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इंसानी आबादी भी समाप्त हुई है उल्कापिंड की बारिश से




  • पृथ्वी पर उल्कापिंडों से अनेक बार बदलाव हुए हैं

  • उत्तरी सीरिया के इलाके में मिले प्रमाण

  • वहां मौजूद शीशा के कण भी साक्ष्य हैं

  • कई अन्य प्रजातियां भी मिट गयी होंगी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः इंसानी आबादी के भी उल्कापिंड के टकराने से तबाह होने के वैज्ञानिक प्रमाण

अब सामने आये हैं। यह प्रमाणित तथ्य है कि पृथ्वी के सबसे बड़े और आक्रामक प्राणी

डायनासोर के तबाह होने का असली कारण एक बड़े उल्कापिंड का आ टकराना ही था।

पहली बार यह पता चला है कि प्रारंभिक इंसानी जीवन भी इसी की वजह से नष्ट हुए थे।

शोधकर्तओँ को सीरिया के पास इसके प्रमाण मिले हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के

शोध दल ने अबू हुयेरा इलाके में इसके साक्ष्य तलाशे हैं। यह उत्तरी सीरिया का इलाका है।

इस इलाके के बारे में यह जानकारी मिली है कि यह प्रारंभिक आधुनिक मानव का इलाका

था। आज से करीब तेरह हजार वर्ष पूर्व वहां के इंसान शिकार छोड़कर खेती करने की तरफ

अग्रसर होने लगे थे।

यहां के लेक असद इलाके में अब पिघले हुए शीशे के नमूने मिले हैं, ऐसे शीशों का निर्माण

आसमान में होता है जब उल्कापिंड पृथ्वी पर आ टकराता है। इसलिए समझा जा रहा है

कि वहां तो इंसानी आबादी थी, उसके नष्ट होने का कारण भी उल्कापिंड ही था। दरअसल

यह उस जमाने की बात है जब इंसानों ने खुद शीशा तैयार करना भी नहीं जाना था।

इसलिए अगर प्राचीन काल का शीशा है तो वह उल्कापिंड के जमीन पर गिरने के दौरान

आसमान में हुई रासायनिक प्रतिक्रिया की वजह से ही थी।

इंसानी आबादी पर शोध के बाद वैज्ञानिक साक्ष्य मिले हैं

इस शोध से जुड़े भूवैज्ञानिक प्रोफसर जेम्स केनेट कहते हैं कि उल्कापिंड गिरने के दौरान

तापमान इतना अधिक हो जाता है कि वह आधुनिक काल के किसी वाहन को पल भल में

पिघल सकती है। ठोस आकार की सारी वस्तुएं इस अधिक तापमान की वजह से गल

जाती हैं। जिस काल में यह उल्कापिंड गिरने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है वह

करीब 11, 700 वर्ष पुरानी घटना है। उस दौरान की पृथ्वी को प्लेस्टोसीन काल कहा जाता

है। वैज्ञानिक मानते हैं कि शायद इस उल्कापिंड के अचानक आ गिरने की वजह से पृथ्वी

पर मौजूद कुछ अन्य प्रजातियां भी पूरी तरह समाप्त हो गयी होंगी।

इलाके में शोध के दौरान इंसानी आबादी होने के साक्ष्य मिले हैं और उस काल के शीशे के

टुकड़ों की वजह से ऐसा माना जा रहा है कि उल्कापिंड की बारिश की वजह से ही यह

आबादी समाप्त हो गयी थी। उस वक्त की परिस्थिति के बारे में वैज्ञानिक अनुमान है कि

उल्कापिंड के नीचे आने के दौरान अचानक ही सारी हवा ऊपर की तरफ खींची चली गयी

होगी। इस वजह से जमीन पर मौजूद प्राणियों को सांस लेने लायक हवा भी नहीं मिली

होगी। दूसरी तरफ पानी के अंदर मौजूद जीवन आसमान से होने वाली शीशों की बारिश की

वजह से सांस घुटने से मर गयी होगी। क्योंकि शीशे के छोटे कण पानी के अंदर से उनके

गलफड़ों में जाकर फंस गये होंगे। इससे उनका भी दम घुट गया होगा।

शोध प्रबंध कहता है कि कई प्रजातियां एक साथ प्रभावित हुई थी

इस बारे में प्रकाशित शोध प्रबंध के मुख्य लेकर डेविड व्हाइट हाउस कहते हैं कि आस पास

के इलाको में इंसानी आबादी होने के अन्य प्रमाण भी मौजूद हैं और यह बस्ती अगर

अचानक से समाप्त हो गयी तो उसका एकमात्र कारण उल्कापिंड ही रहा होगा, क्योंकि

वहां शीशे का टुकड़े मौजूद हैं। इस बारे में उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष में लगातार ही कुछ न

कुछ बदलाव होता रहता है। मसलन पृथ्वी के पास पहले कोई चंद्रमा नहीं था। बाद में

अंतरिक्ष में मौजूद गैस और धूलकणों की टक्कर से पृथ्वी के करीब यह चांद तैयार हुआ है।

चांद के बनने के पहले शायद पृथ्वी पर उल्कापिंडों की अधिक बारिश हुआ करती होगी।

अब दो गुरुत्वाकर्षणों की वजह स अंतरिक्ष में मंडराते पत्थर सीधे पृथ्वी पर नहीं गिरा

करते हैं।

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