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भारतीय न्यायपालिका फिर से अग्निपरीक्षा के दौर में

भारतीय न्यायपालिका साफ तौर पर बंटी हुई है। प्रसिद्ध वकील और सामाजिक कार्यकर्ता

प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना के मामले में अदालत ने सजा सुनायी है। इसी आदेश

को लेकर जो बबंडर मचा है, उसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। फैसला सुनेने से

पहले तो शायद भारतीय न्यायपालिका में ऐसा भी कोई पड़ाव अचानक आ सकता है, इस

बार में कोई आकलन नहीं हो पाया था। अवमानना का दोषी ठहराये जाने के तुरंत बाद ही

देश का ध्यान उस ओर आकृष्ट हुआ, जिसकी वजह से प्रशांत भूषण को अवमानना का

दोषी ठहराया गया है। संक्षेप में पूरा मामला प्रशांत भूषण द्वारा दो ट्विट का है, जिसमें

उन्होंने जजों के आचरण पर सवाल उठा दिये हैं। जैसे जैसे मामले की गहराई की बातें

सामने आती गयी यह राज भी उजागर होता चला गया कि आखिर न्यायपालिका नहीं

जजों को उनके द्विट इतने नागवार क्यों गुजरे हैं। इनमें से सबसे अधिक चर्चा में जजों का

सत्तारूढ़ दल के लोगों के नजदीकी रिश्ता का है। इस सच को हर कोई अपनी अपनी

कसौटी पर जांच चुका होगा। लेकिन शायद न्यायपालिका को इस बात की उम्मीद भी नहीं

थी कि सजा सुनाने के बाद आलोचनाओं की सूनामी आ जाएगी और वह सारे मुद्दे फिर से

चर्चा के दायरे में आ जाएंगे, जिन पर आम तौर पर जज सार्वजनिक बहस करने से बचना

चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में भ्रष्टाचार है, यह मामला तो पहले भी सार्वजनिक होता रहा है

लेकिन इस बार प्रशांत भूषण के अलावा भी कई अन्य प्रमुख वकीलों ने इसके समर्थन की

बात कही है।

पूरे देश की निगाहें लगी हैं इस पूरे घटनाक्रम पर

नतीजा है कि अब सुप्रीम कोर्ट बच निकलने का रास्ता खोज रहा है कि किसी तरीके से इस

मामले का पटाक्षेप हो और दूसरी तरफ प्रशांत भूषण हैं कि बच निकलने के रास्त पर

चट्टान की तरह अड़े हुए हैं। अधिवक्ता और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण अदालत की

अवमानना के मामले में सज़ा काटने के लिए तैयार हैं लेकिन वे माफ़ी नहीं मांगेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय पहले ही साफ़ कर चुका है कि उनके आवेदन और उनको दी जाने वाली

सज़ा का आपस में कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि अदालत उनको दोषी करार दे चुकी है,

फिर भी जब तक उनके आवेदन पर कोई फैसला नहीं कर दिया जाता तब तक उनको

सुनाई गयी सज़ा अमल में नहीं आएगी। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत

भूषण को 24 अगस्त तक बिना शर्त माफ़ीनामा दाख़िल करने को कहा है , यदि प्रशांत

भूषण माफीनामा देते हैं तो 25 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय उस पर विचार करेगा

लेकिन भूषण ने कहा कि माफीनामा देने का सवाल ही पैदा नहीं होता चाहे अदालत उनको

सज़ा ही क्यों न सुना दे। प्राप्त संकेतों के अनुसार यदि अदालत उनको सज़ा सुनाती है तो

भूषण उससे पहले बड़ी बेंच में सुनवाई की अपील कर सकते हैं। अदालत की अवमानना के

मामले में सर्वोच्च न्यायालय उनको 6 महीने का कारावास और जुर्माने की रकम भरने का

हुक्म दे सकती है। प्रशांत भूषण अपनी उन टिप्पणियों पर कायम हैं जो उन्होंने ट्वीट के

माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को लेकर की थीं। जिस विषय को प्रशांत

भूषण ने उठा दिया है, उसपर बात आगे चली तो निश्चित तौर पर सत्ता से लाभ पाने वाले

अनेक न्यायाधीशों को परेशानी भी हो सकती है।

भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का सवाल महत्वपूर्ण

वह लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते रहे हैं इसलिए इतनी आसानी से हथियार डालने

वाले भी नहीं हैं। अलबत्ता यह अवश्य माना जा सकता है कि भारतीय न्यायपालिका के

लिए यह निर्णय की एक घड़ी है, जिससे यह भी तय होगा कि भारतीय न्यायपालिका का

इसी भारतीय संविधान के तहत भविष्य क्या होगा। सत्ता और न्यायपालिका के बीच का

घालमेल कोई नई बात नहीं है। यह पहला अवसर है जब खुद न्यायपालिका अपनी करनी

पर परदा डालने के लिए किसी और को हथियार बना रहा है। प्रशांत भूषण अपनी बात पर

अड़े हैं और उन्होंने कहा है कि वे तथाकथित अवमानना वाली अपने ट्वीट पर माफी न

मांगने वाला संबंधित बयान भी नहीं बदलेंगे। भूषण ने मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे

और पिछले चार मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठाए थे और उसे लोकतंत्र का

खात्मा बताया था। भूषण ने कोर्ट से कहा है कि जिस बात को मैं सही मानता हूं, उसके

लिए माफी मांगना अपने प्रति छल और अवमानना के समान होगा। महात्मा गांधी की

एक उक्ति का उद्धरण देते हुए भूषण ने कहा, “मैं दया नहीं मांग रहा, न ही दरियादिली की

अपील करता हूं। मेरी राय में एक नागरिक का जो सर्वोच्च कर्तव्य है और जिसे कोर्ट ने

अपराध माना है, उसके लिए कानूनी रूप से जो भी सजा सुनाई जाएगी, उसे स्वीकार करने

के लिए मैं यहां मौजूद हूं।


 

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