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हिमालय के ग्लेशियर दस गुणा अधिक गति से पिघल रहे हैं




  • पूरे दक्षिण एशिया के खतरा बन रहा है प्रदूषण

  • दो हादसों का उदाहरण हमारे सामने है

  • यहां की पारिस्थितिकी अत्यंत नाजुक

  • इलाके और खेती पर भी संकट आयेगा

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हिमालय के ग्लेशियर उम्मीद से दस गुणा अधिक गति से पिघल रहे हैं। यह सिर्फ भारत नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए खतरे की बात है। पिछले चार दशकों के आंकड़े और सैटेलाइट चित्रों से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि अब हिमालय के अनेक इलाकों में ग्लेशियरों की परत पहुत ही पतली हो चुकी है।




लगातार बढ़ते प्रदूषण का ही नतीजा है कि केदारनाथ धाम का हादसा और नंदीदेवी ग्लेशियर के खिसकने जैसी घटनाएं हुई हैं। बता दें कि हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से भारत सहित कई देशों की खेती निर्भर है। साथ ही हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का बुरा प्रभाव भी उन तमाम इलाकों पर पड़ता है, जहां से वैसी नदियों का प्रवाह है, जो हिमालय से निकलती हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में इस बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गयी है, जिसमें इस लगातार बढ़ते खतरे की तरफ ध्यान आकृष्ट किया गया है।

हिमालय के ग्लेशियर अत्यंत संवेदनशील हैं

सारे वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि हिमालय के ग्लेशियर पर य़ह कुप्रभाव दरअसल मानव निर्मित है। वहां के अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी में छेड़छाड़ की वजह से ऐसा हो रहा है कि ग्लेशियरों तक अधिक गर्मी पहुंचने की वजह से वे तेजी से पिघल रहे हैं।

वैसे दुनिया के हर इलाके में ग्लेशियरों के साथ एक जैसी स्थिति है लेकिन हिमालय के ग्लेशियर दूसरे स्थानों के ग्लेशियरों से काफी भिन्न हैं और वहां का पर्यावरण भी काफी संवेदनशील तथा विविधतापूर्ण है। वैज्ञानिकों का आकलन है कि पिछले सात दशक में जो वहां नही हुआ था वह पिछले चार दशक में हो चुका है।




स्थिति में सुधार के लिए निरंतर प्रयास भी अगर किये गये तो हिमालय के ग्लेशियर को पूर्व स्थिति में पहुंचाने में काफी समय लगेगा। दुनिया के इस सबसे विस्तृत पर्वत श्रृंखला में अब तक पंद्रह हजार बर्फखंड इसकी चपेट में आ चुके हैं। कुछ इलाके अब पूरी तरह वीरान हो चुके हैं।

खेती और आबादी दोनों ही खत्म हो जाएंगे

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर यहां से ग्लेशियर समाप्त हो गये तो भारत सहित अन्य देशों की कृषि के लिए सिंचाई का जल नहीं बचेगा। इसके अलावा जो इलाके इसी हिमालय के ग्लेशियरों से निकलने वाले पानी पर आश्रित हैं, ग्लेशियर समाप्त होने पर उन इलाकों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा।

साथ ही हिमालय के ग्लेशियर जब और तेजी से पिघलते हुए समुद्र तक पहुंचेंगे तो समुद्री तटों के करीब स्थित इलाकों पर भी खतरा बढ़ जाएगा। अब तक वहां के करीब चालीस प्रतिशत ग्लेशियर समाप्त हो चुके हैं, ऐसा अनुमान लगाया गया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के वैज्ञानि जोनाथन कैरिविक कहते हैं कि तेज से मौसम के बदलाव को भी हिमालय के ग्लेशियर झेल नही पा रहे हैं। साथ ही यह चेतावनी भी दी गयी है कि इन ग्लेशियरों का यहां के मौसम चक्र को ठीक बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए यदि यह गड़बड़ हुआ तो दक्षिण एशिया के मौसम का चक्र भी पूरी तरह बिगड़ जाएगा। मौसम के अप्रत्याशित बदलाव को अब दुनिया के कई इलाकों में महसूस भी किया जा रहा है।



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