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आया सावन झूम के लेकिन कहां बरस रहा है




आया सावन झूम के लेकिन कहां बरस रहा है और कहां कयामत ढा रही है, यह सोचने और समझने वाली बात है।

अपने यहां तो बाढ़ का प्रकोप है लेकिन पड़ोसी देश में कश्मीर राग में रोते हुए बेचारे इमरान खान आंसू बहाने से नहीं चूक रहे हैं।

बेचारे अब करें भी तो क्या करें। हर तरफ से कोशिश की कि कोई तो कश्मीर के नाम पर उनका साथ दे दे।

लेकिन अकेले चीन ही खड़ा हुआ और बाकी लोग कन्नी काटकर निकल लिये।

मजबूरी में खुद ही अब आवर कश्मीर नाम से आंदोलन खड़ा कर दुनिया का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।

अब इसी बहाने अगर कहीं से कुछ आर्थिक मदद मिल जाती है तो दाना पानी चलता रहेगा।

वरना देश की गत को गर्त में जाती नजर आ रही है।

पाकिस्तानी मंत्री जी को माइक से करेंट लग रहा है

वहां के मंत्री जी तक को मोदी का नाम लेते ही माइक से बिजली का झटका लग जाता है

देश की बात करें तो बाढ़ के साथ साथ अब रुपये पैसे की गाड़ी भी गड्डे में जा रही है, ऐसा जानकार बताने लगे हैं।

पता नहीं नोटबंदी में जब सारा पैसा बैंक के पास आ ही गया था तो यह पैसा दोबारा से कहां गायब हो गया।

अब रिजर्व बैंक ने भी सरकार को फिर से पैसा दिया है। सरकार ने बैकों को पैसा दिया है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सावन की हरियाली के आनंद में डूबे हुए हैं और दूसरी तरफ से वाकई देश के आर्थिक विकास का तटबंध कटता चला जा रहा है।

अपने नरेन भइया तो पहले ही कह चुके हैं कि फकीर हूं झोला उठाकर चल दूंगा।

इस बीच अपने चिदांवरम जी का क्या गत होता है, यह देखना जरूरी है।

इंडियन पॉलिटिक्स में माल कमाने का स्कोप बहुत ज्यादा है, इसे समझने के लिए भी डॉ मनमोहन सिंह सरीखा स्पेशलिस्ट होना जरूरी नहीं है।

अपने आस पास भी हम देख ही लेते हैं कि फटी चप्पल पहनकर घूमने वाले भी नेतागिरी में आने के बाद स्कॉर्पियो गाड़ी में चढ़ने लगते हैं।

मानों नेता बनते ही कुबेर का खजाना हाथ लग जाता है।

इसलिए भइया जी आया सावन झूम के के बीच असली हालत को भी ख्याल रखे रहना।

वरना आंख बंद और डब्बा गायब होते देर नहीं लगती।

इस फिल्म का नाम ही है आया सावन झूम के।

फिल्म के इस गीत को लिखा था आनंद बक्षी ने और उसे संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।

इसे स्वर दिया था मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर ने जबकि फिल्मी पर्दे पर इस गीत के साथ नजर आये थे अपने धर्मेंद्र और आशा पारेख।

गीत के बोल कुछ इस तरह थे।

बदरा हो बदरा छाए कि झूले पड़ गए हाय
कि मेले लग गए मच गई धूम रे
कि आया सावन हो झूम के

बदरा हो बदरा छाए कि झूमे पर्वत हाय
रे कजरारी बदरिया को चूम रे
कि आया सावन हो झूम के कि आया सावन झूम के
काहे सामने सबके बालमवा तू छेड़े जालमवा
काहे फेंके नज़र की डोरी तू लुक-छुप के गोरी
कजरा हो कजरा हाय रे बैरी बिखरा जाए रे
मेरा कजरा कि मच गई धूम रे

आया सावन झूम …

जाने किसको किसकी याद आई के चली पुरवाई
ल : जाने किस बिरहन का मन तरसा के पानी बरसा
कंगना हो कंगना लाए कि घर लौट के आए
परदेसी बिदेसवा से घूम के

कि आया सावन …
तेरे सेहरे की हैं ये लड़ियाँ कि सावन की झड़ियाँ
ये हैं मस्त घटाओँ की टोली कि तेरी है डोली
धड़का जाए धड़का जाए रे मेरा मनवा हाय
साजनवा कि मच गई धूम रे

कि आया सावन …

अब झारखंड पर भी नजर डाल लें। अपने रघुवर भइया इतना खुश हैं कि अब 81 में से 80 का दावा करने लगे हैं।

लगता है उनपर भी सावन चढ़ गया है।

अरे भइया अपना चार गो मंत्री का चुनाव जीतने का तो पहले पक्का कर लो।

पता नहीं इनलोगोन को इस बार टिकट भी मिलेगा कि नहीं।

नहीं मिला तो दूसरा तो शायद जीत भी जाए लेकिन इन पुराने चेहरों का जीतना तो

सावन की हरियाली में भी सूखा सूखा सा नजर आ रहा है।

इसलिए भइया जियादा खुश होने की कउनो जरुरत नहीं है।

मौका है तो ठीक से मोर्चा लगाइये नहीं तो अपने हेमंत भइया तो फिर से गांव गांव घूमने में जुट गये हैं।

पता नहीं गांव देहात में इस बार के चुनाव में मोदी जी का जादू फिर से चलेगा कि नहीं।

चल गया तो मजे ही मजे लेकिन अगर नहीं चला तो पता नहीं इस बार कितने पुराने मामलों की फाइल खुलेगी

और फिर से कुछ लोगों के जेल जाने का सिलसिला तो प्रारंभ होगा।

यह मैं नहीं अपने हैवीवेट कैबिनेट मंत्री सरयू राय जी कह रहे हैं।

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