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ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे चीन से भी लंबी सुरंग का निर्माण कार्य शुरू

  • 15 किलोमीटर लंबी देश की पहली अंडर वॉटर टनल

  • परियोजना की लागत पांच हजार करोड़ से अधिक

  • चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की तैयारी

  • सीमा तक पहुंच का नया और बेहतर माध्यम

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी:ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे से चीन से भी लंबी भूमिगत सुरंग बनाने का काम अब

भारत ने भी प्रारंभ कर दिया है। यानी भारत हर मोर्चे पर चीन को उसी की भाषा में जवाब

देने की ठान चुका है। गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच उपजे तनाव के बाद केंद्र

सरकार ने अब ब्रह्मपुत्र नदी के बीच चीन से भी लंबी सुरंग बनाने का प्रारंभिक कार्य शुरू

कर दिया गया है। 15 किलोमीटर लंबी इस सुरंग ब्रह्मपुत्र नदी परियोजना को मोदी

कैबिनेट ने इस महीने में मंजूरी दी थी। ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे राष्ट्रीय राजमार्ग 54 से

राष्ट्रीय राजमार्ग-37 को जोड़ने वाली इस फोर लेन टनल से अरुणाचल प्रदेश की

कनेक्टिविटी और मजबूत हो सकेगी। केंद्र सरकार के उच्च स्तरीय सूत्रों के अनुसार इस

खास सुरंग को ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे गोहपुर से नुमालीगढ़ तक बनाया जाएगा।जोरहाट

स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-नॉर्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ

साइंस एंड टेक्नोलॉजी ब्रह्मपुत्र के तहत एक रणनीतिक सुरंग की विशिष्ट भूभौतिकीय

जांच कर रही है। अमेरिकी निर्माण दिग्गज लुइस बर्जर ने संस्थान को जिम्मेदारी दी है

पानी की सुरंग के तहत भारत के पहले निर्माण के लिए अध्ययन करना है। ब्रह्मपुत्र नदी

के नीचे गोहपुर राजमार्ग 52 को ऊपरी असम में नुमालीगढ़ राजमार्ग 37 से जोड़ा जाएगा।

यह भारत का सबसे बेहतर सुरंग होगी।चार लेन की सुरंग में दो ट्यूब्स के अंदर 70 से 80

किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से वाहन चल सकेंगे। इस सुरंग से अरुणाचल प्रदेश से

लगने वाली सीमा तक सैन्य वाहन, रसद और सामरिक वस्तुओं की आपूर्ति कराई जा

सकेगी ।

ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे से यह सैन्य परिवहन का नया मार्ग भी होगा

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-नॉर्थ ईस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड

टेक्नोलॉजी (सीएसआईआर-एनईआईएसटी) के एक अधिकारी ने कहा कि केंद्र ने ब्रह्मपुत्र

नदी के नीचे गोहपुर राष्ट्रीय राजमार्ग-52 को ऊपरी असम में नुमालीगढ़ राष्ट्रीय

राजमार्ग-37 से जोड़ने के लिए एक चार लेन सुरंग के निर्माण को मंजूरी दी गई है। साथ ही

अधिकारी ने कहा कि चीन के साथ बढ़े सैन्य तनाव और हालिया रुख ने इस परियोजना

को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक महत्व दिया है क्योंकि यह अरुणाचल प्रदेश की दूरी को कम

कर देगा। यह महत्वपूर्ण सैन्य आपूर्ति को पूरा करने के लिए एक वैकल्पिक गलियारे के

रूप में भी विकसित होगा और आगे भारतीय सैन्य रसद को बढ़ावा देते हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि यह परियोजना विशेष रूप से पूर्वी हिमालय और पूर्वोत्तर में

भारत की बढ़ती सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व की है। नेशनल

हाईवे एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड ने नदी के पार पानी के नीचे सुरंग

के निर्माण के लिए वैश्विक निर्माण दिग्गज लुई बर्गर को हरी झंडी दे दी है। इस संबंध में

लुई बर्जर ने सीएसआईआर-एनईआईएसटी, जोरहाट को जिम्मेदारी सौंपी है। इसमें

भूकंपीय खतरे के आकलन के अलावा साइट की विशिष्ट गहराई से भूभौतिकीय जांच की

जाएगी।सुरंग में यात्रियों के लिए हवा के इंतजाम के लिए वेंटिलेशन सिस्टम, रोशनी के

लिए लाइट्स, फायर फाइटर्स और ड्रेनेज सिस्टम भी लगाया जाएगा।

अत्याधुनिक सुविधाओँ से लैश होगा यह भूमिगत सुरंग

हालांकि, इस समय अधिकारी ने बताया कि न्यूनतम 5 हजार करोड़ से अधिक की लागत

के बारे में योजना बनाई गई है।आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि इस परियोजना को

लगभग 3 वर्षों के भीतर समाप्त करने की योजना है। सरकार ने इस महीने से 2023 तक

इस काम को समाप्त करने की योजना बनाई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले

महीने इस योजना को शुरू करने की उम्मीद करते हैं। इस काम के लिए तीन विदेशी

कंपनियों को इस काम का हिस्सा बनाया जाएगा, ताकि काम जल्द से जल्द पूरा हो सके।

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