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देश में कोरोना के फैलने की गति तेज होने के बीच जांच के दावों पर भी संदेह

  • आइसीएमआर के किट के दावों में कितनी सच्चाई

  • पहले से ही फैसले गलत साबित हो चुके हैं

  • किट के तकनीकी तथ्य सामने नहीं लाये गये

  • देश के वैज्ञानिक जांच करना चाहते हैं दावों की

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः देश में कोरोना के फैलने के बीच ही आइसीएमआर ने जिस एंटीबॉडी किट की

प्रशंसा की है, उस पर वैज्ञानिकों को संदेह है। यह सवाल उठ रहे हैं कि इस किट के बारे में

जो दावे इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा किये जा रहे हैं, वह वैज्ञानिक तौर

पर कितना सही है, इस पर बहस प्रारंभ हो चुका है। संस्था ने दावा किया है कि यह सौ

फीसद सही है और 98 फीसद सही परिणाम देता है। आइसीएमआर की तरफ से कहा गया

है कि यह जांच किट सिर्फ कोरोना वायरस की ही सही तरीके से जांच कर सकता है। दूसरी

तरफ इसी दावे के मुताबिक खून के नमूनों की जांच में यह 98 प्रतिशत सही परिणाम

बताता है। अन्य वैज्ञानिक इस दावे को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। इसकी खास वजह

कोरोना के लिए पीपीई किट की आइसीएमआर द्वारा की गयी अनुशंसा जांच में गलत

साबित होना भी है। चीन से मंगाये गये पीपीई किट कई राज्यों को भेजे जाने के बाद अन्य

जांच किट भी गलत परिणाम देने लगे थे।

दुनिया भर के अन्य वैज्ञानिक संगठन इस किस्म के दावों पर को फिलहाल सही मानने को

इसलिए तैयार नहीं है क्योंकि वायरस की संरचना और उसके काम करने के तरीकों का ही

पूरी तरीके से पता नहीं चल पाया है। आइसीएमआर के अलावा रोशे कंपनी की टेस्ट किट

में भी 99.8 प्रतिशत शुद्धता और एक सौ प्रतिशत सही आकलन का दावा किया गया था।

लेकिन भारत में ऐसे रोगी भी अब निकलकर सामने आ रहे हैं, जिनमें कोरोना के पूर्व

लक्षणों में से कोई नहीं दिख रहा है।

देश में कोरोना के फैलने की गति दिनोंदिन तेजदेश में कोरोना के फैलने की गति तेज होने के बीच जांच के दावों पर भी संदेह

यह सही है कि सही जांच किट की शुद्धता का दावा सही हो तो यह कोरोना नियंत्रण में

महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन पूर्व में चीन से मंगाये गये आइसीएमआर के

किटों का जो हश्र हुआ है, उस वजह से आइसीएमआर के दावों पर संदेह की पूरी गुंजाइश

बनी हुई है। कई मामलों में आइसीएमआर सही दिशा में और निष्पक्षता के साथ काम भी

कर रही है अथवा नहीं इस पर भी सवाल उठने लगे हैं। कई राज्यों में प्लाज्मा ट्रिटमेंट की

अनुमति दिये जाने में हुए विलंब को लेकर यह बहस भी हुई है कि क्या यह सरकारी

संस्थान भी राजनीति से प्रभावित है। चीन के किट गुणवत्ता में फेल होने के लिए भी

आइसीएमआर के गलत फैसले को जिम्मेदार माना गया है।

नये सिरे से आइसीएमआर द्वारा जिस किट को सही बताया जा रहा है, उसके तकनीकी

तथ्यों की जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं दी गयी है। लेकिन देश के अंदर अन्य

वैज्ञानिक संस्थान जांच की गुणवत्ता के आंकड़े उपलब्ध नहीं होने की वजह से इस शुद्धता

के दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। देश के अपने जेनेटिक वैज्ञानिक इस दावे को

बिना आंकड़ों के अब कोई दावा स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। वैसे ऐसे स्वतंत्र

वैज्ञानिक इस बात की दलील दे रहे हैं कोरोना संक्रमण फैलने के पूर्व हासिल किये गये खून

के नमूनों की जांच से भी इस बात का पता लगाया जा सकता है कि दरअसल जो दावा

किया जा रहा है, वह कितना सही है अथवा कितना गलत। क्योंकि कोरोना फैलने के पहले

के खून के नमूनों को जांच में नेगेटिव मानकर इस शोध को आगे बढ़ाया जा सकता है।

पूर्व के घटनाक्रमों की वजह से आइसीएमआर के दावों पर संदेह

यूं तो एंटीबॉडी के माध्यम से कोरोना के ईलाज की वकालत पूरी दुनिया में की जा रही है।

दुनिया के कुछ देशों में इस पर परीक्षण प्रगति पर भी है। अमेरिका में तो कोरोना के ईलाज

से स्वस्थ हो चुके स्वयं सेवको ने अपनी प्लाज्मा दान देकर इस एंटीबॉडी तैयार करने के

शोध में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया है।

अब आरटी-पीसीआर पद्धति से हो रही जांच की गति को बढ़ाने की कोशिसों के बीच जो

नमूने हासिल किये जा रहे हैं, उनपर यह दावा कितना सही है, उसकी जांच के आंकड़ों की

अभी प्रतीक्षा है ताकि नवंबर के पहले के खून के नमूनों से उसकी तुलना कर इस दावे की

सत्यता की परख हो सके। यह पता चल चुका है कि कोरोना संक्रमण होने के तुरंत बाद

इंसानी शरीर में उसके प्रतिरोधक बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। बांग्लादेश ने इसी

प्रतिरोधक की पहचान कर कोरोना का हमला समझने की पद्धति विकसित की है।

चूहों पर प्रयोग सफल होने के बाद बंदरों की बारी

एंटीबॉडी के इस विवाद के बीच थाईलैंड से अच्छी खबर आयी है कि वहां के वैज्ञानिको का

कोरोना वायरस समाप्त करने का प्रयोग चूहों पर सफल रहा है। वहां के वैज्ञानिकों ने यह

भी बताया है कि अगल चरण में वे बंदरों पर इसका परीक्षँ कर रहे हैं। थाईलैंड का

वैज्ञानिकों का दावा है कि इसके आगे का प्रयोग सफल रहा तो अगले सितंबर माह तक

इसका स्पष्ट नतीजा और ईलाज की पद्धति का ठोस नमूना सामने आ जाएगा। इस

वैक्सिन को थाईलैंड के नेशनल वैक्सिन इंस्टिट्यूट ने चुलालोंगकोर्न विश्वविद्यालय में

तैयार करने का प्रयोग जारी रखा है।


 

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