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विशाल कछुआ का आकार किसी कार से भी बड़ा था

  • मीठे पानी के इलाके में रहता था यह जीव

  • आकार में बड़ा होने के साथ आक्रामक भी

  • डायनासोर प्रजाति के खत्म होने का युग था

  • कोलंबिया के रेगिस्तान के अवशेषों से पुष्टि

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः विशाल कछुआ समुद्र में अब भी पाये जाते हैं।लेकिन इस बार

वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्राचीन विशाल कछुआ का अवशेष खोज निकाला है, जो

अब तक का रिकार्ड है। खुदाई में मिले इसके फॉसिल्स के आधार पर यह

समझा जा रहा है कि इसका आकार अपने जीवन में वर्तमान युग के किसी

कार से बड़ा होता था। लिहाजा यह पानी और जमीन दोनों पर समान रुप से

विचरण करता था। अनुमान है कि आकार की वजह से उसकी गति भी

वर्तमान प्रजाति के कछुआ से अधिक हुआ करती थी। वैसे इसी किस्म के

विशाल कछुआ का एक फॉसिल वेनेजुएला के उरुमाको इलाके में भी मिला है।

प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक इन कछुओं के इस पृथ्वी पर अस्तित्व अभी से

करीब सत्तर लाख वर्ष पूर्व हुआ करता था। शोध से जुड़े कुछ वैज्ञानिक इनकी

आयु 130 लाख वर्ष भी आंक रहे हैं। अवशेषों के अध्ययन से वैज्ञानिक इस

नतीजे पर भी पहुंचे है कि विशाल कछुआ की यह प्रजाति मीठे पानी में रहती

थी और शायद अत्यंत आक्रामक भी थी।

इस विशाल कछुआ का फॉसिल पाये जाने के बाद इसे स्टूपेंडिमिस

जिओग्राफिकुस का नाम दिया गया है। आकार में यह करीब चार मीटर लंबा

हुआ करते थे और वजन करीब सवा टन हुआ करता था। इससे समझा जा

सकता है कि पृथ्वी पर उस दौर में यह कछुआ वास्तव में कितना भयानक

नजर आता होगा। फॉसिल के आधार पर यह देखा गया है कि उनकी गरदन के

दोनों तरफ तीखे सींग भी हुआ करते थे। इन सीगों का इस्तेमाल निश्चित तौर

पर लड़ाई में किया जाता था। शायद विशाल कछुआ की यह प्रजाति भी अपने

अपने इलाके पर वर्चस्व को लेकर काफी आक्रामक हुआ करती थी। ऐसा

निष्कर्ष फॉसिल पर मिले निशान से निकाले गये हैं। ऐसे निशान किसी अन्य

कछुआ के सींग के हमले से हुआ होगा।

विशाल कछुआ का अवशेष भी चोट के निशानों वाला

बोगोटा के डेल रोसारियो विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिक एडविन काडेना ने

कहा कि वर्तमान प्रजाति के कछुआ के आचरण को देखकर भी उस प्राचीन

काल के विशाल कछुआ के जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है। शोध

वैज्ञानिक मानते हैं कि डायनासोर युग की समाप्ति के दौर में ही यह कछुआ

हुआ करते थे। इनकी अधिकतम लंबाई 4.6 मीटर तक हुआ करती थी। वर्ष

1970 में भी इस प्रकार का अवशेष मिला था लेकिन पूरी तरह सही अवस्था में

नहीं होने की वजह से उससे कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका था। अब सही

अवस्था में अवशेष पाये जाने के बाद इन विशाल कछुआ की प्रजाति के बारे में

पूरी जानकारी मिल पायी है। वैसे वैज्ञानिक इन्हीं अवशेषों के आधार पर आगे

का अनुसंधान भी कर रहे हैं।

पाये गये अवशेषों में इस प्रजाति के प्राणी का निचला जबड़ा भी है, जिससे

पता चलता है कि उसके मुंह के अंदर भी चबाने की जबर्दस्त ताकत थी। किसी

सामान्य कार के आकार का होने के बाद भी उसकी ताकत अत्यधिक थी और

वह अपने इलाके में दबदबा कायम करने के लिए लगातार युद्ध किया करता

था।

उस काल में विशाल आकार के मगरमच्छ भी हुआ करते थे

वैज्ञानिकों ने उसकी संरचना के आधार पर माना है कि यह कछुआ भी छोटे

आकार के प्राणियों के अलावा मछली और यहां तक कि सांपों को अपना

भोजन बनाया करता था। लेकिन वे जरूरत के मुताबिक वर्तमान कछुआ के

जैसा शाकाहार भी किया करते थे। आकार में बड़े होने के बाद भी वे गहरी

नदियों और झीलों के तल में ही रहा करते थे।

फॉसिल पाये जाने के बाद वहां से निकलने वाली कई प्रमुख नदियों में इनकी

मौजूदगी होने का पता चला है। समझा जाता है कि उस दौर के विशाल आकार

के मगरमच्छों से उनका पाला पड़ता रहता था। उस दौर के मगरमच्छ भी

करीब 11 मीटर लंबे हुआ करते थे। वे भी इन विशाल कछुआ को उसकी

मजबूत खोल की वजह से हमेशा ही शिकार नहीं बना पाते थे।

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