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भीषण ज्वालामुखी विस्फोट से तबाह हो गया था पूरा भारत महाद्वीप का इलाका




  • पूर्व वैज्ञानिक आकलन नये शोध में गलत प्रमाणित
  • पहले समझा गया था कि उल्कापिंड की वजह से तबाही
  • उल्कापिंड गिरने के पहले दक्षिण भारत में ज्वालामुखी विस्फोट
  • पूरे वायुमंडल में फैल गया था लावा के साथ निकला पारा का गैस
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः भीषण ज्वालामुखी विस्फोट से तबाह हो गया था भारत

महाद्वीप।  यह ज्वालामुखी विस्फोट अभी से करीब 66

मिलियन वर्ष पूर्व हुआ था। इस भीषण विस्फोट की वजह से उस वक्त

की पूरी आबादी तबाह हो गयी थी। पहले इस काल में तबाही के कारण

को उल्कापिंड के गिरने को माना गया था। नये शोध में भारत में भी

भीषण ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था। वैज्ञानिक इसके कड़ियों को

जोड़ते हुए इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इस किस्म का भीषण विस्फोट

दरअसल डक्कन के इलाके में हुआ था। उस काल के अवशेषों की जांच

से इसके साक्ष्य प्राप्त हो रहे हैं। ऐसा पाया जा रहा है कि उस वक्त के

ज्वालामुखी विस्फोट में भीषण अधिक मात्रा में पारा पूरे वातावरण में

फैल गया था। इस जहरीले वातावरण की वजह से उस दौर का जीवन

पूरी तरह नष्ट हो गया था। इस घटना के अनेक हजार वर्ष बाद पृथ्वी

पर बड़ा सा उल्कापिंड आ गिरा था। इस उल्कापिंड के गिरने से भी

तबाही आयी थी। लेकिन इस घटना के करीब 250 हजार वर्ष बाद नये

सिरे से उल्कापिंड पृथ्वी पर आ गिरे थे। इस बारे उल्कापिंड की वजह

से हुए विस्फोट से पूरी पृथ्वी में आग लग गयी थी। इसी आग और

अत्यधिक उच्च तापमान की वजह से डायनासोर जैसे खतरनाक प्राणी

एक ही झटके में पृथ्वी से विलुप्त हो गये थे।

वीडियो में देखे कैसे मर गये डायनासोर और आया नया जीवन

लेकिन वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि उल्कापिंड गिरने के दौरान भी

पृथ्वी का वातावरण जहरीला ही बना हुआ था। उल्कापिंड के गिरने से

हुए भीषण विस्फोट के बाद यह वातावरण सुधरता चला गया। भीषण

आग में सब कुछ तबाह हो जाने के बाद नये सिरे से जीवन की उत्पत्ति

हुई।

भीषण ज्वालामुखी विस्फोट से हवा जहरीली

उस दौर के फॉसिल्स की जांच में उनके अंदर पारा की घातक मात्रा अब

भी मौजूद पायी गयी है। वैसे कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि उल्कापिंड के

पृथ्वी के काफी करीब से गुजर जाने की वजह से ही इस क्षेत्र में एक के

बाद एक ज्वालामुखी का विस्फोट होने लगा था। दक्षिण भारत के क्षेत्र

में यह इलाका ही डक्कन ट्रैप के नाम से जाना जाता है। अनुमान है कि

एक सिरे से अनेक ज्वालामुखी के फटते चले जाने की वजह से उनका

लावा पृथ्वी पर करीब 15 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैल गया था।

इससे भारत के अलावा भी उस काल के अन्य इलाके, जो इससे सटे हुए

थे, प्रभावित हुए थे। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिकों

ने इसके बारे में तथ्य जुटाने के बाद यह निष्कर्ष व्यक्त किया है। इस

शोध के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए वैज्ञानिक समुद्री के अंदर मौजूद

फॉसिल्स में भी पारा की मात्रा पा चुके हैं। वैसे यह बता देना उचित

होगा कि समुद्री फॉसिल्स में पारा की यह जानलेवा मात्रा पाये जाने का

शोध पहले ही मिशिगन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा कर लिया

गया था। शोध में मिले तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर वैज्ञानिक यह

मान रहे हैं कि ज्वालामुखी विस्फोट का यह सिलसिला भी काफी लंबा

चला था। इससे उस वक्त पृथ्वी पर मौजूद जीवन पूरी तरह तबाह हो

गया था। इन ज्वालामुखी विस्फोटों के क्रम की जांच के क्रम में यह

संभावना भी व्यक्त की जा रही है कि शायद उल्कापिंडों के काफी

करीब से लगातार गुजरते जाने की वजह से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण पर

भी उनका लगातार प्रभाव पड़ रहा था।

लावा के साथ साथ निकल रहा था जहरीला गैस भी

इसी वजह से अंदर का लावा उबाल मारकर बाहर की तरफ आने लगा

था। एक स्थान से दूसरे स्थान तक काफी दूरी तक यह क्रम चलने की

वजह से वायुमंडल में पारा युक्त जहरीली गैस की भरमार हो गयी थी।

वैसे भी ज्वालामुखी को इस किस्म के जहरीले पारद को वायुमंडल में

छोड़ने का सबसे प्रमुख कारण माना जाता है। इसके साथ ही इनके

लावा के साथ निकलने वाले धुआं में कार्बन डॉईऑक्साइड और सल्फर

डॉईक्साइड की मात्रा अधिक होने से हर कुछ विषैला हो गया था। इसके

समुद्र तक पहुंचने की वजह से समुद्र का पानी भी जहरीला हो गया था

क्योंकि उसमें एसिड की मात्रा खतरनाक तरीके से बढ़ गयी थी और

समुद्री जीवन इसी एसिड की वजह से तबाह हो गया था।

वैज्ञानिकों ने इस बारे में पुख्ता राय बनाने के लिए कार्बोनेट क्लंप्ड

आइसोटोप पालेथर्मोमेट्री विधि का परीक्षण किया है। इसके जरिए वे

इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उस प्राचीन काल में भी पृथ्वी का प्रदूषण

अभी के जितना ही हो चुका था या फिर इससे भी अधिक था। जिसकी

वजह से जीवन के क्रम को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन

वायुमंडल में नहीं बचा था।



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