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कोरोना रोकथाम के नाम पर चल रही लूट पर रोक लगे

कोरोना रोकथाम एक युद्धस्तरीय अभ्यास है। इसमें त्वरित गति से कार्रवाई नहीं किये

जाने का परिणाम घातक हो सकता है। लेकिन अब जो घटनाक्रम हमारे सामने आ रहे हैं,

उससे यह संदेह बढ़ता ही जा रहा है कि कोरोना की रोकथाम के नाम पर अब तक

अधिकांश मामलों में खानापूर्ति ही हुई है। इटली के शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के प्रसार के

तीन चरणों का उल्लेख किया है। साथ ही स्वास्थ्य कर्मियों से यह अनुरोध क या गया है

कि कोरोना के मरीजों इलाज संक्रमण की स्टेज में दिख रहे लक्षणों के आधार पर करें।

रिसर्च करने वाली इटली की फ्लोरेंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का कहना है कि रिपोर्ट

पॉजिटिव आने के बाद मरीज में संक्रमण तीन स्टेज में सामने आता है और सभी स्टेज में

लक्षण बदलते हैं। प्रकाशित शोध के मुताबिक, कोविड-19 के हर फेज में कोरोना और शरीर

की अंदरूनी क्रियाओं का कनेक्शन बदलता है। जरूरी नहीं हर बार कोविड-19 ड्रॉप्लेट्स से

ही फैले, कुछ मामलों में संक्रमित व्यक्ति के दूसरे असावधान लोगों से बात करने से भी

कोरोना का संक्रमण फैल सकता है। इटली के शोधकर्ताओं ने कोविड-19 की तीन फेज

बताई हैं, हेल्थ वर्करों से गुजारिश की है कि कोरोना के मरीजों इलाज संक्रमण की स्टेज में

दिख रहे लक्षणों के आधार पर करें। रिसर्च करने वाली इटली की फ्लोरेंस यूनिवर्सिटी के

शोधकर्ताओं का कहना है कि रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद मरीज में संक्रमण तीन स्टेज

में सामने आता है और सभी स्टेज में लक्षण बदलते हैं।

कोरोना रोकथाम में उपकरणों की खरीद का बड़ा घपला

जर्नल फिजियोलॉजिकल रिव्यू में छपे शोध के मुताबिक, कोविड-19 के हर फेज में कोरोना

और शरीर की अंदरूनी क्रियाओं का कनेक्शन बदलता है। जरूरी नहीं हर बार कोविड-19

ड्रॉप्लेट्स से ही फैले, कुछ मामलों में संक्रमित व्यक्ति के दूसरे असावधान लोगों से बात

करने से भी कोरोना का संक्रमण फैल सकता है। कोरोना काल में पूरी दुनिया दो मोर्चों पर

एक साथ युद्ध लड़ रही है। पहला लोगों के स्वास्थ्य को लेकर और दूसरा देश की

अर्थव्यवस्था को लेकर। लॉकडाउन के दौरान बंद पड़े उद्योग धंधों ने करीब सभी देशों की

अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।हालांकि, ऐसे दौर में भी भारत की

आर्थिक स्थिति बेहद कम प्रभावित हुई है। ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन

एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने हाल ही में विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर कोरोना

संकट के प्रभाव का आकलन किया है, जिसमें सामने आया है कि भारत की अर्थव्यवस्था

दुनिया की दूसरी ऐसी अर्थव्यवस्था है जिस पर कोरोना संकट का सबसे कम प्रभाव

पड़ेगा। लेकिन भारत में कोरोना रोकथाम पर अब तक हुए खर्च को औचित्य को समझना

और उनका विश्लेषण करना इसलिए जरूरी है क्योंकि प्रवासी मजदूर अपने गांव पहुंचने

के बाद कोरोना संक्रमित पाये जा रहे हैं। या तो कोरोना की रोकथाम के लिए लॉक डाउन के

दौरान चल रहे सारे प्रयास कागजी थे अथवा इन मजदूरों की जांच नहीं की गयी थी। दोनों

ही परिस्थितियों में सरकारी धन के नाम पर जनता का पैसा आखिर पानी की तरह कहां

बहाया गया, इसके सामाजिक अंकेक्षण की भी आवश्यकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि

झारखंड में इस बात को प्रमाण है कि कोरोना से बचाव के लिए पीपीई किट भी अलग

अलग दरों पर अलग अलग जिला में खरीदा गया है। कोरोना टेस्ट किट चीन से मंगाने का

हश्र हम पहले ही देख चुके हैं।

दिल्ली में मिले हैं जांच की भिन्नता के प्रमाण

दिल्ली में कोरोना की जांच पर निजी अस्पताल और सरकारी अस्पतालों की जांच रिपोर्ट

की भिन्नता भी गौर करने लायक विषय है। सरकारी स्तर पर यह स्पष्ट कर दिया जाए

कि जांच में कोरोना के होने का पुख्ता सबूत नहीं मिलता है। इससे बचाव के रास्ते अपनाते

हुए अब यह कहा जा रहा है कि प्रारंभिक चरण में कोरोना के लक्षणों की जानकारी जांच में

नहीं मिलती है। दूसरी तरफ जिस विधि से इस संक्रमण के होने की पुष्टि होती है, उस

विधि को क्यों नहीं अपनाया जा रहा है, यह सवाल अनुत्तरित है। अमेरिका राष्ट्रपति

डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना सही है कि अमेरिका में अधिक संक्रमित रोगियों का पता

इसलिए चला है क्योंकि वहां जांच अधिक हुए हैं। भारत में प्रति लाख जांच के आंकड़े भी

भिन्न भिन्न राज्यों में अलग अलग हैं। ऐसे में लॉक डाउन और अन्य तमाम व्यवस्था

करने के बाद पूरे देश के लिए जांच की एकरुपता क्यों कायम नहीं हो सकी, यह भी अब

कोरोना रोकथाम के नाम पर चल रही अव्यवस्था सह लूट का नया उदाहरण बनता चला

जा रहा है। घटनाक्रम यह बताते हैं कि खास तौर पर इस बीमारी और उसके ईलाज की

विधि के सार्वजनिक नहीं होने की वजह से भी अनाप शनाप खर्च हो रहा है। आखिर यह

जनता का पैसा है तो जनता को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उसका पैसा आखिर

वाकई लोगों की जान बचाने में खर्च हो रहा है या फिर यह किसकी जेब में जा रहा है।


 

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