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पिछले छह वर्षों में शहद निर्यात हुआ दोगुना, किसानों को लाभ

  • आत्मनिर्भर भारत योजना में शामिल है यह उत्पादन

  • आधुनिक तकनीकों मे भी पारंगत हुए देश के किसान

  • इसके जरिए महिला सशक्तीकरण भी तेज हुआ है

  • वैज्ञानिक तरीके से खेती के साथ मधुमक्खी पालन

  • शहद आधारित उत्पादों का बाजार भी बढ़ा है

नयी दिल्ली: पिछले छह वर्षों में जो आंकड़े मौजूद हैं, उसके मुताबिक देश का शहद निर्यात

बहुत बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में देश में एकीकृत कृषि प्रणाली के

तहत मधुमक्खी पालन से न केवल शहद का उत्पादन बढ़ रहा है बल्कि पिछले छह साल

के दौरान इसका निर्यात दोगुना हो गया है । वर्ष 2013..14 के दौरान देश में 76,150 टन

शहद उत्पादन होता था जो वर्ष 2019..20 में बढ़कर 1,20,000 टन हो गया है जो 57.58

प्रतिशत की वृद्धि है। पहले शहद का निर्यात 28,378.42 टन था जो वर्ष 2019..20 में बढ़कर

59,536.74 टन हो गया है । इस शहद निर्यात मिशन की घोषणा आत्मनिर्भर भारत

योजना के तहत की गई थी। जिसे राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड (एनबीबी) के माध्यम से लागू

किया जा रहा है। वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन को लेकर जागरूकता और क्षमता निर्माण ,

इसके माध्यम से महिलाओं का सशक्तिकरण , आय बढ़ाने में तकनीक का मधुमक्खियों

पर प्रभाव और कृषि एवं बागवानी उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार के लिए 2,560 लाख

रुपये की 11 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है। इसका उद्देश्य किसानों को रॉयल जेली,

बी वेनोम, कॉम्ब हनी आदि महंगे उत्पादों के उत्पादन के लिए विशेष मधुमक्खी पालन

उपकरणों के वितरण और हाई अल्टीट्यूड हनी के लिए संभावनाएं तलाशना है । उत्तर

प्रदेश के कन्नौज और हाथरस जिलों में विशेष उत्पादन और पेट के कैंसर के उपचार में

मस्टर्ड शहद के इस्तेमाल के बारे जानकारी देना भी है। सरकार ने दो विश्व स्तरीय

अत्याधुनिक शहद परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना की स्वीकृति दी है ।

पिछले छह वर्षों में प्रोत्साहन के अनेक काम हुए हैं

जिनमें से एक एनडीडीबी , आणंद, गुजरात और दूसरी आईआईएचआर , बंगलुरू,

कर्नाटक में स्थापित की जायेगी। आणंद स्थित प्रयोगशाला को एनएबीएल ने मान्यता दे

दी है। अब इस प्रयोगशाला में एफएसएसएआई द्वारा अधिसूचित सभी मानदंडों के लिए

शहद के नमूनों का परीक्षण शुरू कर दिया गया है। करीब 16 लाख हनीबी कॉलोनीज के

साथ 10,000 मधुमक्खी पालकों एवं शहद समितियां और कंपनियां एनबीबी में पंजीकृत

हो गई हैं। शहद एवं अन्य मधुमक्खी उत्पादों के स्रोत का पता लगाने के लिए एक प्रस्ताव

को स्वीकृति दे दी गई है और इस दिशा में काम शुरू कर दिया गया है। इससे शहद और

अन्य मधुमक्खी उत्पादों में मिलावट को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। किसानों को बी

पोलेन, प्रोपोलिस, रॉयल जेली, बी वेनोम आदि ऊंची कीमत वाले मधुमक्खी उत्पादों के

उत्पादन सहित वैज्ञानिक ढंग से मधुमक्खी पालन करने के लिए प्रशिक्षण दिया गया है।

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल राज्यों में मधुमक्खी

पालकों के पांच किसान उत्वादक संगठन (एफपीओ) बनाए गए हैं। हरियाणा, दिल्ली,

बिहार, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, तमिलनाडु,

कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश में एक

एक केन्द्र की स्थापना की गई है। फसलों के परागण में मधुमक्खी पालन खासा उपयोगी

है, जिससे किसानों की आय बढ़ रही है और शहद व बी वैक्स, बी पोलेन, प्रोपोलिस, रॉयल

जेली, बी वेनोम आदि महंगे उत्पाद उपलब्ध हो रहे हैं। देश की विविधतापूर्ण जलवायु

मधुमक्खी पालन के लिए व्यापक संभावनाएं और अवसर उपलब्ध कराती है।

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