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हंगरी के वैज्ञानिकों ने पांचवी शक्ति का पता लगाया

  • इसी पांचवी शक्ति से जुड़ा है डार्क मैटर
  • शोध के दूसरे चरण ने सभी का ध्यान खींचा
  • अंतरिक्ष के अधिकांश हिस्से में है अदृश्य शक्ति
  • दुनिया और बाहर को संचालित करने में एक ऊर्जा स्रोत और
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः हंगरी के वैज्ञानिकों ने एक नया दावा पेश किया है। उनका दावा है कि उनलोगों ने उस पांचवी ऊर्जा का
पता लगाया है, जो अब तक विज्ञान की आंखों से ओझल है। वैसे इस किस्म की किसी शक्ति के होने का एहसास
पहले ही पदार्थ विज्ञान के वैज्ञानिकों को था। उसके अलावा भी अंतरिक्ष में इसके विद्यमान होन के संकेत मिले
थे। लेकिन अब तक इसके बारे में वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर कोई प्रमाण सामने नहीं आया था।

हंगरी के वैज्ञानिक अपने शोध के दौरान तब हैरान हो गये जब उन्होंने कई अणुओं को विखंडित होते पाया।
यह इस तरीके से हुआ, जिसकी कल्पना पहले पदार्थ विज्ञान के अनुसंधान में पहले कभी नहीं हुई थी।
उनके मुताबिक जब हिलियम का अणु समाप्त होता है तभी यह धीमी रोशनी निकलती है और यह रोशनी उसके
अणुओं के विखंडन की वजह से निकलती है।

हंगरी के इस शोध के बारे में जो जानकारी दी गयी है उसके मुताबिक जब लिथियम के किसी छोटी पट्टी पर
प्रोटोनों की बौछार होती है तो इन प्रोटोनों को लिथियम सोख लेता है।

इस प्रक्रिया के दौरान वहां अस्थायी तौर पर बेरिलियम पैदा होता है। इस बेरिलियम का भी तेजी से विखंडन
होता है और कई नये अणु और प्रोटोन तैयार होते हैं। इसी दौरान जब लिथियम पर प्रोटोन की चोट 140 डिग्री
पर होती है तो अप्रत्याशित इलेक्ट्रान और पोसिट्रोन पैदा होते हैं, जिसके बारे में अब तक किसी को पता नहीं था।

हंगरी के एकाडेमी ऑफ साइंस के वैज्ञानिक अटीला क्राझानाहोरके तथा उनकी टीम ने इसे खोजने का दावा किया है।
इस दल ने दूसरी बार यह काम कर दिखाया है। इस उपलब्धि के आधार पर वैज्ञानिक यह मानते हैं कि दरअसल
ऊर्जा का यह पांचवा स्रोत भी सौरमंडल के काम करने के तौर तरीकों पर नई रोशनी डाल सकता है।

हंगरी के वैज्ञानिकों के तथ्य से विज्ञान के नये आयाम खुले

इस अनुसंधान के दौरान जिस अणु के विखंडन से रोशनी निकलते देखा गया, उसे शोध दल ने वर्तमान में
एक्स 17 का नाम दिया है। दरअसल यह नाम इस वजह से दिया गया है क्योंकि इसका आणविक गुण 17
मेगा इलेट्रोन वोल्ड के बराबर है।

शोध दल के नेता अटीला के मुताबिक यह नया अणु खुद भी कई रहस्य छिपाये हुए हो सकता है, जिसे और
अधिक समझने की जरूरत है। वर्तमान में इसका पता ही पहली बार चला है। इसलिए भविष्य में इसके गुणों
और आचरणों के बारे में शोध से और अधिक जानकारी मिल पायेगी।

शोध दल यह मानता है कि पदार्थ विज्ञान का यह पांचवा कोण ही शायद विज्ञान को सौर मंडल के उस डार्क
मैटर के साथ अपने रिश्ते को स्पष्ट कर सकता है।

इस शोध के बारे में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफसर जोनाथन फेंग कहते हैं कि यह खोज पूरे विज्ञान
के लिए एक नई दिशा प्रदान करने वाला साबित हो सकता है। दरअसल अगर इस प्रयोग को दोहाराया जा सका
और यह प्रक्रिया अनवरत हो पायी तो यह नोबल पुरस्कार के लिए वैज्ञानिक उपलब्धि होगी।

शोध दल ने लगातार तीन साल तक इस विषय पर काम किया है। दरअसल वे रेडियोएक्टिव क्षरण पर काम कर
रहे थे। उनका मानना था कि इस दौरान निश्चित तौर पर कोई अतिरिक्त ऊर्जा निकलती है, जो वर्तमान विज्ञान
की आंखों से ओझल है।

दुनिया में महाविस्फोट की प्रक्रिया वैज्ञानिक स्तर पर आजमाये जाने के हिग्स बोसन प्रयोग के दौरान ही इसके
कुछ संकेत मिल गये थे।

पुष्टि हुई तो सौर मंडल कैसे बना इसका भी पता चलेगा

अब इस शोध के बारे में दावा किया जा रहा है कि इसकी पुष्टि होने पर निश्चित तौर पर यह पता चल पायेगा कि
यह सौर मंडल दरअसल किस पद्धति पर काम करता है।

वर्तमान में विज्ञान के पास चार ऐसी ऊर्जा के होने का पता है। इस पांचवे स्रोत के बारे में जानकारी मिलने के बाद
पूरे सौर जगत में मौजूद डार्क मैटर के साथ हमारे रिश्ते का खुलासा भी हो सकेगा।

इससे पहले भी इसी शोध दल ने वर्ष 2016 में इस पांचवी शक्ति के होने की जानकारी पहली बार दी थी। उस दौरान
यह बिल्कुल नई बात थी। इसलिए कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने उनके अनुसंधान में दिये गय
तथ्यों और तरीकों की नये सिरे से जांच करने के बाद तथ्य की पुष्टि की थी।

दरअसल यह पाया गया था कि रेडियो एक्टिविटी के दौरान इस पांचवी शक्ति के होने के प्रमाण मिले हैं। हालांकि
तब दुनिया का ध्यान इस खोज की तरफ कम गया था। अलबत्ता दुनिया भर के वैज्ञानिक इस शोध की उपलब्धियों
के बारे में अवगत हो चुके थे।

अब नये सिरे से इस अनुसंधान में एक और कड़ी जुड़ने के बाद फिर से वैज्ञानिकों का ध्यान इसकी तरफ गया है।

इस शोध की जानकारी रखने वाले सिडनी विश्वविद्यालय के एस्ट्रोफिजिक्स विभाग के प्रोफसर जेरेइंट लुइस
कहते हैं कि इस शोध का सीधा निष्कर्ष यही है कि एक अणु दूसरे अणु से संपर्क स्थापित करता है। अब तक विज्ञान
इस संपर्क पथ को नहीं खोज पाया है।

इसका पता नहीं होने की वजह से ही वर्तमान विज्ञान का उस डार्क मैटर से कोई संपर्क स्थापित नहीं हो पा रहा है,
जिसके होने के प्रमाण वैज्ञानिकों के पास पहले से ही मौजूद हैं। लेकिन यही डार्क मैटर अंतरिक्ष के अस्सी फीसदी
इलाके में विद्यमान है।

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