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लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये







लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये। यह किसी एक तरफ का जुमला नहीं है।

गाड़ी की दुकान पर बैठा दुकानदार मन ही मन यही दोहरा रहा है।

इस बार दुर्गापूजा और दशहरा में कपड़े के दुकानदार भी अच्छा बिजनेस नहीं कर पाये।

उनके यहां भी अन्य वर्षों की तुलना में ग्राहकों की भीड़ कम रही।

लिहाजा उनके दिलों में भी ग्राहकों के आने की उम्मीद में यही गीत चलता रहा होगा।

शेख हसीना ने तो आते आते प्याज का रोना रोया

देश से बाहर निकले तो बांग्लादेश की प्रधानमंत्री यह गीत प्याज के लिए गाती हुई सुनायी पड़ी हैं।

अपने भारत दौरे पर उन्होंने साफ साफ कहा कि अब तो वे बिना प्याज का ही खाना खा रही हैं

क्योंकि वहां प्याज बहुत महंगा हो गया है।

प्याज से याद आया कि कभी इसी प्याज ने सरकार उलटने की नौबत ला दी थी।

अब अगर प्याज की शिकायत की तो तुरंत कुछ खास पहचाने और अदृश्य चेहरे आपको राष्ट्र विरोधी करार देकर पाकिस्तान जाने की सलाह दे देंगे।

वैसे भी टेंशन की वजह से भारत ने पाकिस्तान से प्याज लेना बंद कर रखा है।

दोनों देशों के बीच सिर्फ एक ही सामान पाकिस्तान जा रहा है, वह है जीवन रक्षक दवाइयां।

पाकिस्तान के लिए इन दवाइयों को दूसरे रास्ते से लाना महंगा है।

पुलवामा की वजह से प्याज पर भी आफत है

वैसे कमसे कम पाकिस्तान के लोगों को भारत के रास्ते दवा मिल जा रही है, यह अच्छी बात है।

लेकिन अगर जिन ट्रकों से दवा भेजी जा रही है उन्हीं ट्रकों से प्याज की वापसी हो

तो कश्मीर का झगड़ा चलने के बाद भी यह खिसियाहट तो नहीं रहेगी।

अपने जमाने के हिसाब से हॉट फिल्म मानी गयी थी यह फिल्म। नाम था दो बदन।

यह मेरे से दो पीढ़ी ऊपर के लोग जो तब जवान थे, उन्हें प्रभावित करने वाला गीत था।

उस दौरान आधुनिक प्यार की पौधे बढ़ने लगी थी। वैसे मैं उस वक्त बच्चा ही था।

इस गीत को लिखे था शकील बदायूनीं ने और सुरों में ढाला था रवि ने।

इस गीत को स्वर दिया था लता मंगेशकर ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये

लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये
दिल उन को ढूंढता है ग़म का सिंगार कर के
आँखें भी थक गयी हैं अब इंतज़ार कर के
आँखें भी थक गयी हैं अब इंतज़ार कर के
इक साँस रह गयी है वो भी न टूट जाए

लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये
रोती हैं आज हम पर तनहाइयाँ हमारी
रोती हैं आज हम पर तनहाइयाँ हमारी
वो भी न पाये शायद परछाइयां हमारी
बढ़ते ही जा रहे हैं मायूसियों के साये

लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये
लौ थरथरा रही है अब शम्म-इ-ज़िन्दगी की
उजड़ी हुई मुहब्बत मेहमान है दो घडी की
उजड़ी हुई मुहब्बत मेहमान है दो घडी की
मर कर ही अब मिलेंगे जी कर तो मिल न पाये
लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये
लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आये।

इमरान भी हर चौराहे पर यही गीत दोहराते हैं

अपने इमरान खान भी गाहे बगाहे इसी गीत को दोहरा ही लेते हैं।

उन्हें हर किसी से उम्मीद बंधती है कि यह तो कश्मीर के मसले पर उनका साथ देगा।

लेकिन ऐन मौके पर हर कोई धोखा दे जाता है।

अब तो उनका दोस्त चीन भी धीरे धीरे कश्मीर मुद्दे पर कन्नी काटता हुआ दिखने लगा है।

लेकिन चीन को सीधे सीधे आसानी से लेना अपने आप में बड़ी गलती होगी।

खासकर भारत के प्रति चीन का यह आक्रामक रवैया ऐतिहासिक कारणों से भी बना ही रहेगा।

वरना तिब्बत सहित प्राचीन भारत के अन्य इलाके, जो अब चीन में हैं, अपनी परंपरा की जड़े खोजते हुए भारत की तरफ आने लगेंगे।

वैसे काल्पनिक स्थिति में अपना हिमालय लगभग देश के ठीक मध्य में आ जाएगा।

यही प्राचीन भारत की भौगोलिक स्थिति थी, जब इराक से लेकर इंडोनेशिया तक भारतीय शासन फैला हुआ था।

खैर जाने दीजिए, इलेक्शन का मौका नजदीक आ रहा है।

चुनाव में रूचि लेने वाला हर कोई इसी गीत को दोहरा सुनाई पड़ रहा है कि लो आ गयी उनकी याद।

किसी को टिकट की याद आ रही है, किसी को भूले बिसरे गीत की तरह वोटरों की याद आ रही है।

वोटरों को अपने नेता के पुराने वादों की याद आ रही है

कुल मिलाकर हर तरफ लो आ गयी उनकी याद का जमाना है।

तेल देखिये और तेल की धार देखिये। यह इंडियन पॉलिटिक्स है मेरे भाई।

यहां जो दिखता है वह शायद ही होता है और जो नहीं दिखता है वह तो जरूर होता है।

कौन किसे कहां और कैसे पटखनी देता है, इसे समझने का कोई स्थापित फार्मूला आज तक नहीं बना।

चुप्पी साधे वोटर कब कहां कैसी चाल चल दे, इसका अंदाज लगाना बहुत कठिन है।



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