fbpx Press "Enter" to skip to content

टीकों को मंजूरी देने में कहीं हमने जल्दबाजी तो नहीं की

टीकों को मंजूरी देने के मामले में भारत एक तरह से अनजान इलाके में दस्तक दे चुका है।

दरअसल इसके नफा और नुकसान को जानने वाले वैज्ञानिक ही बार बार बिना सोच

समझे लिये गये फैसलों की बड़े नुकसान की आशंका पहले ही जता चुके हैं। ऐसा इसलिए

कहा जा रहा है क्योंकि तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल के पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं।

इसलिए यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि इन टीकों के साइड एफेक्ट्स नहीं

होंगे। परेशानी इस बात को लेकर भी है कि एक बार किसी को साइड एफेक्ट होने के बाद

अनेक बार वैसे लोगों में भी अनेक परेशानियां उभरने लगती हैं, जो शुद्ध तौर पर मानसिक

चिंता की वजह से पनपते हैं। यह अपने किस्म की और बड़ी परेशानी होती है क्योंकि उसमें

मरीज के सेहत के साथ साथ उसके मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान भी रखना पड़ता है। वैसे

यह संकट भी अभूतपूर्व है। हमलोगों को कभी इससे पहले इस किस्म की परेशानियों का

सामना नहीं करना पड़ा था। इसी वजह से इससे पहले कभी भी किसी बीमारी का टीका

इतनी जल्दी नहीं बना था और न ही औषधि नियामकों ने इतनी जल्दबाजी में उन्हें मंजूरी

ही दी थी। लेकिन कोविड-19 महामारी के कहर ने सबको टीकों के विकास की दिशा में

तत्परता से कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। जानकारों का कहना है कि भारत में

इस्तेमाल के लिए दोनों टीकों को अलग तरह की मंजूरी मिलने का मतलब है कि टीका

लगने के बाद किसी तरह का प्रतिकूल असर होने पर उसके मुआवजे की व्यवस्था दोनों

टीकों के लिए अलग हो सकती है।

टीकों को मंजूरी देने का स्थापित नियम कुछ और है

एस्ट्राजेनेका एवं ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के संयुक्त प्रयासों से विकसित कोविशील्ड टीके

का उत्पादन पुणे की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) बड़े पैमाने पर

कर रही है। कोविशील्ड को भारत में इस्तेमाल की मंजूरी कुछ दिन पहले ही मिली है। इसी

तरह स्वदेशी कंपनी भारत बायोटेक के कोवैक्सीन टीके को क्लिनिकल परीक्षण मोड में

‘आपात इस्तेमाल’ की ही मंजूरी मिली है। सरकार ने साफ किया है कि कोवैक्सीन टीके का

इस्तेमाल तीसरे चरण के परीक्षणों का ही विस्तारित रूप है। कानूनी जानकारों का मत है

कि क्लिनिकल परीक्षण वाले कोवैक्सीन टीके की खुराक लेने वाले लोग किसी परेशानी की

स्थिति में मुआवजा पाने के हकदार होंगे। इंडसलॉ के पार्टनर कार्तिक गणपति कहते हैं,

‘अगर किसी दवा का इस्तेमाल परीक्षण का हिस्सा है तो फिर वॉलंटियर औषधि नियमन

कानून के अनुरूप मुआवजा पाने के लायक होगा। इस मुआवजे के तहत इलाज पर होने

वाला खर्च और मौत की स्थिति में वित्तीय मुआवजा भी शामिल होगा।’ औषधि नियमों

के मुताबिक, दवा का प्रायोजक किसी टीके से नुकसान होने की स्थिति में पीडि़त का

मेडिकल खर्च देने के लिए उत्तरदायी होगा। दवा या टीके से होने वाले नुकसान की

गंभीरता के अनुपात में ही मुआवजे की राशि तय होती है।

अगर साइड एफेक्ट हुआ तो उससे मरीज कैसे निपटेगा

मसलन, स्थायी विकलांगता, मौत या अस्पताल में इलाज से ठीक हो सकने वाली स्थिति

के लिए अलग-अलग मुआवजा होता है। अगर औषधि लेने के बाद किसी व्यक्ति को ऐसी

स्थिति का सामना करना पड़ता है तो एक आचार समिति समुचित मुआवजे के बारे में

अपनी राय देती है। दूसरी तरफ पूर्ण इस्तेमाल की अनुमति प्राप्त कोविशील्ड टीके से

किसी तरह की मुश्किल पैदा होने पर क्षतिपूर्ति व्यवस्था एकदम अलग हो सकती है।

हालांकि यह साफ नहीं है कि टीका बनाने वाली कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट को किस तरह की

जमानत दी गई है। परंपरागत तौर पर किसी दवा को मंजूरी मिलने एवं जन-उपयोग के

लिए जारी किए जाने के बाद प्रतिकूल असर झेलने वाले के पास टीका निर्माता को चुनौती

देने के बहुत कम विकल्प ही होते हैं। ऐसी स्थिति में पीड़ित इस आधार पर अदालत का

रुख करते हैं कि अमुक दवा या टीका नकली, मिलावटी, गलत लेबल वाला था या फिर

उसके विनिर्माण में ही गड़बड़ी थी। ऐसे मामले औषधि एवं सौंदर्य उत्पाद अधिनियम के

तहत दायर किए जाते हैं। हालांकि अगर दवा के फॉर्मूले में किसी तरह की गड़बड़ी है तो

फिर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम या अपकृत्य कानून के तहत अपील की जा सकती है।

दवा उदयोग का काला धंधा कोरोना से बता दिया है

लेकिन यह ताकतवर दवा कंपनियों के खिलाफ लंबे समय तक चलने वाली एवं महंगी

सुनवाई होगी। इसके अलावा कार्य-कारण संबंध को साबित करने वाले पुख्ता सबूतों की

भी जरूरत होगी। भारत सरकार ने भी कोवैक्सीन टीके की मंजूरी देते समय ‘आपात

इस्तेमाल’ शब्दावली का इस्तेमाल किया है लेकिन कानून में इसका जिक्र नहीं है। इस

तरह ऐसे शब्दों को शामिल कर शायद सरकार ने एक अनूठा रुख अपनाया है। ब्रिटेन एवं

ऑस्ट्रेलिया जैसे देश कुछ टीका निर्माताओं को मुकदमों से जमानत देने पर राजी हो गए

हैं। अमेरिका पहले ही कानून बना चुका है। इसलिए सूचना तकनीक के माध्यम से दुनिया

का हाल जानने वालों के मन मे स्वाभाविक तौर पर भारतीय टीकाकरण को लेकर कई

सवाल उपज रहे हैं।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  • 0
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from HomeMore posts in Home »
More from कोरोनाMore posts in कोरोना »
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from व्यापारMore posts in व्यापार »
More from स्वास्थ्यMore posts in स्वास्थ्य »

Be First to Comment

... ... ...
%d bloggers like this: