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इशारों इशारों में दिल लेने वाले बता यह हुनर तूने सीखा कहां से




इशारों इशारों में बहुत कुछ कह दिया जाता है। इसे समझना पड़ता है कि कब और कौन सा इशारा क्या कह रहा है। इसे जो समझ लें वह इंडियन पॉलिटिक्स में सफल हैं वरना तो आया राम गया राम ढेर सारे पड़े हैं, जिनको यह गलतफहमी है कि उनकी इजाजत के बगैर सूर्य भी नहीं उगता है।




इशारों को शायद अमित शाह बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं। इसी वजह से उत्तरप्रदेश में चुनावी सभाओं की तरह जनता से बात करते हुए वह पता नहीं क्या क्या बोल रहे हैं। दरअसल शायद उनके दिमाग में दूसरी चिंता घर कर गयी है।

ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि बंगाल चुनाव के पहले तक को यही माना जाता था कि पूरी पार्टी में असली सरकार अमित शाह ही चलाते हैं। लेकिन अब तो भाजपा के उस चाणक्य की हालत बहुत बुरी हो चुकी है।

इतना ज्यादा सस्पेंस पैदा नहीं करते हुए सीधे सीधे साफ कर देता हूं कि मुंबई में ममता बनर्जी से मिलने गौतम अडाणी भी पहुंचे थे। नरेंद्र मोदी सरकार में जिस औद्योगिक घराने को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचा है वह अडाणी समूह ही है।

लेकिन इतने दिनों तक अन्य तमाम राजनीतिक दलों से दूरी बनाकर रहने वाला अडाणी समूह को अचानक ममता बनर्जी से मिलना क्यों जरूरी लगा, इसकी गहराई को समझ जाइयेगा तो इंडियन पॉलिटिक्स पर बिजनेस घरानों के प्रभाव भी समझ में आ जाएगा।

इशारों को समझने के लिए अपना भी दिमाग लगाइये

थोड़ा अपना ब्रेन भी खर्च कीजिए। एक साल तक किसान आंदोलन चला क्योंकि वे तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे थे। इन कानूनों को पारित करने के पहले से ही अडाणी के बड़े बड़े गोदाम बनकर तैयार हो गये थे। अब अंततः उत्तर प्रदेश में पार्टी की पतली हालत को देखकर मजबूरी में नरेंद्र मोदी को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़ गये।

इससे और लोगों पर क्या कुछ असर हुआ यह बाद की बात है। लेकिन श्री मोदी के इस एलान के बाद ही गौतम अडाणी का ममता बनर्जी से मिलना हुआ है। इसे अगर सिर्फ संयोग मानते हैं तो आपकी बुद्धि पर मुझे तरस आता है। देश का औद्योगिक घराने दूर तक सोचता है। शायद उसे भी बदलते हुए पॉलिटिकल मौसम का आभाष हो गया है।




इसलिए अपना घर सुरक्षित रखने की चाल पहले से चली जा रही है। मुकेश अंबानी तो पहले ही ममता बनर्जी के पूंजी निवेश संबंधी आयोजनों में भाग ले चुके हैं। इसी बात पर फिल्म कश्मीर की कली का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था श्याम बिहारी ने और संगीत में ढाला था ओपी नैय्यर ने। इसे आशा भोंसले और मोहम्मद रफी ने अपनी स्वर दिया था।

इशारों इशारों में दिल लेने वाले
बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से
निगाहों निगाहों में जादू चलाना
मेरी जान सीखा है तुमने जहाँ से
मेरे दिल को तुम भा गए
मेरी क्या थी इस में खता
मेरे दिल को तड़पा दिया
यही थी वो ज़ालिम अदा, यही थी वो ज़ालिम अदा
ये राँझा की बातें, ये मजनू के किस्से
अलग तो नहीं हैं मेरी दास्तां से
मुहब्बत जो करते हैं वो
मुहब्बत जताते नहीं

बहुत कुछ कहा नहीं जाता लेकिन समझना पड़ता है

धड़कने अपने दिल की कभी
किसी को सुनाते नहीं, किसी को सुनाते नहीं
मज़ा क्या रहा जब की खुद कर लिया हो
मुहब्बत का इज़हार अपनी ज़ुबां से
माना की जान-ए-जहाँ
लाखों में तुम एक हो
हमारी निगाहों की भी
कुछ तो मगर दाद दो, कुछ तो मगर दाद दो
बहारों को भी नाज़ जिस फूल पर था
वही फूल हमने चुना गुलसितां से
इशारों इशारों में दिल लेने वाले
बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से

तो भइया तेल देखों और तेल की धार देखो। जिन लोगों ने आज तक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपने लिए अछूत सा समझ रखा है वे अगर पहले से ही ममता बनर्जी से अपना रिश्ता सुधारने पर जुटे हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि मोदी जी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेकर ऐसे घरानों का उन पर से भरोसा कम होने का काम किया है।

शायद तेजी से बदलते इंडियन पॉलिटिक्स में ऐसे मालदार लोग भी अपना माल संभालने के लिए पहले से ही मजबूत लंगर खोजने लगते हैं, जो उन्हें अब ममता बनर्जी में नजर आने लगा है।

देश में चुनाव और किसान आंदोलन की चर्चा के बीच इस बात पर किसी का ध्यान भी नहीं गया कि तमाम मोबाइल सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों ने अपने दाम 1 तारीख से बढ़ा दिये। अब समझा जा सकता है कि नये सिरे से बदलने समीकरणों को साधने देश का यह पूंजीपति घराना दूसरा किनारा भी तलाशने में जुट गया है। अब इतना कुछ देखकर बूझ सको तो बूझ लो नहीं तो मजे करो।



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