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अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने कहा रोहिंग्या नरसंहार रोके म्यांमार

हेगः अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने म्यांमार के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार

किया है। हाल के दिनों में पहली बार म्यांमार की सरकार को इस

किस्म की अंतर्राष्ट्रीय निर्देश से अपमानित होना पड़ा है। आइसीजे ने

कहा है कि म्यांमार ने अब तक इस स्थिति को नजरअंदाज करने की

भारी गलती की है। उसे अब इस संबंध में ठोस कदम उठाने ही होंगे।

इस बारे में दायर एक अंतर्राष्ट्रीय शिकायत पर सुनवाई के बाद

अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने यह निर्देश जारी किया है। इस संबंध में दाखिल

याचिका में छह मुद्दों पर कार्रवाई करने की मांग की गयी थी। ताकि

वहां रोहिंग्या मुसलमानों का नरसंहार जारी रहने की प्रक्रिया पर

अविलंब रोक लग सके। साथ ही वहां पूर्व में हुई हिंसा के निशान और

सबूत मिटाने की कार्रवाइयों पर भी प्रतिबंध लगे। अंतर्राष्ट्रीय अदालत

ने जन युसूफ ने कहा कि अब तक के जो साक्ष्य उपलब्ध हैं, उससे साफ

है कि म्यांमार ने इस दिशा में गंभीर दृष्टिकोण अपनाया ही नहीं है।

इसलिए अब उसे पूरी शक्ति से इस किस्म की हिंसा को रोकने की

दिशा में कार्रवाई करनी ही होगी। एक देश होने के नाते उसे अंतर्राष्ट्रीय

शर्तों का पालन करना ही होगा।

अंतर्राष्ट्रीय अदालत का फैसला सर्वसम्मति से 

म्यांमार की तरफ से यह दलील दी गयी थी कि उसकी सेना ने इस

किस्म की कोई हिंसात्मक कार्रवाई नहीं की है और न ही वहां की सेना

इस किस्म की साजिशों का कोई हिस्सा रही है। वहां की प्रमुख और

नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू कि की इन मामलों में भूमिका

की काफी आलोचना हो चुकी है। कई देशों ने उन्हें दिया गया सम्मान

भी वापस ले लिया है। इसके बाद भी रोहिंग्या के मुद्दे पर वहां की

सरकार के रवैये में कोई खास बदलाव नहीं आया है। इसी वजह से

अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने कहा है कि उसके निर्देशों का पालन किस स्तर

पर हुआ है, इसकी समीक्षा चार महीने में फिर से की जाएगी।

अदालत के इस फैसले की कई विधि विशेषज्ञों ने सराहना की है। सभी

का मानना है कि म्यांमार ने रोहिंग्या के मुद्दे पर बिल्कुल ही गैर

जिम्मेदार रवैया अपना रखा है। नतीजा है कि वहां के लाखों रोहिंग्या

शरणार्थी अब भी बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं जबकि

लाखों अन्य यत्र तत्र भाग चुके हैं। अदालत के निर्देश से यह स्पष्ट हो

गया है कि वहां के घटनाक्रमों पर आईसीजे की कड़ी नजर रहेगी।

अदालत में सर्वसम्मति से लिये गये फैसले की वजह से भी इसकी

गंभीरता को पूरी दुनिया में अलग नजरिए से आंका जा रहा है।

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