आइएलएफएस को लेकर संकट में सरकार कंपनी पर 91 हजार करोड़ का कर्ज

आइएलएफएस का शानदार कार्यालय
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रासबिहारी



नईदिल्लीः आइएलएफएस के मुद्दे पर सरकार का संकट गहराता जा रहा है।

मामला पकड़ में आने के बाद वित्त मंत्रालय इस मामले की छान-बीन में जुट गया है।

इस कंपनी के हालात इतने बिगड़ गये हैं कि सरकार को इसके लिए कड़ी कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

वैसे बताते चलें कि इस कंपनी के अस्तित्व में आने के पीछे कुछ वरीय प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका रही है।

अब कंपनी की हालत बिगड़ने के बाद यह समझा जा रहा है कि

इन्हीं अधिकारियों की बदौलत इस कंपनी की पूंजी कम होने के बाद भी उसे सीमा से बाहर का कर्ज दिया गया था।

जिसकी वापसी दिनोंदिन कठिन होती जा रही है।

खबर है कि वित्त मंत्रालय ने गत 30 सितंबर को कंपनी मामलों के मंत्रालय को एक पत्र भेजकर

इस कंपनी का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की भी बात कह दी है।

आइएसएफएस और उसकी अनुषंगी इकाइयों पर कर्ज का बोझ अधिक होने की वजह से सरकार को अब कदम उठाना पड़ रहा है।

दस्तावेज बताते हैं कि इस कंपनी की दस्तावेजी पूंजी मात्र 6950 करोड़ की थी।

इस स्थिति के बाद भी कंपनी को विभिन्न वित्तीय संस्थानों से 91 हजार करोड़ का कर्ज दिया गया था।

ऐसा क्यों हुआ, इस सवाल का उत्तर तलाशने में ही कंपनी के पीछे सक्रिय रहे नौकरशाहों की भूमिका सामने आने लगी है।

सूत्रों की मानें तो इन तमाम तथ्यों से वाकिफ होने के बाद सरकार के स्तर पर कंपनी लॉ बोर्ड को भी

इस कंपनी के सभी बोर्ड मेंबरों को हटाने का आवेदन दिया गया था।

लॉ बोर्ड ने सरकार के इस आवेदन को स्वीकार भी कर लिया है।

आइएलएफएस का नया बोर्ड भी गठित हुआ है

अब नवगठित बोर्ड में उदय कोटक को प्रबंध निदेशक बनाया गया है। वह कोटक महिंद्रा बैंक के प्रमुख अधिकारी हैं।

गत 3 अक्टूबर को इस नवगठित बोर्ड की पहली बैठक में साफ साफ शब्दों में यह बात पर चर्चा हुई कि

कंपनी की वित्तीय स्थिति अनुमान से कहीं अधिक बिगड़ चुकी है।

यह पैसा कहां खर्च हुआ, इस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

इसलिए कंपनी की गड़बड़ी को समझने में भी नये बोर्ड को थोड़ा अधिक समय लगेगा।

जो दस्तावेज सार्वजनिक हो चुके हैं उनके मुताबिक आइएलएंड एफएस को

वित्तीय वर्ष 17-18 में 16 हजार 468 करोड़ की देनदारी थी।

इसमें से 3761 करोड़ उसके कर्ज की अदायगी नहीं कर पाने की वजह से हैं।

वित्तीय संस्थानों के पास उसका कर्ज 33.9 करोड़ बकाया दर्शाया गया है।

दूसरी तरफ केंद्र सरकार को इस बात की चिंता भी सता रही है कि

इस कंपनी के डूबने की स्थिति में कई बैंकों की वित्तीय स्थिति फिर से डांवाडोल हो जाएगी

तथा कई निजी वित्तीय कंपनियों के लाईसेंस भी देनदारी नहीं चुका पाने की वजह से रद्द करने पड़ेंगे।

इसलिए सरकार सोच समझकर इस मुद्दे पर निर्णय लेना चाहती है।

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