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मैं ना भूलूंगा और बता दे रहा हूं कि इस बार तुम भी मत भूलना


मैं ना भूलूंगा यह तय बात है और तुम्हारी तुम जाने। जो पिछले साल के मार्च माह से झेल

रहे हैं उसके बाद भी अगर याद ना रहे तो हम अब्बल दर्जे के मुर्ख माने जाएंगे। बचते

बचाते भी दूसरी लहर की चपेट में लोग आ गये। अब माहौल थोड़ा सुधरता दिख रहा है तो

फिर से वही गलती नहीं करूंगा। इसलिए तुमसे भी कहता हूं कि मैं ना भूलूंगा और तुम भी

मत भूलना।

जब पहली बार चीन में इस महामारी के आने की सूचना आयी थी उसी वक्त से यह भय तो

था कि हम भारतीय कई मामलों में बहुत असावधान और मौकापरस्त भी हैं। इन्हीं कारणों

से यह परेशानी हमारे माथे पर ना आ जाए। चीन से तो नहीं आया लेकिन विदेशों से

प्राइवेट और चाटर्ड जेट से आने वालों के अलावा सामान्य विमान सेवा से आने वालों ने

बुखार रोकने की दवाई खाकर एयरपोर्ट पर होने वाली जांच को चकमा दिया और हमारे

बीच पहुंच गये। पहली बार रोग फैला तो करीब दो महीने तो लोगों को बात समझ में ही

नहीं आयी। हर बात को हल्के में लेने की अपनी आदत है और नतीजा हमारे सामने था।

किसी तरह सितंबर तक इस झंझट से छूटे तो मैं ना भूलूंगा वाली बात बिसरा दी गयी।

दरअसल सरकार बहादुर भी दूसरे कामों में उलझ गये थे। उधर सरकारी खजाना भी खाली

हो चला था। मजबूरी में कारोबारी गति तेज हुई तो छिपकर बैठे वायरस ने फिर से वार

करना प्रारंभ कर दिया। पहले से जारी आंकड़ों के आधार पर हम नहीं समझ पाये कि इस

बार का हमला अधिक तेज है। नतीजा हमारे सामने है कि हर दिन चार लाख से अधिक

संक्रमण और चार हजार से अधिक मौत।

मौत की चर्चा से याद आया नदियों में बहते गुमनाम शव

मौत की चर्चा से याद आया कि गंगा, यमुना और अन्य नदियों में जिन लाशों को बहाया

गया, उनकी गिनती इसमें नहीं है। इसलिए कुल मिलाकर कोरोना की दूसरी लहर में

दरअसल कितने लोग मारे गये, यह आंकड़ा स्पष्ट नहीं होने जा रहा है। लेकिन अब भी

इस बात का भय है कि लोग मौका पाते ही मैं ना भूलूंगा वाली बात को ही भूला देते हैं।

कभी देखा नहीं है कि चौराहे पर अगर पुलिस वाला खड़ा ना हो तो ट्राफिक रूल तोड़ने से

हमें परहेज नहीं होता। बाजार में भी दूसरे को धक्का देकर सबसे पहले भिंडी हो या मछली

खरीदने का हमारी पुरानी आदत है। और तो और जहां जाम लगा हो, वहां भी संकरी जगह

से अपनी दुपहिया आगे बढ़ाने की चाह में हम अक्सर अपने पीछे जाम छोड़ जाते हैं।

लेकिन क्या करें। आदत तो आखिर आदत होती है। फिर भी याद दिलाना तो फर्ज बनता

है। इसी बात पर एक सुपरहिट फिल्म का हिट गाना याद आने लगा है। दरअसल आज के

दौर में अगर बात करें तो इस फिल्म का नाम भी इस माहौल से पूरी तरह मेल खाता है।

इस फिल्म का नाम था रोटी, कपड़ा और मकान। इस गीत को लिखा था संतोष आनंद ने

और उसे संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी ने। इस गीत को अपना स्वर

दिया था मुकेश कुमार और लता मंगेशकर ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

मैं ना भूलूँगा, मैं ना भूलूँगी

इन रस्मों को इन क़समों को इन रिश्ते नातों को

मैं ना भूलूंगा, मैं ना भूलूँगी

चलो जग को भूलें, खयालों में झूलें
बहारों में डोलें, सितारों को छूलें
आ तेरी मैं माँग संवारूँ तू दुल्हन बन जाये
माँग से जो दुल्हन का रिश्ता मैं ना भूलूँगी।।।

समय की धारा में, उमर बह जानी है
जो घड़ी जी लेंगे, वही रह जानी है
मैं बन जाऊँ साँस आखिरी तू जीवन बन जाये
जीवन से साँसों का रिश्ता मैं ना भूलूँगी।।।

बरसता सावन हो, महकता आँगन हो
कभी दिल दूल्हा हो, कभी दिल दुल्हन हो
गगन बनकर झूमें, पवन बनकर झूमें
चलो हम राह मोड़ें, कभी ना संग छोड़ें
तरस चख जाना है, नज़र चख जाना है

कहीं पे बस जाएंगे, ये दिन कट जाएंगे
अरे क्या बात चली, वो देखो रात ढली
ये बातें चलती रहें, ये रातें ढलती रहें
मैं मन को मंदिर कर डालूँ तू पूजन बन जाये
मंदिर से पूजा का रिश्ता
मैं ना भूलूँगा, मैं ना भूलूँगी

अब चलते चलते सरकार बहादुर से भी पूछ लेते हैं कि हुजूर आप तो नहीं भूल रहे हैं। चुनाव

में बिजी होने की वजह से आप इस पर ध्यान नही दे पाये थे। अब जनता की नाराजगी का

एहसास हो रहा है तो जाहिर है कि शायद सही रास्ते पर चले आये। वैसे इसके साथ ही

किसान आंदोलन में भी मैं ना भूलूंगा वाली बात को उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में

अपना फैसला सुना चुकी है। अब भी समय है संभल जाइये। वरना तमाम कोशिशों के बाद

भी पश्चिम बंगाल के जैसा जनादेश दूसरे राज्यों से भी आ सकता है।

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