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मैंने देखा, तूने देखा, इसने देखा उसने देखा सबने देखा

मैंने देखा, तूने देखा सबने देखा कि हाल हमारा क्या है। हाकिम लोगों के लिए ही देश का

सारा सिस्टम है और उन्हें किसी बात की तकलीफ नहीं होनी चाहिए। आम आदमी यानी

देश का मैंगो मैन भाड़ में जाए। सरकार को अपने फायदे से मतलब है। जब फिर से ताली

और थाली बजाने की जरूरत होगी तो एक बार आवाज लगा देंगे कि मैंगो मैन की भीड़

फिर से काम पर लग जाओ। कोरोना संकट की दूसरी लहर में सरकारों की सोच में आम

आदमी दरअसल कहां है, यह बुरी तरह स्पष्ट हो गया है। किसी एक को जिम्मेदार मत

मान लीजिए। दरअसल अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी उनकी शासन पद्धति से ऐसे ही

काम होता है। इसमें एक शासक वर्ग होता है और दूसरा शोषित वर्ग यानी आम आदमी।

आम आदमी की इसमें उपयोगिता सिर्फ इतनी भर है कि वह नेताओं की रैली में भीड़

लगाये और पांच साल में एक बार वोट दे। बाकी जनता के पैसे का असली मजा उठाने वाले

तो कौन हैं, यह कोरोना संकट में भी साफ साफ दिख रहा है। संकट है कि इतना कुछ

अपनी आंखों से देख लेने के बाद भी हम अपनी सोच को और साफ नहीं कर पा रहे हैं।

दरअसल करें तो क्या करें कोई और बेहतर विकल्प होता तो खाट खड़ी कर देते। शायद यह

कोरोना संकट ही समुद्र मंथन की तरफ कोई नया विकल्प पैदा करेगा, जहां पारंपरिक

राजनीति को दरकिनार कर आम आदमी के लिए काम करने वाली कोई राजनीतिक

शक्ति पैदा होगी।

मैंने देखा वाला यह गीत सुपरहिट फिल्म दुश्मन का है

फिल्म दुश्मन के इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मी

कांत प्यारे लाल की जोड़ी ने। किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने यह गीत गाया था।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

मैंने देखा, तूने देखा
मैंने देखा, तूने देखा
इसने देखा, उसने देखा, सब ने देखा

मैंने देखा, तूने देखा
इसने देखा, उसने देखा, सब ने देखा
क्या देखा? क्या देखा?

इक दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है
इक दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है

मैंने देखा, तूने देखा
मैंने देखा, तूने देखा
इसने देखा, उसने देखा, सब ने देखा
क्या देखा? क्या देखा?

एक गाँव जो शहरों से भी न्यारा है
एक गाँव जो शहरों से भी न्यारा है
दुश्मन, दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है

आज सज़ा देंगे तुझको हम तेरी सब भूलों की
आज सज़ा देंगे तुझको हम तेरी सब भूलों की
तेरे गले में हम डालेंगे ये माला फूलों की

इस गाँव की रीत यही है, जीवन संगीत यही है
आज के दिन का गीत यही है, यही है

मैंने देखा, तूने देखा
मैंने देखा, तूने देखा
इसने देखा, उसने देखा, सब ने देखा
क्या देखा? क्या देखा?

गीत के बोल इस हालत में ज्यादा सटीक लगते हैं

इक चाँद जो सबकी आँख का तारा है
इक चाँद जो सबकी आँख का तारा है
दुश्मन, दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है

ज़ंजीरों से भी पक्के हैं प्रेम के कच्चे धागे
ज़ंजीरों से भी पक्के हैं प्रेम के कच्चे धागे
इन कच्चे धागों को तोड़ के क़ैदी कैसे भागे?

आया लेके हरियाली तू, इन बाग़ों का माली तू
इन खेतों का हाली तू, हाली तू

मैंने देखा, तूने देखा
मैंने देखा, तूने देखा
इसने देखा, उसने देखा, सब ने देखा
क्या देखा? क्या देखा?

इक क़ैदी जो पहरेदार हमारा है
इक क़ैदी जो पहरेदार हमारा है
दुश्मन, दुश्मन जो दोस्तों से प्यारा है

सब ने माफ़ किया मुझको, पर मैं हूँ जिसका दोषी
सब ने माफ़ किया मुझको, पर मैं हूँ जिसका दोषी
कब टूटेगी उसके घायल होंठों की खामोशी?

वो भी माफ़ करे तो जानूँ, मन को साफ़ करे तो जानूँ
इंसाफ करे तो जानूँ, तो जानूँ

मेरा नहीं, तेरा नहीं
मेरा नहीं, तेरा नहीं
इसका नहीं, उसका नहीं, किसी का नहीं
ये दोष तक़दीर का सारा है
ये दोष तक़दीर का…

अंत में कोरोना के साथ साथ चुनाव का तुलनात्मक अध्ययन भी कर लें। कल यानी दो मई

को तो चुनाव परिणाम आ रहे होंगे। लेकिन इस चुनाव के दौरान देश ने कितनी जानें

गंवायी और चुनावी व्यस्तताओं की वजह से स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी उपेक्षित हुई,

उसकी जिम्मेदारी किसी को लेने बोलो तो सभी पीठ दिखा कर भाग लेंगे। जनता अगर

ठान ले तो इस छद्म लोकतंत्र के मुखौटे में चल रहे राजतंत्र को निश्चित तौर पर पटखनी दी

जा सकती है। कोरोना से कमसे कम हमें यह समझा तो दिया है कि नेता और सरकार की

नजरों में आम आदमी की असली औकात क्या है।

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