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झारखंड की राजनीति में आया राम गया राम की परिपाटी चरम पर

  • एक साथ कई नावों की सवारी चाहते हैं कई प्रत्याशी
  • टिकट की गारंटी हुई तो पार्टी में योगदान
  • टिकट नहीं मिला तो दूसरे दल में जाएंगे
  • एक साथ कई दरवाजों पर दस्तक
संवाददाता

रांचीः झारखंड की राजनीति में अब आया राम गया राम कहावत चरितार्थ

होता नजर आ रहा है। टिकट नहीं मिलने की स्थिति में दूसरे दलों से भी

किसी बहाने टिकट जुगाड़ की कोशिश में यह प्रक्रिया तेज से और तेज होती

जा रही है। सभी दलों में ताक-झांक का नतीजा यही है कि अनेक ऐसे नेता हैं,

जो एक साथ कई पार्टियों में शामिल होकर टिकट की गारंटी चाहते हैं।

इसके लिए सभी दलों से एक साथ संपर्क का काम भी चल रहा है। इस किस्म

के अनेक नेता अभी दिल्ली के दौरे पर हैं, जहां वे रुटिन बनाकर हर दल के

बड़े नेताओं के यहां दरबार कर रहे हैं। उनकी तैयारी है कि जिस पार्टी से टिकट

की गारंटी मिल जाए, उसी पार्टी में वह शामिल होने का तुरंत एलान कर देंगे।

दूसरी तरफ अपनी पार्टी में टिकट नहीं मिलने की स्थिति में भी चुनाव लड़ने

की तैयारी से कई अन्य लोगों को अन्य दलों में भी ठौर तलाशने को मजबूर

कर दिया है।

ऐसे लोग टिकट की गारंटी मिलने के बाद ही दलबदल का फैसला सार्वजनिक

करना चाहते हैं। इस पूरे घटनाक्रम का सीधा और सरल निष्कर्ष यह है कि

अनेक सीटों पर ऐसे नेता अंतिम समय में भी पार्टी बदलकर अथवा निर्दलीय

चुनाव लड़ने से कतई परहेज नहीं करेंगे। इसमें जातिगत समीकरण भी सर

चढ़कर बोल रहा है और पार्टियों के बड़े नेता भी इसी जातिगत समीकरण के

आधार पर संभावित प्रत्याशियों के नाम आगे बढ़ा रहे हैं।

वैसे पिछले दो दिनों में इस चुनावी बाजार में भाजपा के साथ साथ अन्य

दरवाजों पर भी भीड़ बढ़ने लगी है। इससे पहले टिकट की आस में पार्टी में

शामिल होने वालों की बाढ़ सिर्फ भाजपा में ही थी। लेकिन अब कांग्रेस और

झामुमो के अलावा झारखंड विकास मोर्चा के टिकट की मांग अचानक तेज हो

चुकी है।

झारखंड की राजनीति मे दूसरे दलों की डिमांड बढ़ी

इस स्थिति से यह भी स्पष्ट है कि जैसे जैसे पार्टी टिकटों की घोषणा होगी,

वैसे वैसे इसमें और तेजी आ सकती है। झारखंड की नब्ज समझने वालों में

से कुछ लोगों का मानना है कि यह स्थिति राजनीति के लिए सभी प्रमुख

दलों के सेहत बिगड़ने का ही स्पष्ट संकेत है। पार्टी टिकट के बदले चुनाव

लडऩे की मजबूरी यह साबित करती है कि पार्टी में शामिल होने के बाद

भी ऐसे नेताओं को पार्टी से कुछ लेना देना नहीं है। वे अपने अपने इलाकों में

पार्टी के मुकाबले अपने जनाधार को ज्यादा मजबूत समझते हैं। वैसे लोग यह

मान रहे है कि अंतिम स्थिति स्पष्ट होने तक यह भी संकेत मिलने लगे हैं कि

इस बार का विधानसभा चुनाव भी काफी रोचक होने जा रहा है। जिसमें पार्टी

के अंदर भी भितरघात का खतरा लगभग सभी प्रमुख दलों के भीतर प्रमुखता

से उभरता जा रहा है।

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