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देख तेरे संसार की हालत … हालात देखकर ख्याल आता है कि संवेदना कहां गयी

  • प्रेम वर्मा

रांचीः देख तेरे संसार ही हालत वाला गीत यूं ही याद नहीं आया मुझे। पिछले दिन बड़ा

विचलित मन लिये घर में कवि प्रदीप का लिखा फिल्म नास्तिक का गाना सुन रहा था।

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।।। सूरज न

बदला, चांद न बदला।। ना बदला रे आसमान।

उसी वक्त मेरे एक जिगरी मित्र का फोन आया। सशंकित मन लिये फोन उठाया।(आज के

हालात ऐसे ही बन गये हैं कि अनिष्ट की आशंका मानस पटल पर हावी रहती है) 

मित्र की आवाज सुनाई पड़ी – भाई, माता जी को कोरोना लील गया। कोई उपाय कर

अंत्येष्टि की व्यवस्था कर दीजिये। मित्र की बातें सुन कलेजा धक तो हुआ किंतु स्वयं को

संयमित कर कहा- चिंता न करें, हम व्यवस्था करते हैं।

मित्र का फोन रखा और मारवाड़ी सहायक समिति के प्रदीप राजगढ़िया जी को फोन लगा

कर सारी बातें कहीं।उन्होंने कोरोना- मृत्यु मोक्ष सेवा के माध्यम से अंतिम संस्कार की

व्यवस्था करवा कर मुझे सूचित किया।मित्र को व्यवस्था की सूचना दे मैं भी मुक्ति धाम

पहुंचा। सच कहूं तो वहां पहुँच कर मेरा मन मानवता के एक भयावह दौर को प्रत्यक्ष देख

तार-तार हो गया।

होम आइसोलेशन में दिवंगत काया को परिजन के अंतिम कंधे भी नसीब नहीं।लखनऊ में

होम आइसोलेशन में 3 लोगों की मृत्यु के बाद लाश सड़ने की दुर्गंध फैलने के बाद

पड़ोसियों के जागने की खबर देखकर आया था और रांची के हरमू मुक्ति धाम में वही

नजारा प्रत्यक्ष देखा। एक के बाद एक आते शव वाहनों की कतार। मैं जिनके लिये गया था

उन मृतका का भरा पूरा संपन्न परिवार किन्तु कोई झांकने तक न आया। अधिकांश लाशों

की वही दशा

देख तेरे संसार की सोच में संवेदना की चिंता सताती रही

कहाँ गयीं संवेदना? कोरोना लील गया क्या? परिजन- पड़ोसी सब विमुख। कोरोना त्रासदी

का जब इतिहास लिखा जायेगा तो सदियां चीख-चीखकर कहेंगी कोरोना ने इंसान को ही

नहीं इंसानियत को और उसकी संवेदना को भी लील लिया था।

मुक्ति धाम में मुझे तार-तार हो चुके रिश्ते की हकीकत दिखी तो संवेदनशील फरिश्ते भी

दिखे। वे फरिश्ते जिनका कोई रिश्ता नाता मृतकों से नहीं किन्तु पीपीई कीट पहनकर

लगातार शवों की मुक्ति के उपाय में लगे थे। भारी मन लिये घर लौटा तो टीवी पर खबर

दिखी की दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में कोरोना की भेंट चढ़े एक हिन्दू परिवार की

अंत्येष्टि सनातन पद्धति से पड़ोसी मुस्लिम परिवार ने की। दूसरी खबर में बहराईच की

एक बिटिया अपनी माँ को मुंह से आक्सीजन देती दिखी। मेरी नम आंखें जब बंद हुईं तो

अस्पताल में लगातार मरीजों की जान बचाने में जुटे डाक्टरों-नर्सों और स्वयंसेवकों का

चेहरा घूम गया। कुछ पल को लगा नहीं,अब भी आशा की किरणें हैं । राहत में करवट लेते

ही आपदा में अवसर तलाश कर जीवनरक्षक दवाओं, आक्सीजन और अस्पताल के बेड की

कालाबाजारी करते दानव संवेदनहीन चेहरे लिये मुंह चिढ़ाते दिखे।

घबरा कर उठ गया तो कवि प्रदीप की वही पंक्तियां कानों में गूंजने लगी।

आया वक्त बड़ा बेढंगा।।। नाच रहा नर होकर नंगा। 

इतनी बेबस मनोदशा कभी नहीं हुई । अपने मन को यही तसल्ली दे रहा हूँ कि कोई दु:ख

मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, वही हारा जो लड़ा नहीं।

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