उच्च न्यायालय के आदेश पर बकोरिया कांड की जांच सीबीआइ के हवाले

बकोरिया में मारे गये लोग
  • झारखंड पुलिस के शीर्ष पर उथलपुथल का दौर

  • रेजी डुंगडुंग का कथन सच साबित होगा?

  • एमवी राव का प्रकरण सबकी जानकारी में

  • कई अन्य अधिकारियों का भी हुआ था तबादला

संवाददाता



रांची: उच्च न्यायालय ने अंतत: बकोरिया कांड की सीबीआइ जांच कराने की अनुशंसा कर दी है।

उच्च न्यायालय के इस फैसले से पुलिस के शीर्ष पदों पर फिर से उथल पुथल होना लगभग तय हो गया है।

इस एक कांड पर पुलिस महकमे में कई बार टकराव की स्थिति बनी थी।

राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एडीजी रेजी डुंगडुंग ने पहले ही इस कांड को पुलिस मुठभेड़ मानने से इंकार कर दिया था।

इसके बाद सत्ता शीर्ष की नाराजगी की वजह से उन्हें शंटिंग में भेजा गया था।

इसी कांड को लेकर एक अन्य एडीजी एमवी राव भी सरकार की नजर में खराब साबित हो गये थे।

वैसे अन्य सूत्र बताते हैं कि वर्तमान डीजीपी डीके पांडेय और स्पेशल ब्रांच के एडीजी अनुराग गुप्ता से उनकी अनबन का कारण कुछ और था।

जिस बकोरिया कांड का नाम लेते ही अनेक पुलिस अधिकारी मैदान छोड़ देते हैं, वह दरअसल पलामू की घटना है।

इस घटना में पुलिस ने यह दावा किया था कि पुलिस बल ने एक मुठभेड़ के बाद वहां से 12 नक्सलियों को मार गिराया है।

यह घटना आठ जून 2015 की रात की है। तब से ही इस कांड पर लगातार सवाल उठते रहे।

कई सामाजिक संगठनों ने भी घटनास्थल का दौरा कर तथा पीड़ित परिवार के लोगों से बात कर इस बात की पुष्टि की कि

दरअसल मारे गये लोगों में सिर्फ एक व्यक्ति ही नक्सली थी।

शेष सभी निर्दोष गांव वाले थे। इनमें कई नावालिग भी थे।

उसके बाद भी डीजीपी डीके पांडेय और कई अन्य पुलिस अधिकारी लगातार मारे गए सभी लोगों को कुख्यात नक्सली बताते रहे।

मृतक का नाम
पुलिस रिकॉर्ड में स्थिति
डॉ आरके उर्फ अनुराग
नक्सली घटनाओं की प्राथमिकी में अभियुक्त।
अमलेश यादव (35)
नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।
संतोष यादव (25)
अनुराग का बेटा, पर नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।
योगेश यादव (25)-
अनुराग का भतीजा, पर नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।
मो. एजाज अहमद-
स्कॉर्पियो चालक, नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।
उदय यादव (35)
पारा टीचर,नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।
नीरज यादव (25)
नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।
महेंद्र (15)-
नाबालिग, नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।
सकेंद्र (17)-
नाबालिग, नक्सली होने का कोई प्रमाण नहीं।

उच्च न्यायालय के फैसले से अब बदलेगा माहौल

जांच के दौरान पुलिस के सीनियर अफसरों ने सीआइडी को मैनेज करने की कोशिश की।

पहले तत्कालीन एडीजी सीआइडी अजय भटनागर, फिर अजय कुमार सिंह ने जांच के नाम पर कुछ नहीं किया।

जब सीआइडी के तत्कालीन एडीजी एमवी राव ने जांच में तेजी लाने की कोशिश की

तो पुलिस के ही सीनियर अफसरों ने सरकार से मिल कर उनका तबादला करवा दिया।

उन्हें दिल्ली में पदस्थापित करवा दिया। जांच में तेजी लाने का दंश आज भी वह झेल रहे हैं।

एमवी राव के बाद प्रशांत सिंह को एडीजी सीआइडी बनाया गया।

उन्होंने इस केस में क्या किया, यह नहीं पता, लेकिन अजय कुमार सिंह जब

दोबारा सीआइडी के एडीजी बने, तब सीआइडी ने मामले में फाइनल रिपोर्ट कोर्ट में जमा कर दिया।

पुलिस के रिकार्ड ही बताते हैं कि मारे गए लोगों में पांच नाबालिग थे।

मारे गये पांच लोग नाबालिग थे

उनमें से दो की उम्र मात्र 12 साल व एक की 14 साल थी। चरकू तिर्की और महेंद्र सिंह की उम्र सिर्फ 12 साल थी।

महेंद्र सिंह के आधार कार्ड में जन्म का वर्ष 2003 लिखा हुआ है, जबकि प्रकाश तिर्की की जन्म तिथि 01जनवरी 2001 लिखी हुई है।

उमेश की मां के मुताबिक वह गाय चराने के लिए घर से निकला था।

घटनाक्रम और स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक कथित मुठभेड़ में मारे गए उदय यादव पारा टीचर थे।

वह लातेहार के मणिका थाना क्षेत्र के रहने वाले थे और नेवाड़ गांव स्थित न्यू उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय में पारा टीचर थे।

घटना से करीब दो साल पहले वह नक्सलियों के निशाने पर थे।

घटना के बाद आरोप लगा था कि जेजेएमपी नामक उग्रवादी संगठन ने एक साजिश के तहत मारे गए लोगों को एक जगह जमा किया।

फिर योजनाबद्ध तरीके से सभी की हत्या कर दी। बाद में पुलिस ने हथियार रख कर मुठभेड़ का नाम दिया था।

बकोरिया कांड में रेजी डुंगडुंग और एमवी राव ही प्रताड़ित होने वाले सिर्फ दो पुलिस अफसर नहीं हैं।

बकोरिया कांड के चक्कर में कई अधिकारियों का हुआ तबादला

रांची जोन की आइजी सुमन गुप्ता, पलामू के तत्कालीन डीआइजी हेमंत टोप्पो का भी तबादला कर दिया गया।

सभी की पोस्टिंग शंटिंग पोस्ट पर की गयी। जहां उनके लायक काम नहीं थे।

कुछ दिनों बाद लातेहार के तत्कालीन एसपी अजय लिंडा का भी तबादला कर दिया गया।

क्योंकि वह भी फर्जी मुठभेड़ को सही बताने के लिए तैयार नहीं थे।

इसके अलावा दारोगा हरीश पाठक को भी तंग किया गया।

उन्हें गलत तरीके से मुकदमों में फंसाया गया।

कथित मुठभेड़ में मरनेवाले 12 में से पांच नाबालिग हैं, यह घटना के वक्त ही पुलिस को पता चल गया था।

सूत्रों के मुताबिक पुलिस को नाबालिगों के गांव-घर की जानकारी भी मिल गयी थी।

लेकिन पुलिस ने उनके शवों की पहचान नहीं करायी।

क्योंकि पुलिस नहीं चाहती थी कि घटना के तुरंत बाद यह बात सामने आये कि

जिन 12 लोगों को कथित मुठभेड़ में मारा गया, उनमें पांच नाबालिग थे।

समझा जाता है कि अब उच्च न्यायालय में इस मामले में सीबीआइ जांच का निर्देश आने क बाद

नये सिरे से पूरे मामले की समीक्षा और जांच होगी, जिसमें सारे तथ्य नये सिरे से खंगाले जाएंगे।



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