अंतरिक्ष में घूमते बैक्टेरिया ने खुद को विकसित कर लिया

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  • सुक्ष्म जीवों पर प्रतिकूल माहौल का अब असर नहीं हो रहा

  • विषाणुओं से लड़कर भी जिंदा है उस माहौल में 

  • उनका बदलाव इंसानों की भी कर सकता है मदद

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अंतरिक्ष में मंडराते बैक्टेरिया किस तरीके से जिंदा हैं, यह बड़ा सवाल वैज्ञानिकों के सामने आ खड़ा हुआ है।

अंतरिक्ष के स्पेस स्टेशन पर कुछ बैक्टेरिया और जीवाणु पाये जाने के बाद से इस पर बहस चल रही है।

अब यह देखा जा रहा है कि पृथ्वी से बाहर वायुशून्यता की अवस्था में भी ये बैक्टेरिया जीवित कैसे हैं।

अब इस दिशा में शोध हो रहा है कि इन बैक्टेरिया ने क्या खुद को उस वातावरण के लायक ढाल लिया है।

वैसे भी पृथ्वी की परिधि से बाहर जीवाणुओं के अस्तित्व का पता चलने के साथ साथ स्पेस स्टेशन पर उनकी उपस्थिति से वैज्ञानिक चौकन्ना हुए थे।

स्पेस स्टेशन पर पाये गये कुछ जीवाणुओं की प्रजाति पृथ्वी पर पाये जाने वाली कुछ प्रजाति से मिलती जुलती थी।

अब वहां गुरुत्वाकर्षण और ऑक्सीजन की सीमा से बाहर ये सुक्ष्म जीव जीवित कैसे हैं,

यह जानना रोचक विषय बन गया है।

सुपरबग से इंसान नहीं लड़ पा रहा लेकिन बैक्टेरिया लड़ रहे हैं

सामान्य वैज्ञानिक परिकल्पना के मुताबिक जहां स्पेस स्टेशन है, वहां प्राण होने लायक कोई परिस्थिति नहीं है।

अंतरिक्ष स्पेश स्टेशन पर वैकल्पिक व्यवस्था की वजह से अंतरिक्ष यात्री वहां रह पाते है।

उनके सांस लेने के लिए वहां कृत्रिम उपाय किये जाते हैं।

इसलिए अगर इन उपायों के बिना भी सुक्ष्म जीव वहां जीवित हैं तो वह कैसे हो रहा है, यह सवाल बड़ा बन गया है।

वैसे इसके साथ ही वैज्ञानिक इस बात से भी अब इंकार नहीं करते कि इस परिस्थिति में

यह भी माना जा सकता है कि अंतरिक्ष में कहीं शून्य के बीच भी

जीवाणुओं अथवा घातक किस्म के विषाणुओं की पूरी बस्ती भी हो सकती है।

जो अंततः मानव जीवन के लिए खतरा बन सकते हैं।

वैज्ञानिकों की एक सोच इस पद्धति पर भी काम कर रही है कि

क्या बैक्टेरिया ने परिस्थिति के मुताबिक खुद को ढालते हुए अपने अंदर बदलाव कर लिये हैं।

इन्हीं बदलावों की वजह से वे अंतरिक्ष में भी जीवित रह पा रहे हैं।

वैसे इससे बड़े आकार के प्राणियों और पौधे के जीवन की जांच के लिए

चीन का अंतरिक्ष यान चांद के दूसरे छोर पर उतर चुका है।

इस चीनी यान में रखे कीट पतंग और पौधो के बीजों को सींचने तक का प्रबंध है।

चीन के वैज्ञानिक वहां जीवन की संभावनाओं की तलाश के लिए यह प्रयोग कर रहे हैं।

अंतरिक्ष में पाये गये बैक्टेरिया के बारे में अब तक यह तो पता चल चुका है कि

ये उन विषाणुओं के प्रभाव में नहीं आते तो पृथ्वी पर मानव निर्मित दवाइयों के प्रभाव से आगे निकल चुके हैं।

अंतरिक्ष यात्रा का नया द्वार भी खोल सकता है यह शोध

इस श्रेणी के सुपर बगों पर अब सामान्य एंटीबॉयोटिक दवाइयों का कोई असर नहीं होता।

इस श्रेणी के विषाणुओं के बीच भी बैक्टेरिया का जीवित रहना, किसी नई संभावना को जन्म दे रहा है।

यानी मानव जीवन जिन विषाणुओं से खुद को बचा नहीं पा रहा है,

सामान्य किस्म के बैक्टेरिया उन्हीं विषाणुओं को परास्त कर आराम से अंतरिक्ष में रह रहे हैं।

वैज्ञानिक मान रहे हैं कि इस किस्म के बैक्टेरिया में हुए बदलाव का अगर पता चल जाए

तो पृथ्वी पर भी ईलाज के नये तरीकों का ईजाद हो सकता है।

दरअसल इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि एक ही श्रेणी के बैक्टेरिया पृथ्वी और अंतरिक्ष में अलग अलग आचरण कर रहे हैं।

लिहाजा यह माना जाना चाहिए कि अंतरिक्ष में होने की वजह से इस श्रेणी के बैक्टेरिया ने खुद में कोई बदलाव तो किया ही है।

इस बार में पूरी जानकारी मिलने की स्थिति में वैज्ञानिक अंतरिक्ष के अन्य ग्रहों तक पहुंचने के नये तरीकों पर भी काम कर सकते हैं

क्योंकि उन इलाको में सामान्य मानव जीवन के लायक परिस्थिति नहीं है।

इंसान बदला तो अंतरिक्ष यात्रा सहज होगी

बैक्टेरिया के गुणों से अगर इंसान भी खुद में तब्दीली ला सका

तो अन्य ग्रहों पर उसका पहुंचना और भी आसान हो जाएगा।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि आम तौर पर बैक्टेरिया किसी भी चमड़ी के सतह पर आराम से रह लेती है।

उन्हें चमड़े पर मौजूद तेल और रसायनों से भोजन मिलता रहता है।

लेकिन जब वे अंतरिक्ष में होते हैं तो वहां ऐसा कुछ भी नहीं होता।

अत्यंत ठंडी सतह पर भी वे कैसे जीवित रह पाते हैं, इसे समझने की जरूरत है।

वहां भी अगर बैक्टेरिया खुद को जीवित रख पा रहे हैं तो उसके कारणों की तलाश होनी चाहिए

ताकि इंसान भी उसी तर्ज पर अन्य ग्रहों की यात्रा पर निकल सके।

संभव है कि इससे इंसानी जीवन के अन्य ग्रहों पर बसने का नया रास्ता भी खुल जाएगा।

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