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आइसक्रीम की तरह नजर आ रहे हैं मंगल ग्रह के उत्तरी छोर के बर्फ

  • मार्स ऑरबिटर ने भेजी मंगल की नई तस्वीरें

  • बर्फ के ऊपर कॉर्बन डॉईऑक्साइड की मोटी परत

  • शून्य से 143 डिग्री नीचे तक का होता है तापमान

  • तेज बवंडर भी उठते रहे हैं इस ग्रह के धरातल पर

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आइसक्रीम का अंतरिक्ष में नजर आना एक सुखद अनुभूति

है। लेकिन यह हमलोगों के खाने वाला आइसक्रीम तो बिल्कुल नहीं है।

दरअसल नासा के अंतरिक्ष यान मार्स ऑरबिटर ने अपने अत्याधुनिक

कैमरों से मंगल ग्रह की नई तस्वीरें भेजी हैं। इन तस्वीरों में से कुछ

काफी आकर्षक हैं। इनसे साफ पता चल जाता है कि मंगल की सतह

पर कई इलाकों में बर्फ जमी हुई है। इनमें से कुछ तो कैमरे की आंखों से

ठीक आइसक्रीम की तरह नजर आ रही हैं। इस यान ने वहां से गुजरते

वक्त ग्रह के उत्तरी छोर की तरफ अपना ध्यान केंद्रित कर रखा था।

तस्वीरों और अन्य वैज्ञानिक आंकड़ों से इस बात की पुष्टि होती है कि

इस ग्रह पर बर्फ के अलावा गहरी खाई और तेज गति के तूफान पैदा

होते रहते हैं। इन तूफानों के साफ संकेत मिले हैं तथा ग्रह पर तेज

रफ्तार की हवाएं चलती हैं। अब तक के वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार

पर यह नतीजा निकाला गया है कि मंगल ग्रह का मौसम चक्र भी

लगभग पृथ्वी के जैसा ही है। सिर्फ खास अंतर यह है कि वहां का एक

साल पृथ्वी के दो साल के बराबर है। लिहाजा मौसम बदलने के दौरान

वहां के बर्फ की स्थिति में भी बदलाव होता है। कभी यह कम हो जाता

है तो कभी इसकी रासायनिक संरचना में भी बदलाव होता है।

आइसक्रीम जैसी शक्ल सीओ 2 के चादर की वजह से

लेकिन वैज्ञानिक वहां बर्फ पाये जाने की सूचना से प्रसन्न है क्योंकि

इस बर्फ में पानी मौजूद है। अनुमान लगाया गया है कि जाड़े के मौसम

में वहां का तापमान नीचे गिरकर शून्य से 143 डिग्री कम हो जाता है।

इस मौसम में वहां मौजूद कॉर्बन डॉईऑक्साइड भी जम जाता है।

जमने के बाद यही कॉर्बन डॉईऑक्साइड बर्फ की सतहों पर एकत्रित हो

जाता है। इसकी जांच करने वाले वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जहां

जहां यह बर्फ है, उसके ऊपर करीब साढ़े छह फीट तक की परत सिर्फ

कॉर्बन डॉईऑक्साइड की हो सकती है। तापमान बदलने की स्थिति में

यही सीओ 2 भाप बनकर ग्रह के ऊपर बादलों के जैसा आकार ले लेता

है। इसकी वजह से बाहर से ग्रह की धरती नजर नहीं आ पाती है।

मार्स ऑरबिटर पर लगे शक्तिशाली कैमरों की वजह से इन्हें देख पाना

संभव हो पा रहा है। जिन कैमरों से इस पर नजर रखी जा रही है, उन्हें

हाई रेजोल्यूशन स्टीरियो कैमरा (एसआरएससी) कहा जाता है। यह

कैमरा इतना शक्तिशाली है कि अंतरिक्ष से तस्वीर लेते वक्त वह ग्रह

के दस मीटर इलाके तक को अपने कैमरे में केंद्रित कर सकता है, इससे

काफी साफ तस्वीरें आती है। इसे जरूरत के मुताबिक निर्देशत कर

किसी खास इलाके की तस्वीर भी ली जा सकती है। इस अंतरिक्ष यान

से मिलने वाली तस्वीरों का अलग से विश्लेषण करने का काम जर्मनी

के इंस्टिट्यूट ऑफ प्लेनेटरी रिसर्च (बर्लिन) में भी चल रहा है।

जर्मनी में इन तस्वीरों पर अलग अनुसंधान चल रहा है

इस केंद्र के प्रमुख रॉल्फ जाउमैन ने इन उपलब्धियों के बारे में नई

जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि बर्फ के साथ साथ वहां के हल्के

भूरे और लाल रंग के धूल कण भी नजर आ रहे हैं। इन धूल कणों के

इस तरीके से बिछे होने का कारण वहां उठने वाले बवंडर ही हैं। जिनकी

गति अत्यंत तेज होती है। इससे बर्फ के ऊपर जेब्रा के जैसी धारियां भी

बन गयी हैं। अनुमान है कि इसी वजह से मंगल ग्रह की गहरी खाइयों

में नये और अनजाने रहस्य भी छिपे हो सकते हैं क्योंकि तेज तूफान के

बाद इन धूलकणों का असर गहराई तक अलग ढंग से पहुंचता है। साथ

ही इन गहराइयों में तापमान भी भिन्न होता है। पृथ्वी पर मौजूद

मौसम चक्र की जानकारी होने के बाद वैज्ञानिक वहां की स्थिति को

बेहतर तरीके से समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसका एक कारण वहां

बर्फ से पानी उत्पन्न कर जीवन की परिस्थितियों को पैदा करना भी

है। लाखों वर्षों में वहां के मौसम और संरचना में क्या कुछ बदलाव हुआ

है तथा उस ग्रह के गर्भ में क्या कुछ मौजूद है, उसे भी वैज्ञानिक

समझना चाहते हैं।

वर्ष 2003 से मंगल ग्रह का चक्कर लगा रहा यह अंतरिक्ष यान अब तक इसके

बारे में अनेक नई जानकारियां उपलब्ध करा चुका है। इसी के माध्यम से

वैज्ञानिक बार बार यह परखना भी चाहते हैं कि बर्फ के मौजूद होने की वजह से

वहां जीवन है अथवा नहीं और अगर है तो वह किस स्थिति का है। अब तक

वहां जीवन होने लायक अनेक तथ्य मिल चुके हैं। इनमें ज्वालामुखी और चांद

के जैसी गहरी खाइयां भी हैं, जिनके रहस्यों का अब तक पता नहीं चल पाया

है।

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