fbpx Press "Enter" to skip to content

इंडिया और भारत के बीच दूसरा देश विभाजन एक लघु फिल्म

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः इंडिया और भारत पर काफी लंबे समय से बहस होती आयी है। यह पहला मौका है

जब हम इस इंडिया और भारत के बीच के अंतर को अपनी खुली आंखों से देख पा रहे हैं।

वीडियो में समझिये इसी विशाल अंतर की सोच को

अपने बच्चे को सूटकेस पर लिटाकर सूटकेस खींचते हुए अपने घर की तरफ कदम बढ़ाती

हुई महिला को शहरी भारत यानी इंडिया ने देखा है। लेकिन कभी हाकिमों को यह ख्याल

भी आया कि जिस हवाई अड्डे पर वे हवाई जहाज से इंडियंस को एयर इंडिया के हवाई

जहाज से उतार रहे हैं, उन हवाई अड्डों को किसने अपने खून पसीने से बनाया है। जिन

रेल की पटरियों पर इनदिनों श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलायी जा रही हैं, उन्हें समतल कर ट्रेन

चलने लायक किसने बनाया है। या जिन हाई वे पर आप फर्राटेदार गाड़ी से सर्र से निकल

जाते हैं, उन सड़कों को आखिर बनाया किसने हैं।

जिन कारखानों की बदौलत आप सूट बूट में बड़े लोगों के बीच घूमते हैं, उनमें अपनी हाड़

जलाता कौन है। आलीशान बहुमंजिली इमारतों में रहने का घमंड पाले लोगों ने कभी सोचा

भी है कि इस बहुमंजिली इमारत की ईंटों को बनाया किसने हैं या उन्हें ऊपर पहुंचाया

किसने है। सभी का उत्तर है नहीं। दरअसल यही इंडिया और भारत का मूल अंतर है।

ब्रिटिश शासन काल में जिस शासन व्यवस्था को हमारे हाकिम अपने फायदे के लिए नहीं

बदल पाये, वह ऐसे ही नतीजे देता है। शायद दुनिया में किसी अन्य देश में इस किस्म का

सामूहिक विस्थापन नहीं हुआ होगा। कोई आंकड़ा नहीं है फिर भी उल्लेखित सरकारी

तथ्यों के मुताबिक हर राज्य के पास अपने लाखों लोग वापस लौट रहे हैं। कभी सोचा भी

था कि इन मजदूरों की कमाई से उनका घर तो चलता है, लेकिन इसी कमाई के पैसे से

सरकार को राजस्व भी मिलता है।

दोनों ही स्थितियों में इंडिया और भारत दोनों को पैसा मिलता है इनसे

जी नहीं कभी नहीं सोचा था। दरअसल आपको यह सोचने की फुर्सत भी नहीं थी और आप

इसे सोचना भी नहीं चाहते थे क्योंकि इससे आपकी सुविधाओं में कटौती होती नजर आती

है।

सड़कों पर पैदल चलते लाखों लोग अपने गांव लौट जाना चाहते हैं। अब सरकार की नींद

खुली है। दरअसल रणनीतिकारों ने समझाया है कि ऐसे लोग जो सड़कों पर पैदल चल रहे

हैं, वे अगले चुनाव में सरकार बनाने और गिराने में भी इस हालत को याद कर मतदान

करेंगे। जिन दो प्रतिशत लोगों के लिए सरकारें पलक बिछाये रहती हैं, उनके वोट से

चुनावी जीत हासिल नहीं की जा सकती है। हमलोगों ने अपनी आंखों से देश का विभाजन

होते तो नहीं देखा था। लेकिन उस दौरान की क्या कुछ विकट स्थिति रही होगी, इसे आज

सीधे तौर पर महसूस किया जा सकता है। गनीमत यह है कि परेशानी में होने के बाद भी

इन पैदल यात्रियों की सिर्फ पुलिस की लाठियां खानी पड़ी है। 1947 के देश विभाजन का

दौर अत्यंत हिंसक था।

इंडिया और भारत के अंतर को समझने के लिए कोरोना काल का यह लॉक डाउन का दौर

अपने आप में पर्याप्त है। इंडिया की सोच विदेश से हवाई जहाज से अपने प्रवासी भारतीयों

