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दिल के झरोखे में तूझको बिठाकर .. … ….

दिल के झरोखे में दरअसल कौन बैठा है और कब तक बैठा रहेगा, इस पर मुझे बहुत

कंफ्यूजन हो रहा है। बिहार से राजनीति शुरु हुई। अपने सुशासन बाबू की तरफ से यह कहा

गया कि पश्चिम बंगाल में जदयू चुनाव लड़ेगी। साथ में सफाई भी दी गयी कि भाजपा के

साथ उसका तालमेल सिर्फ बिहार तक का है। इसलिए पश्चिम बंगाल में अगर वह अलग

से चुनाव लड़ती है तो भाजपा को कोई परेशानी नहीं होगी। ठीक ही कहा था कि तालमेल

सिर्फ बिहार तक का ही है। लेकिन अपने मोटा भाई ने कल रात गुवाहाटी पहुंचने के पहले

ही जदयू को धोबियापाट दे दिया। अरुणाचल प्रदेश के छह जदयू विधायक भाजपा में

शामिल हो गये। अब नीतीश कुमार को कुछ बोलते भी नहीं बन रहा है क्योंकि खुद ही कहा

था कि तालमेल तो सिर्फ बिहार का है। अगर अरुणाचल प्रदेश में छह विधायक पार्टी

छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये तो उसी तर्ज पर वह शिकायत भी नहीं कर सकते हैं।

वैसे मोटा भाई असम कल रात ही पहुंचे हैं तो देखना है कि वहां कांग्रेस का किला बुलंद रह

पाता है अथवा टूटने वाला है। आगे आगे देखिये होता है क्या। लगे हाथ पश्चिम बंगाल की

भी चर्चा कर लें। वहां दीदी के मुकाबले दादा को उतारने की चाल कहां तक कामयाब हो

पाती है, इस पर नजर रखने की जरूरत है। इतना तय है कि इस बार पश्चिम बंगाल का

चुनाव नवाब सिराजुद्दोला के जमाने के पलाशी के युद्ध से कम रोचक नहीं होगा क्योंकि

असली लड़ाई दो ममता वनाम मुकुल राय की है।

दिल के झरोखे से आमने सामने डटे हैं मुकुल और ममता

देखना है कि इस लड़ाई में मुकुल राय को अपने भाजपा के पुराने नेताओँ का कितना साथ

मिल पाता है। दूसरी तरफ यह भी देखना है कि अंदर ही अंदर कई कारणों से नाराज चल

रहे तृणमूल के नेता ममता का कितना साथ दे पाते हैं। कुल मिलाकर डब्ल्यू डब्ल्यू एफ

वाला सीन बनने जा रहा है।

यह तो हुई चुनावी राजनीति की बात। अब लौटते हैं असली मुद्दे और भाजपा की सबसे बड़ी

परेशानी की तरफ। जी हां किसान आंदोलन। यह आंदोलन दिल्ली के करीब पहुंचा तो

भाजपा को गुमान था कि दूसरे आंदोलनों की तरह इसे भी ध्वस्त कर देंगे अपनी पुरानी

तकनीक है। उसी वजह से किसानों को पहले सीरियसली नहीं लिया गया। साइबर प्रचार में

खालिस्तानी, पाकिस्तानी और कांग्रेसी फिर राष्ट्र विरोधी सब कुछ कहा गया। लेकिन

अंततः सिंधु सीमा से जो लहर अपने पूरे देश में फैलती जा रही है, वह भाजपा के माथे पर

चिंता की लकीरें बढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं। अपने हर भाषण में खुद मोदी जी खुद को

किसानों का हिमायती बताने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह किसान हैं कि टस से मस

नहीं हो रहे हैं। लेकिन मोदी जी की इन्हीं बातों पर एक पुरानी फिल्म ब्रह्मचारी का गीत

याद आ रहा है। इस गीत को लिथखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में ढाला था शंकर

जयकिशन की जोड़ी ने। इस गीत को गाया था मोहम्मद रफी ने।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर
यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर
रखूँगा मैं दिल के पास, मत हो मेरी जाँ उदास

कल तेरे जलवे पराये भी होंगे,
लेकिन झलक मेरे ख्वाबों में होंगे
फूलों की डोली में होगी तू रुखसत,
लेकिन महक मेरी सांसों में होगी

दिल के झरोखे में …
अब भी तेरे सुर्ख होठों के प्याले,
मेरे तसव्वुर में साक़ी बने हैं
अब भी तेरी ज़ुल्फ़ के मस्त साये,
बिरहा की धूप में साथी बने हैं

दिल के झरोखे में …

मेरी मुहब्बत को ठुकरा दे चाहे,
मैं कोई तुझसे ना शिकवा करुंगा
आँखों में रहती हैं तस्वीर तेरी,
सारी उमर तेरी पूजा करुंगा

दिल के झरोखे में …

अब देखना है कि आम गिरता है या लबेदा पेड़ की डाल पर फंस कर टंगा रह जाता है।

इतना तो तय है कि किसानों का यह आंदोलन पहली बार मोदी जी की लोकप्रियता पर बट्टा

लगाने वाला साबित हो रहा है। भाजपा का साइबर सेल फेल हो चुका है। दूसरी तरफ

किसान सरकार के हर दावे की काट करने में जरा भी देर नहीं करते। मुख्य धारा की

मीडिया ने उनकी बातों को प्रमुखता नहीं दिया तो अलग से पर्चा निकालकर किसानों को

अपनी जानकारी देने लगे हैं। यानी एक वैकल्पिक मीडिया भी इस आंदोलन की उपज है।

देखते रहिये तेल और तेल की धार कि आखिर क्या नतीजा निकलता है।

आने वाले दिनों में हेमंत भइया की पूछ बढ़ने वाली है दूसरे राज्यों में

पूरा देश घूम लेने के बाद अपने झारखंड लौटते हैं तो तय मानिये अपने हेमंत बाबू के पौ

बारह होने वाले हैं। पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनाव में हेमंत सोरेन की

मांग अधिक रहेगी। इन दोनों राज्यों के कुछ खास इलाकों में झारखंड से गये मजदूर चाय

बगान में काम करते थे। अब कई पुश्तों से वे वहां के स्थायी निवासी हो चुके हैं। लिहाजा

उन्हें भाजपा के खिलाफ अपने पक्ष में करने के लिए विरोधी दलों को हेमंत सोरेन से बेहतर

चेहरा कौन मिलेगा। इंतजार कीजिए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इन राज्यों के

दौरे की घोषणा होने का।

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