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टेबल चाहिए तो आप घर में टेबल उगाइये

  • सेल कल्चर विधि का प्रयोग सफल हुआ है

  • प्रयोगशाला में उगाये गये जिम्मेदारी निभायेंगे

  • हर किस्म का नुकसान कम किया जा सकेगा इससे

  • कृषि और पर्यावरण में सुधार के लिए भी विज्ञान सहारा बनेगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः टेबल चाहिए घर के लिए तो आप खुद ही अपने घर में यह टेबल उगा लीजिए। यह

तकनीक आने वाले कुछ दिनों के बाद हमारे बीच आने वाली है। कृषि और पर्यावरण दोनों

के लिए पेड़ पौधों का होना जरूरी है। इधर इंसान की आबादी बढ़ने और इंसानी जरूरतों की

वजह से दुनिया से जंगल बहुत तेजी से कटते चले जा रहे हैं। वन आच्छादन कम होने की

वजह से कृषि और पर्यावरण दोनों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ रहा है। वैज्ञानिकों ने

इस समस्या से मुक्ति के लिए भी अपने तरीके से नये उपाय किये हैं। प्रयोगशाला में तैयार

पेड़ के कोष के जरिए इस चुनौती से पार पाने की कवायद तेज हो गयी है। इस दिशा में

किया गया प्रारंभिक प्रयोग सफल रहा है। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि निकट

भविष्य में इससे और बेहतर और उत्साहवर्धक सूचनाएं हमें मिल सकती हैं। समस्या को

समझते हुए वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान को उसी दिशा में आगे बढ़ाया है, जो इन दोनों

परेशानियों से मुक्ति दिला सके। इस बारे में स्पष्ट किया गया है कि इस दुनिया में जंगल

कम होने की असली वजह पेड़ों की अंधाधुंध कटाई है। घर बनाने से लेकर अनेक कार्यों में

लकड़ी की जरूरत पड़ती है। सदियों से पेड़ काटकर लकड़ी हासिल करने का काम चलता

आ रहा है। अब वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को ही बदल देना चाहते हैं। इस शोध से जुड़े लोग यह

दलील दे रहे हैं कि अगर आपको अपने घर में एक टेबल चाहिए तो आप अपने घर में एक

टेबल उगा लीजिए। इससे वर्तमान वन आच्छादन को और कम होने से रोका जा सकेगा।

साथ ही पेड़ काटने के बाद उसे आरा तक ले जाने तथा बाकी परिवहन संबंधी खर्च में भी

कटौती होगी

टेबल अथवा कोई और फर्नीचर भी उगाये जा सकेंगे

आप अपने घर में अपने जरूरत की लकड़ी उगाकर यह काम खुद कर पायेंगे। अनुमान है

कि वृहद पैमाने पर जब यह काम होने लगेगा तो इसकी लागत भी पारंपरिक विधि से

बहुत कम हो जाएगी। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने खास तरीके से पेड़ पौधों के कोषों को

प्रयोगशाला में विकसित करने पर काफी काम किया है। लकड़ी और फाइबर की जरूरत को

पूरा करने के लिए इन कोषों में वैसे बदलाव किये गये हैं, जो इंसानी जरूरतों को पूरा कर

सके। इसके बारे में बताया गया है कि यह कुछ वैसी ही विधि है, जिसकी मदद से अब

कृत्रिम मांसाहार के भोजन तैयार किये जा रहे हैं, जो दरअसल किसी पशु के मांस नहीं होते

बल्कि प्रयोगशाला में तैयार विधि से विकसित मांस होते हैं। वैसे बताते चलें कि

अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर भी इसका प्रयोग सफल रहा है। भारत में भी कई कंपनियां

इसके लिए काम कर रही हैं ताकि पशुधन की हानि को कम करते हुए भी लोगों के भोजन

संबंधी मांसाहार की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। अपने प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों ने

छोटे से फूल वाले पौधे जिनिया के सेलों से यह विधि विकसित करने में सफलता पायी है।

यह काम जब और आगे बढ़ेगा तो निश्चित तौर पर कृषि और पर्यावरण को जो नुकसान

इंसान के विकास और शहरीकरण की वजह से हो रहा है, उसे नियंत्रित किया जा सकेगा।

एमआईटी के वैज्ञानिकों और शोध कर्ताओं ने इस पर काम किया है।

खेती के उर्वरक और कीटनाशक भी हमारे लिए जानलेवा हैं

शोधकर्ताओं ने कृषि में इसकी मदद लेने की सोच इस वजह से विकसित की क्योंकि कृषि

के लिए कई चीजों की जरूरत पड़ती है जो दूसरी तरफ से पर्यावरण और इंसानी जीवन को

खतरे में डालने वाली है। मसलन खेती की उपज बढ़ाने के लिए जिन कीटनाशकों और

उर्वरकों का इस्तेमाल होता है, वे इंसानी जीवन के लिए खतरनाक हैं। फसल तैयार होने के

बाद भी इनके विष तैयार फसल के साथ ही इंसानों तक पहुंचते हैं और कई किस्म की

परेशानियों के कारण बनते हैं।

कृषि की दूसरी दिक्कत मौसम और पानी पर भी निर्भर है। इन दोनों का मिजाज बिगड़ा

तो कृषि तुरंत ही प्रभावित हो जाती है। कृत्रिम तरीके से पानी का इंतजाम करने पर फसल

की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। अगर सेल कल्चर विधि से इसकी उपज हुई तो इन

परेशानियों से भी स्थायी तौर पर छुटकारा मिल सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि

फसल उगने के बाद उसका बहुत छोटा सा हिस्सा ही भोजन के काम आता है, शेष तो

फसल के साथ रद्दी में तब्दील हो जाता है। इसलिए उनका भी पूरा इस्तेमाल होने की

स्थिति में अपने आप ही फसल का उत्पादन और बढ़ जाएगा।

फसल का अधिकांश हिस्सा ही अब काम में आ सकेगा

प्रस्तावित विधि से कम जमीन पर अधिक फसल उगाना भी संभव होगा और अन्य

परिस्थितियों एवं उर्वरकों की निर्भरता कम होने से खतरा भी कम हो जाएगा। इसे सफल

बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने तरल पदार्थों के बीच कृत्रिम सेल को विकसित किया है। इसे

एक थक्केदार अवस्था में लाने के दौरान ही इसकी कोष संबंधी संरचना में बदलाव किये

गये। कुल मिलाकर यह प्रयोगशाला में तैयार स्टेम स्टेल के जैसा ही है जो कहीं भी खुद को

शामिल कर उसके जैसा बन सकता है।इससे सख्त लकड़ी हासिल करने के लिए कुछ और

बदलाव किये गये हैं। इस विधि में पेड़ पौधे के विकास को पूरी तरह नियंत्रित किया जा

सकता है। इसलिए अगर आपको एक टेबल की जरूरत है तो आप पेड़ नहीं एक टेबल ही

उगा सकते हैं। यानी उसका पूरा हिस्सा ही आपके काम आयेगा। इसी तरह आप अपनी

इच्छा के आकार की लकड़ी अथवा फसल को उगा सकते हैं।

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