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दुनिया के अन्य जीवों को बदलने के लिए मजबूर कर रहा है इंसान

  • जमीन से लेकर पानी तक हुआ अनुसंधान
  • दूसरों के इलाकों पर लगातार बढ़ रहा इंसानी कब्जा
  • इंसान को छोड़ शेष सभी प्राणियों की जेनेटिक संरचना बदला
  • अन्य जीवों के विलुप्त होन के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः दुनिया के अन्य तमाम जीव शायद इंसान की वजह से ही परेशान हैं।

तमाम प्राणियों में क्रमिक विकास एक निरंतर प्राकृतिक प्रक्रिया है।

लेकिन हाल के दिनों में जमीन से लेकर समुद्र तक के जीवों में जो कुछ बदलाव नजर आने लगे हैं,

उसके पीछे का असली कारण दुनिया के अन्य जीवों पर मानव का प्रभाव ही है।

मैकगिल विश्वविद्यालय के शोध दल ने यह निष्कर्ष निकाला है।

इस शोध के खास हिस्सों को इकॉलॉजी जर्नल नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

शोध वैज्ञानिक मान रहे हैं कि दुनिया के पर्यावरण में जो खतरनाक बदलाव आ रहे हैं,

वे सारे के सारे इंसानों की करतूतों की वजह से हैं।

वैसे भी दुनिया के अन्य जीवों को रहने के लिए अब जगह कम मिल रही है।

इसका भी असली कारण इंसान की आबादी का बढ़ना और जंगल का कम होना है।

इंसान की वजह से जमीन के अलावा समुद्र और पानी में भी रहने वाले जीवों को अपने में बदलाव करना पड़ रहा है।

इससे कई खतरनाक संकेत भी उभर रहे हैं।

इंसानी प्रभाव से जेनेटिक बदलाव के खास पहचान कुछ खास किस्म के कीड़ों

और मछलियों में तो साफ साफ नजर आने लगा है।

वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इसी बदलाव की प्रक्रिया सामान्य से तेज होने की वजह से

जो प्राणी अथवा अन्य जीव खुद को तेजी से नहीं बदल पायेंगे, वे अंततः पृथ्वी से विलुप्त हो जाएंगे।

ऐसा इस धरती पर पहले भी होता आया है।

दूसरी तरफ क्रमिक विकास के तहत अनेक प्राणियों ने अपने बाहरी और आंतरिक ढांचो को

बदलने में कामयाबी पायी है। इसी सफलता की वजह से वह अब तक धरती पर जीवित हैं।

लेकिन इन सभी पर अब सिर्फ इंसानी करतूतों की वजह से खतरा मंडरा रहा है।

दुनिया के अन्य तमाम जीवों के लिए इंसान ही सबसे बड़ा खतरा

हम अपने आस-पास भी दुनिया के अन्य जीवों के बदलने अथवा उनके समाप्त होने की तरफ

अग्रसर होने के संकेत आसानी से खुली आंखों से देख सकते हैं।

शहरी इलाकों में अब जुगनू नजर नहीं आते।

मोबाइल टावर की वजह से शहरी इलाकों में अब गौरेया कम नजर आने लगी है।

इसी तरह अन्य पक्षी भी धीरे धीरे घनी आबादी वाले इलाकों से दूर हटते जा रहे हैं।

लेकिन दूसरी तरफ प्राणियों के रहने का इलाका भी इंसानी कब्जे में आता जा रहा है।

इसी वजह से अब अनेक हिंसक जंगली प्राणियों को अक्सर ही शिकार की तलाश में

आबादी वाले इलाकों में आते हुए देखा जा रहा है।

वैसी परिस्थितियों में इंसान इन प्राणियों की हत्या तो कर देता है।

लेकिन वैज्ञानिक इस बात पर ध्यान देने की वकालत कर रहे हैं कि दरअसल इंसान

ने ही उन प्राणियों के इलाकों पर कब्जा जमा रखा है।

खास तौर पर झारखंड जैसे राज्यों में हाथियों का बढ़ता प्रकोप भी दुनिया के

अन्य प्राणियों पर इंसानी दुष्प्रभाव की निशानी है।

शोध में बताया गया है कि दुनिया के अन्य जीवों के लिए रहने की जगह कम पड़ती जा रही है।

साथ ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों में भी वे खुद को तेजी से नहीं ढाल पा रहे हैं।

इससे उनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।

जेनेटिक विविधता के मामले में कुछ जीव बदलाव नहीं कर पा रहे हैं

वैज्ञानिकों ने पाया है कि इन जीवों के क्रमिक विकास की कुंजी जेनेटिक विविधता है।

इसमें जैसे जैसे सुधार होता है वैसे वैसे जीव जंतुओं, पक्षियों, मछलियों यहां तक की

छोटे कीट पतंगों में भी सुधार होता चला जाता है।

जब कभी दुनिया के अन्य प्राणी इस बदलाव में खुद को ढाल नहीं पाते हैं,

वे धीरे धीरे पृथ्वी से विलुप्त होने लगते हैं।

पृथ्वी पर ऐसे बदलाव पहले से भी होते आये हैं।

लेकिन अब सारी गड़बड इंसानी गतिविधियों की वजह से ही हो रही है।

इसमें बदलाव की गति तेज होने की वजह से दुनिया के अन्य जीव खुद को

इतनी तेज गति के बदलाव के साथ खुद को ढाल नहीं पा रहे हैं।

इस विश्वविद्यालय ने दुनिया के अन्य तमाम जीवों में से 17082 के 27 हजार से अधिक नमूनों का विश्लेषण किया है।

इन सभी की जेनेटिक संरचना पर यह शोध हुआ है।

हर साल इनमें कुछ न कुछ बदलाव नजर आ रहा है।

लेकिन इंसान में वर्ष 1980 से 2016 तक कोई ऐसा उल्लेखनीय बदलाव नजर नहीं आ रहा है।

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