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ईंधनों के दाम पर भी बयानों का यू टर्न अजीब बेशर्मी

ईंधनों के दाम बढ़ते थे तो पता नहीं कैसा कैसा प्रदर्शन होता था। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति

ईरानी का उल्लेख इसलिए जरूरी है कि उस दौर में वह तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन

सिंह को चूड़ियां भेजा करती थी। अब क्या हुआ कि ऐसे सारे लोगों के मुंह में दही जम गयी

है जो पूर्व की सरकार के द्वारा ईंधनों के दाम में बढ़ोत्तरी का विरोध करते थे, पानी पी

पीकर कोसा करते थे। इन तमाम लोगों की चुप्पी यह साबित करती है कि जनता के प्रति

भाजपा का प्रेम भी दरअसल दिखावा है। कोई सरकार अपनी सुख सुविधाओं में कटौती

कर जनता का हित साधना ही नहीं चाहती। इसके ठीक विपरीत तमाम प्रतिकूल

परिस्थितियों से जूझते हुए भी दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने जो कुछ कर

दिखाया है, वह जनता की समझ में आ रहा है। वहां बिजली और पानी मुफ्त किये जाने का

फैसला भी भाजपा की तरफ से आलोचनाओं के केंद्र में आया था। भाजपा के अनेक

स्थानीय और राष्ट्रीय नेताओं ने इसे नौटंकी बताया था। लेकिन वही नौटंकी पिछले पांच

वर्षों में सही साबित हुआ। इसके बीच दिल्ली का बजट भी बढ़कर दोगुना हो गया। इसलिए

क्या यह माना जाना चाहिए कि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर सरकारों

द्वारा जनता के पैसे की लूट का जो आरोप लगाया था, वह वाकई सत्य है। वरना दिल्ली

की सरकार जो कुछ काम कर पा रही है, वे दूसरे राज्य क्यों नहीं कर पा रहे हैं, यह प्रश्न

स्वाभाविक तौर पर जनता के जेहन में कौंध रहा है। इसी क्रम में बिहार और पश्चिम

बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में ईंधनों की तस्करी का मामला भी प्रकाश में आया है।

ईंधनों के दाम बढ़े तो बिहार बंगाल में तस्करी बढ़ी

जाहिर सी बात है कि अगर पेट्रोल और डीजल के दामों में इस तेजी से बढोत्तरी होगी तो

घर के बजट का युद्ध लड़ रहे आम आदमी को अपने स्तर पर विकल्प की तलाश तो करनी

पड़ेगी। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जब पेट्रोलियम के दाम अभी के मुकाबले बहुत अधिक थे तब

भी देश के भीतर इनकी कीमतों में इतनी बढ़ोत्तरी नहीं की गयी थी। इसलिए समझा जा

सकता है कि दरअसल दाम पेट्रोलियम पदार्थों का नहीं बढ़ता है बल्कि सरकारों की लालच

जनता पर इतना बोझ डालती चली जा रही है। जनवरी 2021 में भारत ने बेरोजगारी दर में

बड़ी गिरावट दर्ज करने के साथ रोजगार दर में प्रभावी बढ़त भी हासिल की। बेरोजगारी दर

दिसंबर 2020 के 9.1 फीसदी से घटकर 6.5 फीसदी पर आ गई जबकि रोजगार दर 36.9

फीसदी से बढ़कर 37.9 फीसदी पर पहुंच गई। ये बड़े सकारात्मक बदलाव हैं। अब कोरोना

संकट से उपजी आर्थिक परिस्थितियों से जूझते देश और आम आदमी के बीच राहत की

खबर यह है कि अब देश में रोजगार की स्थिति में सुधार तो हो रहा है। लेकिन इस सुधार

के बाद भी आम आदमी की आमदनी का बड़ा हिस्सा फिर से पेट्रोल और डीजल की बढ़ी हुई

कीमतों पर खर्च हो जा रहा है। यानी दो तरफा लाभ की स्थिति में सिर्फ केंद्र सरकार ही है।

आखिर केंद्र सरकार को जीएसटी के बाद भी जनता की जेब से कितने पैसे चाहिए होते हैं,

इस पर भी सोचने का वक्त आ चुका है।

कोरोना संकट हमें समझदार बना गया है

काफी कुछ नुकसान कर जाने के बाद भी यह कोरोना संकट हमें उन मुद्दों की तरफ सोचने

को विवश कर गया है, जिनकी तरफ पहले हम ध्यान नहीं दे पाते थे। लॉकडाउन के दौरान

फुर्सत के पलों में इन मुद्दों पर सोचने का समय मिला तो दूध का दूध और पानी का पानी

समझ में आ रही है। रोजगार में लगे लोगों की संख्या जनवरी में बढ़कर 40.07 करोड़ हो

गई जबकि दिसंबर 2020 में यह संख्या 38.88 करोड़ थी। इस तरह जनवरी के दौरान

करीब 1.2 करोड़ अधिक लोगों को रोजगार मिला। यह एक बड़ी संख्या है क्योंकि

लॉकडाउन के पहले शायद ही कभी रोजगार में मासिक बदलाव 50 लाख से अधिक रहा है।

जनवरी में तो रोजगार वृद्धि इस अधिकतम संख्या से भी दोगुनी रही है। इसके साथ

लॉकडाउन के शुरुआती महीनों में रोजगार में आई तीव्र गिरावट के बाद रिकवरी प्रक्रिया

सुस्त पड़ गई थी और फिर यह मुकाम तक पहुंचने के पहले ही रुक गई। अक्टूबर से लेकर

दिसंबर 2020 के दौरान हर महीने रोजगार में गिरावट रही। इस लिहाज से जनवरी 2021

में हुई यह रिकवरी एक राहत लेकर आई है। जनवरी 2021 में हुए सुधार ने उसके पहले के

तीन महीनों में हुई रोजगार क्षति की पूरी तरह भरपाई कर ली। लेकिन सवाल यह है कि

ईंधनों के दाम बढ़ाये जाने का आम आदमी के घर की बजट पर सीधा और परोक्ष प्रभाव तो

पड़ना तय है। ऐसे में जो लोग पहले की सरकार को कोसा करते थे, वे चुप्पी साधे क्यों बैठे

हैं, यह बड़ा सवाल है। स्मृति ईरानी सरीखे लोगों का यह पाखंड नहीं तो और क्या है

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