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राजधानी के करीब नक्सली धमक को क्या समझें







राजधानी रांची के बिल्कुल करीब दशम जलप्रपात के इलाके में

नक्सली धमक को पुलिस नहीं सरकार के लिए चुनौती समझा जाना चाहिए।

नक्सली उन्मूलन और पुलिस आधुनिकीकरण के नाम पर करोड़ों नहीं

अरबों खर्च होने के बाद भी पुलिस का सूचना तंत्र अगर सही तरीके से विकसित

नहीं हो पाया है,तो इसकी जिम्मेदारी फिर से तय की जानी चाहिए।

वैसे भी झारखंड में पहले से ही इस बात के आरोप लगते आये हैं कि

सूचना तंत्र विकसित करने के नाम पर हिसाब के बाहर आवंटित होने वाले पैसे की बंदरबांट होती है।

अभी हाल ही में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने राज्य के सभी पर्यटन केंद्रों को विकसित करने की बात कही है।

उनकी यह घोषणा पतरातू में लेक रिसोर्ट के उदघाटन के मौके पर हुई थी।

दूसरी तरफ जहां पर नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में पुलिस के दो जवान मारे गये हैं,वह

राजधानी रांची के सबसे करीब के पर्यटन स्थलों में से एक है।

ऐसे में समझा जा सकता है कि रांची हो अथवा राज्य के किसी अन्य हिस्से के

जंगली इलाकों पर नजर रखने में पुलिस विफल रही है।

साथ ही पूर्व सूचना होने के बाद भी सामान्य हिदायतों का पालन क्यों नहीं किया गया,

इसके लिए भी किसी बड़े अधिकारी की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

आम तौर पर ऐसे मामलों में थाना प्रभारी को बलि का बकरा बनाकर मामले की लीपा पोती कर दी जाती है।

लेकिन सवाल जब नक्सलियों से मुठभेड़ का है तो सिर्फ थाना प्रभारी को

जिम्मदार बताने की दलील से काम नहीं चलने वाला है।

पुलिस को अगर वहां नक्सली गतिविधियों की सूचना थी, तो किन अधिकारियों तक यह सूचना पहुंची थी

और सूचना मिलन के बाद उन अधिकारियों ने इस पर क्या कुछ किया, इसका भी खुलासा होना चाहिए।

ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि नीचे से ऊपर तक हर बार एक जैसी दलील दी जाती है,

जिसका अब कोई औचित्य नहीं रह गया है।

करीब छह माह पहले गढ़वा के बूढ़ा पहाड़ इलाके को पूरी तरह घेर लिये जाने का दावा किया गया था।

बताया गया था कि इस बूढ़ा पहाड़ के ऊपर बड़े नक्सली नेता सुधाकरण ने अपना कैंप बना रखा है।

अपुष्ट जानकारी के मुताबिक कैंप के लिए बाकायदा जेनरेटर तक का इंतजाम किया गया था।

इस सूचना को आये काफी माह बीत चुके हैं लेकिन पुलिस की तरफ से

बूढ़ा पहाड़ को नक्सली मुक्त कराया जा सका अथवा नहीं, इसकी जानकारी नहीं दी गयी है।

इस कड़ी में सिर्फ एक तथ्य महत्वपूर्ण है कि इससे पहले झूमरा पहाड़ भी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था।

वहां पर अभियान तब प्रारंभ हुआ था जब नीरज सिन्हा( वर्तमान में एसीबी के डीजी) वहां डीआइजी के पद पर थे।

उन्होंने खुद इस अभियान का नेतृत्व किया।

जोरदार टक्कर के बाद अंततः नक्सलियों को वहां से हटना पड़ा।

खुद श्री सिन्हा कई दिनों तक वहां कैंप कर पुलिस चौकी स्थापित कराते रहे।

अब नतीजा है कि झूमरा पहाड़ पर सीआरपी की टुकड़ी है।

कई अवसरों पर नक्सली दोबारा इस पर कब्जा करने की कोशिश तो कर चुके हैं लेकिन हर बार असफल रहे हैं।

इसलिए पुलिस विभाग में जिम्मेदारी तय करने का काम अब होना ही चाहिए।

विकास के तमाम दावों के बीच जब राजधानी के इतने करीब में नक्सली वारदात की

सूचनाएं बाहर जाती हैं तो उसका शेष भारत अथवा विदेशों में क्या कुछ असर होता होगा,

यह समझा जा सकता है।

यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि किसी भी इलाके में पूंजी निवेश का सही माहौल की जो शर्तों हैं,

उनमें कानून और व्यवस्था की स्थिति के ठीक होने की शर्त अनिवार्य है।

अब राजधानी रांची के इतने करीब में अगर नक्सली हमले में दो पुलिसवाले मारे जा रहे हैं

तो इसका बाहर क्या कुछ संदेश जा रहा होगा, इसे भी समझा जा सकता है।

बात सिर्फ अकेले राजधानी रांची के करीब का भी नहीं है।

कई जिलों में अब भी गाहे बगाहे नक्सली हिंसा की घटनाएं होती जा रही है।

कुछ अरसा पूर्व सरायकेला खरसांवा इलाके के एक बाजार में दिनदहाड़े नक्सली हमला हुआ था।

कुकड़ू बाजार में हुए उस नक्सली हमले में भी कई पुलिसवाले मारे गये थे।

इसलिए सिर्फ नक्सली उन्मूलन के दावों के साथ साथ जिन माध्यमों से उन हथियारबंद गिरोहों तक काफी पैसा पहुंच रहा है,

उन्हे समाप्त करने की दिशा में भी काम होना चाहिए। दरअसल अवैध कमाई का हिस्सा

जब पुलिस और राजनीतिज्ञों तक पहुंचने लगता है तो इस दिशा में किये जाने वाले

सारे प्रयास यूं ही बेकार साबित हो जाते हैं।

लेवी वसूली में जुटे लोगों को अच्छी तरह पता है कि यह पैसा किन लोगों तक पहुंच रहा है।

ऐसे में राजधानी के अलावा भी झारखंड में नक्सली उन्मूलन का अभियान नकारा साबित होने लगता है।



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