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हिरण्यावती नदी के उद्गम स्थल को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू

कुशीनगरः हिरण्यावती नदी को फिर से जीवित करने का काम प्रारंभ कर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म के लोगों के लिए गंगा के समान पवित्र नदी हिरण्यावती का

उद्गम स्थल की पहचान कर ली गई और इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू कर दिया

गया है। कुशीनगर के मुख्य विकास अधिकारी आनंद कुमार ने बताया कि जल की कमी

एवं अतिक्रमण के चलते अपना वजूद खो चुकी इस नदी की नए सिरे से तलाश शुरू की गई

है। अतिक्रमण हटाने के साथ ही मनरेगा के बजट से नदी की खुदाई कराई जाएगी। इस

कार्य में राजस्व, सिंचाई, बाढ़ खंड एवं अन्य विभागो ने मिलकर इस नदी को पुनर्जीवित

करने का प्रयास शुरू किया है। श्री कुमार ने बताया कि नदी के उद्गम की तलाश की गई है

और राजस्व अभिलेख में दर्ज बरसाती नालों एवं जमीनों के रिकार्ड के आधार पर इस नदी

का उद्गम स्थल रामकोला ब्लॉक के सपहां गांव के ताल को माना गया है। नदी के किनारे

बसे गांवों के लोगों से जानकारी जुटाने के लिए पंचायतीराज विभाग की मदद ली गई। नदी

के पुराने रास्ते पर जगह-जगह अतिक्रमण किया हुआ है। उन्होंने बताया कि अनेक

स्थानों पर यह बरसाती नाले के रूप में मौजूद है तो कुछ जगहों पर अस्तित्व ही खत्म हो

चुका है। बाढ़ खंड के अधिशासी अभियंता भरत राम ने बताया कि इस नदी की लंबाई

अभिलेखों के अनुसार 49.370 किमी है। बाढ़ खंड नदी की सफाई में तकनीकी सहयोग दे

रहा है। कप्तानगंज के एसडीएम अरविंद कुमार का कहना है कि इस नदी के पुनरुद्धार के

लिए राजस्व कर्मियों की टीम लगाकर जमीन का सीमांकन करा लिया गया है। अवैध

कब्जा हटाने के लिए शीघ्र ही नोटिस जारी किया जाएगा। इसके बाद अतिक्रमण हटाने की

कार्रवाई शुरू की जाएगी।

हिरण्यावती नदी के इलाके से पहले अतिक्रमण हटाया जाएगा

उन्होंने बताया कि हिरण्यावती नदी का उद्गम स्थल सपहा गांव का ताल को माना गया

है। यहां से सिधावें, बसडीला, मोतीपाकड़, कठघरही, परवरपार, अहिरौली कुसुम्ही से होते

नदी कुशीनगर तक पहुंचती है। कुशीनगर से आगे बढ़ने पर कुड़वा दिलीपनगर गांव में

घाघी नदी से मिलती है। घाघी नदी आगे छोटी गंडक में जाकर मिलती है। तथागत बुद्ध का

परिनिर्वाण हिरण्यावती नदी के तट पर हुआ था, जहां अब रामाभार स्तूप है। अब तक

केवल कुशीनगर में ही इसकी सफाई होती थी। उन्होंने बताया कि प्रशासन ने सितंबर

2012 में पहली बार इस नदी को पुनर्जिवित करने के लिए प्रयास किया था। तत्कालीन

डीएम रिग्जियान सैंफिल ने हिरण्यावती नदी की खोज के लिए राजस्व कर्मियों की ड्यूटी

लगाई थी। लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। बाद में डीएम रहे लोकेश एम एवं शंभू कुमार ने भी

इसमें रुचि दिखाई लेकिन उद्गम स्थल की तलाश की बजाय कुशीनगर के पास ही नदी के

बचे हुए हिस्से की साफ सफाई कराकर काम बंद करा दिया गया। डीएम रहे आंद्रा वामसी

ने भी इस नदी को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई थी लेकिन

उन्होंने भी कुशीनगर में ही इस नदी की सफाई एवं घाटों कों पक्का कराने का कार्य

कराया। श्री कुमार ने बताया कि ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिरण्यावती

नदी का उद्गम स्थल खोज लिया गया है। नदी के रास्ते पर अतिक्रमण को भी चिह्नित

कर लिया गया है। अतिक्रमण हटने के बाद ग्राम पंचायतें मनरेगा के बजट से इसकी

सफाई कराएंगी। बाढ़ खंड इसमें तकनीकी सहयोग करेगा।

गंदे नालों का प्रवाह भी नदी में जाने से रोका जाएगा

कुशीनगर नगर पालिका इस नदी में गिरने वाले गंदे नाले को बंद कराएगा। इसके अलावा

कसाडा के बजट से घाटों को पक्का बनाने और सुंदरीकरण का कार्य कराया जाएगा।

उन्होंने बताया कि नदी में वर्षभर जल प्रवाहित रखने के लिए जलस्रोत जरूरी है। इसके

लिए सिंचाई विभाग से कार्ययोजना बनाने को कहा गया है। अगले माह मार्च में इस नदी

को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू करा दिया जाए। बौद्धकालीन मल्ल गणराज्य की

राजधानी कुशीनारा (कुशीनगर का प्राचीन नाम) हिरण्यावती नदी के तट पर स्थित था।

बुद्ध चरित के अनुसार, हिरण्यावती नदी का जल पीकर ही तथागत बुद्ध ने बौद्ध भिक्षुओं को

अंतिम उपदेश दिया था। इसी नदी के किनारे तथागत बुद्ध को महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ

था। बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के लिए यह नदी गंगा के समान पवित्र है। लेकिन

वर्तमान में जल की कमी और इसके मार्ग पर हुए अतिक्रमण के चलते यह नदी मृतप्राय हो

चुकी है।

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