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अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने पायी महत्वपूर्ण उपलब्धि







  • अंग अस्वीकार रोकने की दवाइयों का प्रयोग बंद होगा

  • ट्रांसप्लांट के बाद लगातार दवा सेहत के लिए खतरनाक

  • नई विधि से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का नये सिरे से विकास

  • बाद में विकसित प्रतिरोधक ट्रांसप्लांट को अपना दुश्मन नहीं मानते


प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी उपलब्धि होने जा रही है।

इसके पूरी तरह सफल होने की स्थिति में न सिर्फ अंग प्रत्यारोपण आसान होगा बल्कि अंग प्रत्यारोपण के बाद रोगियों की दवाई का खर्च भी काफी कम हो जाएगा।

वैज्ञानिकों ने इस दिशा में शोध के पास इस किस्म की दवाइयों को शरीर के लिए हानिकारक माना है।

वे इन्हीं दवाइयों के निरंतर इस्तेमाल को समाप्त करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

नेचर कम्युनिकेशंस नामक पत्रिका में इस बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है।


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जिसमें अंग प्रत्यारोपण और उसके बाद के घटनाक्रमों का मरीज के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों को भी बताया गया है।

इस परेशानी का अध्ययन करते हुए ही वैज्ञानिकों ने इसके विकल्प का रास्ता तलाशा है।

जिस पर अब आगे तेजी से काम हो रहा है।

जिस विधि को विकसित करने की दिशा में वैज्ञानिक अभी काम कर रहे हैं,

उसमें अंग प्रत्यारोपण के 21 दिनों बाद से इस किस्म की सारी दवाइयों की जरूरत समाप्त हो सकती है।

अंग प्रत्यारोपण के बाद दवाइयों से हमले को रोका जाता है

यह जान लेना जरूरी है कि जब भी किसी के शरीर में कोई अंग प्रत्यारोपित किया जाता है

तो शरीर के अंदर एक निरंतर प्रतिक्रिया होती है।

दरअसल शरीर की आंतरिक व्यवस्था प्रत्यारोपित अंग को बाहरी हमला समझकर उसे नष्ट करने पर तुली रहती हैं।

इसलिए अंग प्रत्यारोपण के बाद दवाई से इस आंतरिक हमले को शांत रखा जाता है ताकि प्रत्यारोपित अंग शरीर की आतंरिक संरचना के हमले से बचा रहे।

लेकिन इन दवाइयों का निरंतर इस्तेमाल भी शरीर पर काफी प्रतिकूल असर डालता है।

शोध में पाया गया है कि इसकी वजह से शरीर में दूसरे किस्म के इंफेक्शन और यहां तक कि कैंसर भी होता है।

खास तौर पर ऐसी दवाएं शरीर के पैनक्रियाज पर सबसे बुरा असर डालती है।

इस वजह से पूरा शरीर ही इस किस्म की प्रतिक्रियाओं की चपेट में आ जाता है।




सफेद रक्त कणों को फिर से डालने पर नहीं होता है हमला

नई विधि की खोज के क्रम में वैज्ञानिकों ने सफेद रक्त कणों को संशोधित किया है।

इस अनुसंधान के तहत अंग प्रत्यारोपण के एक दिन बाद जब सफेद रक्त कोशिकाएं शरीर में डाली गयी तो उन्होंने नये सिरे से शरीर के प्रतिरोधक शक्ति का नये सिरे से विकास किया।


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चूंकि प्रत्यारोपित अंग इन कोशिकाओं के आने के पहले ही लगाया जा चुका था।

इसलिए नये सिरे से प्रतिरोधक शक्ति के विकसित होने के कारण प्रत्यारोपित अंगों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा।

इस प्रत्यारोपित अंग को नई व्यवस्था के शरीर के अंदर का हिस्सा मानकर उस पर हमला करना छोड़ दिया।

इस विधि को फिर से एक सप्ताह के बाद दोहराया गया।

इससे सारी आंतरिक व्यवस्थाएं फिर से नवीकृत हो गयीं और प्रत्यारोपित अंग को भी शरीर के अंदर का हमला नहीं झेलना पड़ा।

इसलिए वैज्ञानिक मान रहे हैं कि लंबे समय तक एंटी रिजेक्शन दवा के कुप्रभाव को झेलने से बेहतर है कि

कोशिका संशोधन विधि से प्रत्यारोपित अंग को शरीर के अंदर अपना साथी समझने लायक स्थिति पैदा कर दी जाए।

इस क्रम में वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि शायद यह विधि और विकसित होने के बाद

टाइप 1 डायबिटीज का स्थायी उपचार भी बन जाए क्योंकि नये सिरे से प्रतिरोधक शक्ति के पुनर्जीवित

होने की वजह से आंतरिक संरचना में सारा काम बिना किसी पूर्व परेशानी के फिर से होने लगता है।

शोध के अगले चरण में ईलाज के नये द्वार खोलेगा

मिनोस्टा विश्वविद्यालय के मेडिसीन और सर्जरी विभाग के उपाध्यक्ष और प्रोफेसर बर्नाड हेरिंग ने इस बारे में कहा कि शोध का पहला चरण सिर्फ ट्रांसप्लाट को हमले से बचाना है।




वह इस शोध के संबंध में प्रकाशित लेख के मुख्य लेखक है।

उनके मुताबिक किडनी ट्रांसप्लांट में भी यह ईलाज के नये द्वार खोल सकता है

क्योंकि वर्तमान में अंग प्रत्यारोपित किये जाने के बाद भी एंटी रिजेक्शन दवाइयों की वजह से भी इंसान की जिंदगी बंध जाती है।

दूसरी तरफ काफी लंबे समय तक इन दवाइयों के सेवन से शरीर की प्रतिरोध क्षमता भी समाप्त हो जाती है।

साथ ही इस किस्म की दवाएं शरीर के अंदर कई किस्म की परेशानियां निरंतर पैदा करती रहती हैं।

इनका मुख्य काम तो प्रतिरोधक शक्ति को प्रत्यारोपित अंग पर हमला करने से रोकना होता है

लेकिन वे शरीर के अंदर दूसरी और खराब असर भी छोड़ जाते हैं।


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