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अंदर से खोखला हो चुके ग्लेशियर कभी भी समुद्री बाढ़ लायेंगे

  • समुद्र का गर्म पानी लगातार अंदर जा रहा है

  • आकार में ग्रेट ब्रिटेन से भी बड़े हैं ग्लेशियर

  • यह टूटे तो कई शहर समुद्र में समा जाएंगे

  • ब्रिटिश और अमेरिकी अनुसंधान दल का काम

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अंदर से खोखला होने के बाद भी वे ऊपर से आकार में विशाल नजर आते हैं।

जैसे जैसे पानी के अंदर लगे उपकरणों से अंटार्कटिका के ग्लेशियरों की जांच हो रही है, वैसे

वैसे यह स्थिति और स्पष्ट होती चली जा रही है। ऊपर से किसी विशाल पहाड़ श्रृंखला के

जैसा नजर आने वाले यह सारे बर्फ खंड अंदर से इतने खोखले हो चुके हैं कि कभी भी

टूटकर समुद्र में जा सकते हैं। वैज्ञानिक काफी पहले से इसके लिए आगाह कर रहे हैं कि

अगर ऐसा हुआ तो समुद्र का जल स्तर अचानक ही ऊपर उठने की वजह से समुद्र में भी

बाढ़ जैसी स्थिति आ सकती है।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने पाया है कि पानी के अंदर यानी गहरे समुद्र में अंदर से

खोखला हो चुके कुछ ग्लेशियर तो आकार में ग्रेट ब्रिटेन से भी बड़े हैं। इससे समझा जा

सकता है कि अगर अचानक इतने बड़े बर्फ के टुकड़े समुद्र में चले गये तो समुद्र में क्या

कुछ स्थिति बनेगी। इतने बड़े आकार के बर्फ के पिघलने के दौरान भी समुद्र के पानी का

तापमान प्रभावित हो जाएगा और ताप के इधर उधर होने की वजह से भी अंदर का

वातावरण अस्थिर हो जाएगा। साथ ही इसके पानी बनने के तुरंत बाद भाप बनना संभव

नहीं होने की वजह से ही समुद्र का जलस्तर ऊपर आ जाएगा।

अंदर के खोखला होने की जानकारी आधुनिक उपकरणों से

आधुनिक उपकरणों की मदद से ऐसे ग्लेशियरों के नीचे की स्थिति का जब पता लगाया

गया तो ग्लेशियरों के अंदर से खोखल होने की जानकारी मिल पायी है। वैसे पहले से ही

इस बात का अंदाजा लगाया जा रहा था कि समुद्री जल के तापमान में बढ़ोत्तरी की वजह

से ग्लेशियरों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन वैज्ञानिक यह आकलन नहीं कर

पाये थे कि यह सारे ग्लेशियर अंदर से इतने अधिक मात्रा में पिघल चुके हैं और उनके

पिघलने की गति लगातार तेज होती चली जा रही है। लाखों वर्षों से लगे जमी हुई अवस्था

में रहने वाले इन ग्लेशियरों की रासायनिक संरचना भी भिन्न है। इस वजह से उनके पानी

बनने से समुद्री जल का वर्तमान संतुलन भी बदल जाना तय है। इससे समुद्री जीवन पर

भी प्रभाव पड़ सकता है। समुद्री तापमान में बढ़ोत्तरी की वजह से कई स्थानों पर प्रवाल के

द्वीप पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। 

जिन्हें कृत्रिम तरीके से बसाने और फिर से हरा भरा बनाने का काम चल रहा है। इसी तरह

मुंगे की चट्टानों के क्षतिग्रस्त होने की वजह से वहां के आस पास जीवन बसर करने वाले

समुद्री प्राणियों का जीवन भी प्रभावित हुआ है।

अंदर से खोखला होने की स्थिति दांत में गडडा होने जैसी स्थिति है। एक बार अंदर छेद

होने के बाद वह छेद लगातार गर्म पानी के प्रभाव में बढ़ता ही जा रहा है। ऊपर से जो

ग्लेशियर नजर आ रहा है, वह अंदर से अब ठोस अवस्था में नहीं है। लिहाजा वह अब

किसी भी पल टूटकर समुद्र में आ सकता है।

शोध के लिए एक रोबोट सबमेरिन का भी इस्तेमाल

नये अनुसंधान के लिए ब्रिटिश और अमेरिकी शोध दल ने एक आधुनिक पनडुब्बी के साथ

साथ हवाई जहाज और एक रोबोट सबमेरिन का भी इस्तेमाल किया है। पानी के अंदर

रोबोट सबमेरिन में लगे कैमरों और उपकरणों की मदद से ग्लेशियर के नीचे की स्थिति

का अध्ययन किया गया है। इससे कौन सा ग्लेशियर अंदर से कितना क्षतिग्रस्त हुआ है,

उसकी जानकारी मिली है। इसके आधार पर ही वैज्ञानिक नजर आने वाले ग्लेशियरों के

वास्तविक आकार के कंप्यूटर मॉडल बनाने में कामयाब रहे हैं। रोबोट सबमेरिन के कैमरे

स ही दो खास गहरी खाइयां नजर आयी हैं। ग्लेशियर के नीचे बनी यह काइ करीब दस

किलोमीटर लंबी और आठ सौ मीटर गहरी है। यहां से समुद्र का गर्म पानी लगातार अंदर

आ रहा है। गर्म पानी के प्रभाव में अंदर का लाखों वर्षों से जमा हुआ बर्फ लगातार पिघलता

जा रहा है। वहां से मिले आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि दरअसल

ग्लेशियरों के नीचे यह गड्डे करीब दस हजार वर्ष पूर्व के हैं। अंतर सिर्फ यह है कि हाल के

दिनों में वे बहुत तेजी से बड़े होते जा रहा है। वहां के थावाइट्स ग्लेशियर अगर टूटकर

समंदर में जा गिरा तो तय है कि इससे पूरी दुनिया के समुद्री जल स्तर में तुरंत ही बदलाव

आ जाएगा। इसके परिणाम स्वरुप समुद्र के किनारे बसे कई शहर समुद्र के अंदर समाने

लगेंगे।


 

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