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एनजीटी के जुर्माना पर कोई तो जिम्मेदारी स्वीकार करे

एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिव्यूनल ने झारखंड सरकार पर जुर्माना लगा दिया है। यह

जुर्माना 113 करोड़ का है। दरअसल झारखंड के नये हाईकोर्ट भव न और विधानसभा भवन

के लिए यह अर्थदंड झारखंड पर लगा है। अब इसकी जिम्मेदारी किसकी है, यह तय होना

चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि दोनों ही निर्माण कार्य प्रारंभ होने के पहले अनेक

सामाजिक संगठनों ने इसका विरोध किया था। उस वक्त राज्य के मुखिया रघुवर दास थे।

सबकी जानकारी  में ही हो रहा था निर्माण का काम

लिहाजा अब रघुवर दास के बदले भाजपा को इसकी जिम्मेदारी स्वीकारनी चाहिए, यह

आम राजनीतिक बयान है। सवाल है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने जिस मुद्दे पर जुर्माना

लगाया है, क्या वह पैसा भर देने भर से पूरा हो जाएगा। यह ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा है।

झारखंड में कागजी आंकड़ों में वनों का विस्तार होने के दावों के बीच लगातार जंगल से

लकड़ी तस्करी की सूचनाएं भी सार्वजनिक होती है। इसलिए सबसे पहले तो इस बात की

सच्चाई को स्वीकारा जाना चाहिए कि वन आच्छादन के मामले में हमारा राज्य दरअसल

किस मोड़ पर खड़ा है। बिना पर्यावरण स्वीकृति के नए हाईकोर्ट भवन के लिए 66 करोड़

एवं नए विधानसभा भवन के लिए 47 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। इस मुद्दे पर आम

आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ अजय कुमार ने कहा है कि यह गलती रघुवर सरकार

की है। दूसरे राजनीतिक दलों को भी इसके बहाने राजनीति करने का नया अवसर अवश्य

मिल गया है। लेकिन वह सवाल ज्यादा बड़ा है कि जब अनेक संगठन इसका विरोध कर

रहे थे तो इन विरोधों को नजरअंदाज क्यों कर दिया गया था। इसके लिए कोई और नहीं

बल्कि सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ही जिम्मेदार हैं, ऐसा मान लेना भी गलत होगा।

एनजीटी तक शिकायत से पहले भी लोग इसे जानते तो थे

सरकारी फाइलों में जिन अधिकारियों ने इस पर्यावरण उल्लंघन के प्रस्ताव पर सहमति दी

है, उनलोगों ने सरकारी संचिका पर अपनी तरफ से क्या कुछ लिखा है, उसकी भी पहले

जांच होनी चाहिए। वरना यह भारतीय अफसरशाही का वर्तमान चेहरा ही है कि वे सारा

लाभ तो उठाते हैं लेकिन कभी भी किसी बड़ी गलती के लिए दंडित नहीं होते हैं। कोई अगर

किन्हीं कारणों से जांच के दायरे में फंस भी गया तो उनके दूसरे सहयोगी उसे जांच के

बचाने की भरसक कोशिश करते हैं। अधिकांश मामलों में यह साजिश सफल भी हो जाती

है। झारखंड राज्य के अलग होने के बाद ऐसे दर्जनों उदाहरण हमारे सामने हैं। इसलिए

गलती के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भी इस बार पहचान होनी चाहिए और

तत्कालीन सरकार की गलत नीतियों एवं प्रबंधन के कारण राज्य सरकार पर यह जुर्माना

ठोंका गया है। आम आदमी पार्टी ने यह सही बात कही है कि भाजपा को यह जवाब देना

चाहिए कि इतनी बड़ी गलती कैसे हुई? सीएम रघुवर दास एवं दोषी अफसरों पर पर इसके

लिए प्राथमिकी भी दर्ज की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य के राजस्व का बेवजह

नुकसान सही नहीं है, इस जुर्माना को भरने की पूर्ण जिम्मेवारी भाजपा और रघुवर दास

की है।

जनता पर अतिरिक्त वित्तीय भार की भी जिम्मेदारी तय हो

राज्य की जनता पर भाजपा की गलत नीतियों के कारण बोझ पड़ना कहां से

तार्किक है? भाजपा की सरकार जाने के बाद भी भाजपा के गलत कारनामे का खामियाजा

झारखंड की जनता को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने झारखण्ड सरकार से इसकी जाँच कर

दोषी अफसर पर भी कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों को बर्खास्त करने की भी मांग की

है। इस तरह की घोर अनियमितताएं सरकारी अफसरों द्वारा झारखंड सरकार कैसे

बर्दाश्त कर सकती है? डॉ अजय ने यह भी मांग की है कि इस घोर अनियमितता की पूरी

निष्पक्ष जांच के बाद पूरे मामले को जनता के बीच सार्वजनिक करना चाहिए। लेकिन

असली मुद्दा सरकारी फाइलों में गुप्त सूचनाओं के सार्वजनिक होने का है। हाई कोर्ट के बारे

में यह जानकारी तो पहले से ही सार्वजनिक थी कि वहां हो रही अनियमितता के बारे में

उच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की गयी थी। इसके बाद भी याचिका पर लंबी

सुनवाई के बाद भी अंततः कोई नतीजा नहीं निकल पाया था। विधानसभा में अपने चहेते

ठेकेदार को ही काम आवंटित करने की वजह से रघुवर दास पहले से ही आरोपों के घेरे में

आ गये थे। लेकिन इसकी जांच भी होनी चाहिए कि दरअसल जिस ठेकेदार के बहाने

रघुवर दास पर निशाना साधा जा रहा था, वह किस अफसर का चहेता था। वरना हर बार

राजनीतिक बयानबाजी में हर ऐसे विषय के उलझ जाने की वजह से असली गुनाहगारों की

पहचान ही नहीं हो पायी है। झारखंड में एक नहीं ऐसे दर्जनों बड़े मामले हैं, जहां असली

गुनाहगार रहे अफसरों को बचाया गया है। ऐसे लोगों के सेवानिवृत्त होन के बाद चुपके से

जांच की फाइल भी बंद कर दी गयी है। लिहाजा एनजीटी के जुर्माना ने राज्य को गलती

सुधारने का एक मौका दिया है तो उस अवसर का फायदा उठाना चाहिए।


 

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