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एससीक्यू पर अब डब्ल्यू एच ओ पीछे हटा बयान भी बदला

  • आंकड़ों की सत्यता पर अनेक संदेह

  • डब्ल्यूएचओ इसकी फिर से जांच करेगा

  • अंदरखाने में गड़बड़ी के और राज उजागर

  • दवा कारोबार के काला धंधा का भंडा फूटा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः एससीक्यू अब वैज्ञानिक जगत में एक परिचित संक्षेप है। दुनिया में चर्चित

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को संक्षेप में यह नाम दिया गया है। इस दवा को कोरोना के ईलाज

के गलत मानने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन को अब अपने बयान से पीछे हटना पड़ रहा ।

डब्ल्यू एच ओ ने संकेत दिया है कि इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल को वह फिर से प्रारंभ

करने जा रहा है। लेकिन एक लेख के आधार पर इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया गया,

इसकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई सामने नहीं आया है। दूसरी तरफ लांसेट में प्रकाशित

लेख के बाद उसके आंकड़ों को विश्लेषण के लिए उपलब्ध नहीं कराने की वजह से पत्रिका

भी संदेह के घेरे में आ गयी है। जिस कंपनी के आंकड़ों के आधार पर सारी कार्रवाई हुई थी

वह कंपनी भी अब बचाव की मुद्रा में है। उसने भी अपने आंकड़ों के सही होने के बारे में

उठाये गये सवालों का सीधा उत्तर नहीं दिया है। दरअसल सर्जिस्फेयर नामक कंपनी के

जहां के अस्पतालों का उल्लेख करते हुए यह आंकड़ा पेश किया था, उन अस्पतालों से उसे

कैसे आंकड़े मिले, यह स्पष्ट नहीं है। दूसरे वैज्ञानिक मानते हैं कि सरकारी आंकड़ों के साथ

इस निजी कंपनी के आंकड़े मेल नहीं खाते। इसलिए कंपनी को यह बताना चाहिए कि उसे

यह आंकड़े किसने उपलब्ध कराये हैं।

एचसीक्यू के खिलाफ जारी आंकड़ों पर पहले से ही संदेहहाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन पर पाबंदी के बाद सुधार की कवायद

विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से यह कहा गया है कि वे हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा के

क्लीनिकल ट्रायल को फिर से चालू करने जा रहे हैं। लेकिन इसे रोकने में जल्दबाजी क्यों

दिखायी गयी और मात्र एक पत्रिका में प्रकाशित लेख के आधार पर इतना बड़ा फैसला

किसने लिया, इसका उत्तर नहीं मिल पा रहा है। इससे यह संदेह और पुख्ता हो रहा है कि

दवा कारोबार में अब कोरोना को भी हथियार बनाकर अपना अपना हित साधने का खेल

चल पड़ा है। जिन पत्रिकाओँ में एससीक्यू का कोराना के ईलाज में कोई फायदा नहीं होने

के लेख प्रकाशित हुए हैं, उन पत्रिकाओँ के साथ कई बड़ी दवा कंपनियों के रिश्ते भी उजागर

होते दिख रहे हैं। दवा कारोबार में क्या कुछ गोरखधंधा होता है, इसकी चर्चा तो पहले से

होती आयी है लेकिन यह पहला मौका है जब वैश्विक महामारी के बीच भी आर्थिक हित

साधने की साजिशें रची जा रही हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने औपचारिक तौर पर यह एलान किया है कि जिस लेख के आधार

पर एससीक्यू के इस्तेमाल पर रोक का फैसला लिया गया था, उन आंकड़ों को फिर से जांच

हो रही है। जेनेवा में इस संगठन की तरफ से डॉ टेड्रोस घीब्रियासूस ने कहा कि उनलोगों ने

एससीक्यू पर अस्थायी रोक लगायी थी क्योंकि इस दवा के बारे में गंभीर सवाल उठाये

गये थे। लेकिन अब स्वतंत्र तरीके से भी तमाम आंकड़ों का परीक्षण किया जा रहा है

क्योंकि प्रकाशित लेख के आंकड़ों पर अनेक लोग संदेह व्यक्त कर चुके हैं। यह सही है कि

जिस कंपनी के द्वारा यह आंकड़े उपलब्ध कराने का दावा किया गया है, वह सर्जिस्फेयर

नामक कंपनी भी भरोसे के लायक नहीं है कि उसकी राय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन कोई

स्थायी राय कायम करे।

तीन लेखकों ने इस विवाद से खुद किनारा किया

इस बीच विवाद बढ़ने की वजह लेख से जुड़े तीन लेखकों ने भी अपने पैर पीछे खींच लिये

हैं। इन सभी का मानना है कि सर्जिस्फेयर कंपनी अपने आंकड़ों को परीक्षण के लिए

उपलब्ध नहीं करा पायी है। मलेरिया के ईलाज में इस्तेमाल होने वाली यह दवा यानी

एचसीक्यू के पक्ष में पहला बड़ा बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आया था। दूसरी

तरफ सर्जिस्फेयर के मुख्य अधिकारी सपन एस देसाई ने मीडिया से कहा है कि वह तमाम

आंकड़ों के विश्लेषण के लिए तैयार हैं। लेकिन यह गोपनीय आंकड़े हैं, इसलिए उन्हें

सार्वजनिक तो नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ इसके विरोध में खड़े वैज्ञानिक पहले ही

यह सवाल उठा चुके हैं कि इन आंकड़ों को दूसरों तक देने पर जब पूरी दुनिया में पाबंदी

लगी है तो इस कंपनी तक यह आंकड़े किसने पहुंचाये हैं।

पिछले महीने इसी कंपनी के आंकड़े पर जो लेख प्रकाशित हुए थे, उसमें बताया गया है कि

96 हजार के करीब मरीजों पर एससीक्यू का प्रभाव दुनिया भर के 671 अस्पतालों में देखा

गया है। इनमें से 15 हजार लोगों को यह दवा यानी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दी गयी थी।

इनमें से कुछ को सिर्फ क्लोरोक्वीन भी दी गयी थी। इन सभी पर इस दवा को दिये जाने के

बाद भी कोरोना से उपचार में कोई लाभ नजर नहीं आया था। साथ ही यह भी लिखा गया

था कि इस दवा के प्रयोग से मरीजों के सांस लेने की गति में उलट फेर हुआ। कुछ में

मरीजों की मौत भी हुई है। सर्जिस्फेयर के इन आंकड़ों पर हार्वड के प्रोफसर मनदीप मेहरा,

ज्यूरिख अस्पताल के फ्रैंक रुसचिटका और उटाह विश्वविद्यालय के अमित पटेल ने

संयुक्त रुप से आंकड़ों के विरोध में बयान जारी किया है।


 

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