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शरीर के मुकाबले उसकी गरदन कई गुणा लंबी थी

  • इटली और स्विटजरलैंड की सीमा पर मिला प्राचीन प्राणी का नया अवशेष

  •  डायनासोर युग में मौजूद था यह विचित्र प्राणी

  •  गरदन किसी घातक हथियार के जैसा मजबूत

  •  दो नमूनों पर अभी आगे चल रही है जांच

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः शरीर के मुकाबले गरदन का ही अधिक लंबा होना, आज के दौर के प्राणियों में

नजर नहीं आता है। इसलिए जब खुदाई के दौरान ऐसी फॉसिल मिली तो एकबारगी

वैज्ञानिक हैरान रह गये थे। काफी शोध के बाद इस प्राणी को प्राचीन युग का

टाइनिस्ट्रोफियूज माना गया है। यह धरती पर करीब 242 मिलियन वर्ष पूर्व मौजूद था।

इसकी गरदन इतनी लंबी क्यों थी अथवा वह कौन सी प्रजाति है, जो इस प्रजाति के करीब

है, इस पर आगे अनुसंधान चल रहा है। जो अवशेष प्राप्त हुआ है, उसमें गरदन इस प्राणी

के शरीर और पूछ को मिलाकर होने वाली लंबाई से भी कई गुणा अधिक है। इतनी लंबी

गरदन का प्राणी कैसे खुद को व्यवस्थित रख पाता होगा, इसके बारे में ढांचे की बनावट के

आधार पर शोध चल रहा है। इस अत्यधिक लंबी गरदन की मजबूती का भी पता चला है

क्योंकि इसमें 13 रीढ़ जैसी हड्डियां भी हैं और नीचे बदन में उसकी पसलियां भी हैं। यानी

यह एक अत्यंत मजबूत गरदन वाला प्राणी था।

जब इसके अवशेष मिले थे तो प्रारंभिक अवस्था में शोधकर्ताओं ने इसे पेट्रोसोर प्रजाति का

मान लिया था। यह पेट्रोसोर प्रजाति डायनासोर के काल का जानवर था बल्कि यह पक्षी था

जो उड़ भी सकता था। इसके अवशेष के आधार पर अब तक वैज्ञानिक इस नतीजे पर नहीं

पहुंच पाये हैं कि यह जानवर जमीन पर रहता था अथवा पानी में। उसके लिए अवशेष के

हिस्सों का बारिकी से विश्लेषण किया जा रहा है। इसी किस्म के एक अवशेष के करीब डेढ़

सौ वर्ष पूर्व प्राप्त होने का रिकार्ड दर्ज है। लेकिन उस वक्त इस फॉसिल की सही पहचान

नहीं हो पायी थी।

शरीर के मुकाबले ऐसी संरचना से डायनासोर समझा गया था

करंट बॉयोलॉजी नामक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित शोध प्रबंध के मुताबिक

वैज्ञानिकों का एक दल इसके दोनों नमूनों की नये सिरे से जांच कर रहा है। जो नमूने जांच

के लिए उपलब्ध हैं, उनमें से एक पूर्ण विकसित है जबकि दूसरा किसी शिशु अथवा छोटे

आकार का है। अनुसंधानकर्ताओं ने इसे और बेहतर तरीके से समझने के लिए इसका सीटी

स्कैन भी किया है। सीटी स्कैन के आंकड़ों का कंप्यूटर विश्लेषण भी किया गया है। इसके

आधार पर इसका एक त्रि आयामी ( थ्री डी) मॉडल तैयार किया गया है। खास कर उसकी

खोपड़ी की बनावट स्पष्ट होने के बाद उसकी संरचना ने वैज्ञानिकों को हैरान किया है।

इसी खोपड़ी की बनावट की वजह से वैज्ञानिकों का प्रारंभिक आकलन है कि यह शायद

पानी के अंदर रहने वाला जीव था। उसकी खोपड़ी की बनावट भी पानी के अंदर पूर्ण रुप से

सक्रिय होने के जैसी ही है।

नेशनल म्यूजियम स्कॉटलैड के वैज्ञानिक डॉ निक फ्रैजर ने कहा कि इसके सर की बनावट

से तो ऐसा लगता है कि यह इसी संरचना की वजह से मछली जैसे प्राणियों को ललचाता

था और नजदीक आने पर निगल जाया करता था। काफी लंबी गरदन होने की वजह से

उसके मुह के अंदर प्रवेश करने वाले प्राणियों को काफी देर बाद पता चलता था कि वह

किसी के शिकार हो गये हैं। मछली अथवा अन्य प्राणी इस बात को तब समझ पाते थे जब

वे इतनी लंबी गरदन की दूरी तय कर पेट के अंदर पहुंचते थे। लेकिन गरदन की बनावट में

इतनी मजबूती है कि यह अपनी गरदन की मार से भी किसी को मार सकता था। वर्तमान

में हम जिराफ जैसे जानवरों के गरदन की मार के घातक असर को जानते और देखते हैं।

इसकी गरदन की मार भी घातक हथियार जैसी

इतनी लंबी मजबूत गरदन से प्रहार किसी लोहे के मजबूत औऱ बहुत बड़े रॉड के जैसा प्रहार

की शक्ति पैदा करता है।

जिस दूसरे नमूने की वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं वह वैज्ञानिकों को और हैरान कर रहा है।

यह समझ में नहीं आ रहा है कि यह कम वयस्क है अथवा पूर्ण विकसित लेकिन छोटे

आकार का प्राणी है। इस छोटे फॉसिल की संरचना को देखकर ऐसा माना जा रहा है कि यह

अचानक हमला कर अपने शिकार के शरीर के किसी भी हिस्से को अपने नुकीले दांत से

तेज झटके के साथ काट लेता था।


 

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