को लाने की है। दूसरी तरफ इंडिया की भलाई सोचने वालों ने भारत के मजदूरों को अपनी

सोच से बाहर कर दिया था। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग इस बार भी यह सोचना भूल गये

कि जिस इंडिया की स्थिति पर उन्हें गर्व हैं, उसे भारत के इन्हीं मजदूरों ने बनाया है।

अपने खून पसीने से सींचने वालों इन मजदूरों की आज जो हालत है वह यह बता रही है कि

दरअसल देश का आम आदमी सरकार की सोच में कहां रहता है।

इंडिया और भारत का फर्क तो हुक्मरानों की सोच में है

गरीबों को मुफ्त भोजन देकर सरकार ने गृहयुद्ध जैसी स्थिति को टालने का काम किया है।

यह भी निश्चित तौर पर हमारे संविधान में वर्णित समाजवादी सोच का परिचायक है।

लेकिन बराबरी के अधिकार की चर्चा जो हम आज तक करते आये हैं, वह दरअसल

व्यवहार में कहीं नहीं है, यह तो इंडिया और भारत के बीच जारी इस विभाजन में साफ

साफ नजर आ रहा है।

आज दो दर्जन से अधिक लोगों का एक जत्था रांची के नामकुम से आगे सिदरौल के पास

मिला। वे सभी चेन्नई के एक प्लास्टिक कारखाना में काम करते थे। वहां काम बंद होने के

बाद मजबूरी में सभी को वहां से निकलना पड़ा। साइकल पर सभी एक साथ पिछले पांच

तारीख को निकल पड़े हैं अपना गांव जाने के लिए। यह दल रात के दो बजे से सुबह आठ

बजे तक लगातार यात्रा करता है। फिर धूप में विश्राम करने के बाद फिर चार बजे से

लगातार रात के दस बजे तक सफर करते हुए आज यहां आ पहुंचा है। इन सभी को बिहार

के राजगीर जाना है। अब गांव करीब होने की वजह से हौसला बुलंद है। लेकिन लगातार

साइकिल चलाने का असर सभी के पांवों पर साफ नजर आता है। वे अब दोबारा लौटकर

चेन्नई जाना नहीं चाहते।

जो लौट गये उनकी भरपाई कैसे होगी यह भी सोच लो

इंडिया और भारत के बीच जारी इस संघर्ष में कभी सोचा भी है कि अगर वे मजदूर अपने

गांव में ही संघर्ष करते रहे तो उन बड़ी बड़ी फैक्ट्रियों का क्या होगा। वहां काम कौन करेगा।

मजदूर तो अपने गांव के पास शारीरिक श्रम से जीवन यापन करने के लिए तैयार हैं। अब

कारखानों और सड़कों के निर्माण के साथ साथ हवाई अड्डा बनाने के लिए मजदूर कहां से

लाओगे।

याद रखिये आज बेबसी में जुबान पर ताला लगाकर यह जो लाखों लोग अपने घर की

तरफ लौट रहे हैं उनके मन में भी सरकार के प्रति सवाल है। वे लगातार इस बात को सोच

रहे हैं कि आखिर यह सरकार किसकी है। अगर उनकी होती तो इस तरह उन्हें बेहाल नहीं

छोड़ती। अगर यह सरकार दूसरों के लिए है तो क्यों न अगली बार वे अपनी सरकार बनाने

की तरफ कोई पहल करें। अगर वाकई इस झटके में भारत खुद को समझ पाया तो यकीन

मानिये भारत की असली आजादी के दूसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है।


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

One Comment

  1. […] इंडिया और भारत के बीच दूसरा देश विभाजन… रजत कुमार गुप्ता रांचीः इंडिया और भारत पर काफी लंबे समय से बहस होती आयी है। … […]

Leave a Reply

error: Content is protected !!