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भारतवर्ष में हम इसकी कल्पना सपने में भी नहीं कर सकते हैं

भारतवर्ष में हम इसकी कल्पना सपने में भी नहीं कर सकते हैं
  • एक अखबार ने प्रकाशित की थी इसकी रिपोर्ट

  • विरोधियों ने इसे कानून के खिलाफ बताया

  • प्रधानमंत्री को इस पर सफाई भी देनी पड़ी

  • पुलिस जांचेगी प्रधानमंत्री के नाश्ते का बिल

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारतवर्ष में जिस बात की हम कल्पना भी नहीं कर सकते, फिनलैंड में वही

होने जा रहा है। वहां इस घटना को लेकर सत्ता पक्ष कोई हंगामा भी नहीं कर रहा है। यह

मामला वहां के प्रधानमंत्री सान्ना मारिन के नाश्ते के बिल को लेकर है। यह सवाल उठाया

गया है कि जनता के टैक्स के पैसे से प्रधानमंत्री और उनके परिवार के नाश्ते का बिल

कानून के खिलाफ है। वहां के एक अखबार ने सबसे पहले इस खबर को प्रकाशित किया है

35 वर्षीया प्रधानमंत्री के आवास पर नाश्ते का मासिक बिल 300 यूरो ( 365 डॉलर) का

भुगतान सरकारी खाते से हो रहा है। यह भुगतान जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी है। इस

खबर के प्रकाशित होने के बाद मामले की जांच की मांग उठने लगी। अब पुलिस ने इस

मामले की जांच करने की बात कही है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि यह जनता के पैसे

का दुरुपयोग है। दूसरी तरफ खुद मारिन ने कहा है कि ऐसा भुगतान को उनके पूर्व के

प्रधानमंत्रियों को भी होता आया है। उन्होंने अपनी तरफ से नया कुछ भी नहीं किया है।

आरोप लगने के बाद फिनलैंड के प्रधानमंत्री को ट्विटर के माध्यम से यह सफाई देनी पड़ी

है कि उन्होंने अपनी तरफ से कोई नया फैसला नहीं लिया है। अब इस पूरे मामले के

कानूनी पहलुओं की जांच होने लगी है। पुलिस की तरफ से इस बात का एलान किया गया

है कि घटना की जानकारी मिलने की वजह से इस मामले की जांच की जाएगी। पुलिस की

इस घोषणा के बाद खुद प्रधानमंत्री ने भी इस जांच का स्वागत किया है। वर्ष 2019 में

सत्ता में आने वाली पार्टी की नेता को पहली बार किसी ऐसे आरोप का सामना करना पड़ा

है, जिसकी पुलिस जांच करने का एलान किया गया है।

भारतवर्ष में इसे तो अधिकार मान लिया गया है

लेकिन भारतवर्ष में ऐसे आरोपों की हम कल्पना तक नहीं कर सकते हैं। यहां हर सरकारी

बैठक में भी नाश्ते का बिल लाखों रुपयों का होता है। कभी भी इस भुगतान पर न तो

सवाल उठाये गये हैं और ना ही इसके कानूनी पहलुओं की जांच भी की गयी है कि यह

विधि सम्मत है अथवा नहीं। फिनलैंड की इस घटना की जानकारी मिलने के बाद अब

दिल्ली के विधि विशेषज्ञ भारतीय कानून में इसके लिए क्या प्रावधान हैं, उसकी जांच

करने में जुट गये हैं। इधर भारत में इस किस्म का खर्च शायद सत्ता में बैठे लोगों ने अपना

अधिकार समझ रखा है। निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को अलग से इसके लिए पैसे भी

मिलते हैं। 

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