिन बनाने का काम प्रगति पर है।

भारतवंशी वैज्ञानिकों ने बोस्टन अस्पताल में इसे जांचा है

बोस्टन विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिक मनीष सागर ने इस अनुसंधान के बारे में

जानकारी देने के क्रम में यह भी बताया है कि इसके बाद हम इस पद्धति को और बेहतर

बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसका मकसद कोरोना मरीजों को बेहतर और त्वरित

लाभ दिलाना है। अब तक का निष्कर्ष यही है कि कोरोना वायरस के अधिक फैल जाने पर

जो सांस लेने की परेशानी होने लगती है, उसमें यह रामवाण का काम कर रहा है।

भारतवंशी वैज्ञानिकों के दल ने वहां के 255 कोरोना मरीजों पर यह शोध कियाहै। इसमें से

149 लोग उतने गंभीर मरीज नहीं थे जबकि 106 लोगों की हालत नाजुक थी। पहले तो

इसका इस्तेमाल उन रोगियों पर किया गया, जिनको सांस लेने में काफी दिक्कत थी। बाद

में अन्य परिणामों को जांच लेने के बाद वैसे रोगियों को भी यह दवा दी गयी, जिनमें

ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता गंभीर रोगियों के मुकाबले बेहतर थी। इन कम गंभीर

रोगियों पर दवाइयों का त्वरित और बेहतर परिणाम सामने आ गया। इस प्रयोग में

मृत्युदर में भी उल्लेखनीय कमी आने का दावा किया गया है।

मृत्युदर कम करने में मिली है उल्लेखनीय सफलता

बोस्टन मेडिकल केयर सेंटर के मरीजों में इसका इस्तेमाल करने के बाद मृत्युदर घटकर

22.9 हो गया है। जबकि इस दवा के प्रयोग से पहले यही मृत्युदर 45 प्रतिशत से अधिक

था। इस शोध के बारे में दूसरे वैज्ञानिक प्रणय सिन्हा ने कहा कि प्रारंभिक चरण में इनके

प्रयोग से मरीजों को सांस लेने में दिक्कत वाली परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। इस

अनुसंधान के निष्कर्षों के सामने आने के बाद भारतवंशी वैज्ञानिकों का मानना है कि इस

विधि से दुनिया भर के अस्पतालों के चिकित्सक भी अपने यहां मृत्यु दर को कम करने

तथा मरीजों को वेंटीलेटर पर रखने की स्थिति को तेजी से कम कर सकते हैं। उससे

अस्पतालों का मृत्युदर तो कम होगा और साथ ही साथ मरीजों को होने वाली परेशानियों

को प्रारंभिक स्तर पर ही दवा देकर बहुत कम किया जा सकेगा। इस अनुसंधान का सबसे

बड़ा निष्कर्ष यह भी है कि इससे मरीज के अस्पताल में रहने की अवधि भी तेजी से कम

होगी। इसका लाभ अस्पताल और स्वास्थ्य सेवा में जो कमी महसूस की जा रही है, वह दूर

होगी और सभी अस्पतालों पर कोरोना मरीजों के ईलाज का जो दबाव है, वह तेजी से कम

हो जाएगा


 

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